अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वीजा को लेकर बड़ा कदम उठाते हुए 75 देशों के इमिग्रेंट वीजा पर पूरी तरह रोक लगा दी. इनमें भारत के भी कई पड़ोसी शामिल हैं. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि बाहर से आए लोग अमेरिकी करदाताओं के पैसे निचोड़ते रहते हैं. यह वेलफेयर डिपेंडेंसी रेट है, जिसके तहत बाहरियों को खाने के लिए स्टैंप, हाउसिंग और यहां तक कि कैश भी मिलता है.
जिन देशों का का इमिग्रेंट वीजा अनिश्चित समय के लिए रोक गया, उनमें ईरान, रूस, अफ़गानिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान शामिल हैं. अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने कहा कि यह रोक उन विदेशियों पर लगाई गई है जिनके बारे में अंदाजा है कि वे अमेरिका आए तो पब्लिक असिस्टेंस पर रहेंगे. यानी ऐसे देशों से आए लोगों में यह पैटर्न दिखता है कि वे मदद पर ज्यादा निर्भर करते हैं. 21 जनवरी से इमिग्रेंट्स वीजा पर रोक प्रभावी हो जाएगी.
क्या है इमिग्रेंट वीजा, कैसे अलग
जो लोग यूएस में हमेशा के लिए रहने के इरादे से जाएं, उन्हें इमिग्रेंट वीजा मिलता है. वीजा पाने के लिए उसे किसी सपॉन्सर की जरूरत होती है. यह सपॉन्सर या तो कोई अमेरिकी नागरिक हो सकता है, अमेरिका का नागरिक हो सकता है, या फिर कोई अमेरिकी कंपनी हो सकती है जो नौकरी के लिए बुलाए.
जब सपॉन्सर अमेरिकी इमिग्रेशन विभाग के पास आवेदन करेगा, तब ही ये प्रोसेस शुरू होगी. इसके उलट, नॉन-इमिग्रेंट वीजा उस विदेशी नागरिक को दिया जाता है, जो नौकरी, पढ़ाई या घूमने के इरादे से कुछ समय के लिए यूएस जाए.

ट्रंप ने जिन 75 देशों पर रोक लगाई, उसमें कई पैटर्न दिखेंगे. जैसे इसमें मुस्लिम देशों की संख्या 28 है. वहीं 26 अफ्रीकी देश हैं. लिस्ट में भारत के कुल 6 पड़ोसी देश शामिल हैं- अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, पाकिस्तान और म्यांमार.
क्या इन देशों के लोग अमेरिका पर बोझ बन रहे थे
ट्रंप प्रशासन का साफ कहना है कि वो उन्हीं देशों के लोगों को रोक रहा है, जो आकर टैक्सपेयर पर निर्भर हो सकते हैं. असल में बाहर से आए कई देशों के लोग शुरुआती महीनों या कई बार लंबे समय के लिए खाने-पीने और रहने के लिए अमेरिकी सरकार पर निर्भर रहते हैं. ट्रंप का इरादा इसी वेलफेयर डिपेंडेंसी रेट को कम करना है.
इस देश में वेलफेयर सिस्टम की शुरुआत लगभग सौ साल पहले हो चुकी थी, लेकिन ये सिर्फ अपने लोगों के लिए थी, बाहरियों को इससे बाहर रखा गया था. बाद में इमिग्रेंट्स को भी मदद मिलने लगी. खासकर स्थायी तौर पर रहने के लिए गए लोगों को रोटी, कपड़ा, मकान सब मिलने लगा.
किस-किस तरह की सहायता मिलती है
- इसमें सबसे बड़ी मदद खाने के कूपन हैं. कम आमदनी वाले परिवारों को खाने का खर्च निकालने के लिए मदद मिलती है. इससे किराने का सामान खरीदा जाता है.
- बहुत जगहों पर सूप किचन भी चलता है, जहां पका-पकाया खाना मिलता है. ये कहने को चैरिटीज चलाती हैं, लेकिन पैसे करदाताओं के ही लग रहे हैं.
- गरीब या कम आय वाले इमिग्रेंट परिवारों के बच्चों और गर्भवती महिलाओं को इलाज की सुविधा मिल सकती है.
- शरणार्थियों या असाइलम वालों को शुरुआत में थोड़े समय के लिए कैश भी दिया जाता है ताकि वे अपनी बाकी जरूरतें पूरी कर सकें.
- कई मामलों में घर या कम किराए वाले घर भी दिए जाते हैं, जो सरकारी होते हैं.
- इमिग्रेंट बच्चों को सरकारी स्कूलों में मुफ्त पढ़ाई मिलती है, चाहे माता-पिता की स्थिति कुछ भी हो.
- नए आए शरणार्थियों को नौकरी ढूंढने, भाषा सीखने और बसने में मदद दी जाती है, इसपर भी काफी पैसे जाते हैं.

कितने पैसे खर्च हो रहे करदाताओं के
वेलफेयर स्कीम का पैसा टैक्सपेयर से ही आता है. सरकार लोगों से जो इनकम और बाकी टैक्स वसूलती है, उसी का एक हिस्सा गरीबों, बेरोजगारों, बुजुर्गों और जरूरतमंद परिवारों की मदद में खर्च होता है. हर साल अमेरिका वेलफेयर और सोशल सपोर्ट पर सैकड़ों अरब डॉलर खर्च करता है. अगर मेडिकेड, फूड स्टाम्प, हाउसिंग मदद और कैश असिस्टेंस जैसी स्कीम्स को जोड़ दें, तो यह खर्च करीब 80 लाख करोड़ रुपये सालाना होता है.
इस वजह से बढ़ा गुस्सा
विदेशियों को वेलफेयर स्कीम मिलने पर लंबे समय से विवाद रहा. बहुत से लोग मानते हैं कि जो विदेशी, काम किए बिना सरकारी मदद लेते हैं, उनका बोझ अमेरिकी टैक्सपेयर पर पड़ता है. टैक्सपेयर खुद इसका विरोध करने लगे. खासकर हाल के समय में कई देशों से आपराधिक रिकॉर्ड वाले भी पहुंच गए और देश में कथित तौर पर क्राइम, खासकर महिलाओं के साथ हिंसा बढ़ी. ऐसे में नाराजगी और बढ़ गई.
नाराजगी किसी एक देश तक सीमित नहीं. लेकिन अक्सर उन देशों का नाम ज्यादा आता है जहां से शरणार्थी या असाइलम लेने वाले काफी संख्या में आए. इनमें अफ्रीकी देश भी है, और कई एशियाई देश भी. युद्ध और आपदाओं से बचकर आए लोग काफी समय तक कुछ कर नहीं पाते, और सरकारी मदद लेते रहते हैं. इसी बात को लेकर गुस्सा बढ़ा.