रूस और यूक्रेन युद्ध को चार साल होने को हैं. मॉस्को चाहता है कि क्रीमिया के अलावा डोनबास भी उसका हो जाए, वो भी यूक्रेन की आधिकारिक मंजूरी के साथ. इधर शांति का सफेद झंडा लेकर चलने के बावजूद अमेरिका अपनी जमीनें बढ़ाना चाह रहा है. कई देशों पर दबाव है कि वे एक पाला चुन लें. तो क्या बड़ी मुश्किल से मल्टीपोलर हुई दुनिया वापस पुराने फ्रेम में लौट सकती है?
फरवरी 2022 में व्लादिमीर पुतिन ने जब रूस पर हमला किया तो इरादा साफ था, और मकसद करीब. कम से कम पुतिन को यही लगा. ठीक दस साल पहले भी मॉस्को ने कीव पर अटैक करते हुए क्रीमिया पर अपनी सेना खड़ी कर दी थी. अब रूस को डोनबास चाहिए था. यह वो इलाका है, जहां रूसी बोलने वाली आबादी ज्यादा है और जाहिर तौर पर खुद को मॉस्को के करीब मानती है. दस साल बाद यानी इस अटैक के बारे में माना जा रहा था कि युद्ध कुछ ही दिनों में रुक जाएगा, जब रूस को उसका इच्छित मिल सकेगा.
फिर ऐसा क्यों नहीं हुआ
यूक्रेन पर हमला इस बार यूरोप के लिए डराने वाला साबित हुआ. यूरोपीय संघ को डर है कि यूक्रेन से आगे बढ़ते हुए रूस यूरोप के बाकी देशों में भी घुसपैठ कर सकता है. उसने भर-भरकर सैन्य और आर्थिक मदद देनी शुरू कर दी ताकि यूक्रेन लड़ता रहे. अमेरिका में युद्ध की शुरुआत में जो बाइडेन सरकार थी. उसने भी भारी सहायता दी. फ्रंट फेस यूक्रेन रहा, लेकिन जंग रूस बनाम वेस्ट हो चुकी थी. अमेरिका में ट्रंप प्रशासन के आते ही तस्वीर बदली.
अब यूएस मध्यस्थता कर रहा है, वो भी ऐसी जिसमें रूस की शर्तें पूरी हो जाएं. यानी रूस के पास यूक्रेन का बड़ा हिस्सा आ जाए. पुतिन फिलहाल जो चाहते हैं, वो हुआ तो मौजूदा कीव का 20 फीसदी से भी बड़ा भाग कट जाएगा. इसके बाद भी रूस रुकेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं.

अब बात आती है अमेरिका की
ट्रंप अपनी दूसरी पारी में खासे आक्रामक हैं. वे अमेरिका को पचास राज्यों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि उसमें कई और चीजें जोड़ना चाहते हैं. उन्होंने पहले कनाडा के साथ मजाक शुरू किया और कहा कि ये देश चाहे तो यूएस का 51वां स्टेट बन सकता है. बात भले ही हंसी-हंसी में कही जा रही थी, लेकिन इरादा साफ दिखने लगा. कनाडा नहीं, लेकिन अमेरिका ने पनामा और ग्रीनलैंड को हासिल करने की बात कर दी.
क्यों चाहिए ग्रीनलैंड और पनामा
अमेरिका को पनामा और ग्रीनलैंड इसलिए चाहिए क्योंकि दोनों जगहें बहुत अहम हैं. पनामा नहर से जहाज अटलांटिक और प्रशांत महासागर के बीच तेजी से आते जाते हैं. अगर यह रास्ता अमेरिका के पास रहता है तो उसका व्यापार बढ़ेगा और सैन्य तौर पर भी ये फायदेमंद होगा.
ग्रीनलैंड वैसे तो बर्फीला और आबादी-शून्य सा लगता है, लेकिन यह जगह रणनीतिक महत्व की है. यहां से रूस और यूरोप पर नजर रखी जा सकती है. यहां खनिज, तेल और गैस जैसे संसाधन भी हैं. बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं, जिन पर नियंत्रण जरूरी माना जा रहा है. अमेरिका नहीं चाहता कि रूस या चीन यहां मजबूत हों. ग्रीनलैंड उसे भविष्य की सुरक्षा और ताकत से जुड़ा हुआ दिखता है.
रूस और अमेरिका बीते कुछ महीनों से जैसा व्यवहार कर रहे हैं, उससे यह डर फिर बढ़ने लगा है कि क्या दुनिया फिर बाईपोलर यानी दो ध्रुवीय व्यवस्था की तरफ जा रही है. दूसरे वर्ल्ड वॉर के खत्म होने के बाद देश दो खांचे में बंट गए थे. कुछ रूस (तब सोवियत संघ) के साथ तो ज्यादातर अमेरिका की तरफ थे. कोल्ड वॉर छिड़ी हुई थी. अमेरिका अपने नंबर बढ़ा रहा था, तो रूस ने भी कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी हुई थी. ऐसे में आशंका थी कि अगर जरा भी ऊंच-नीच हुई तो दोनों देश जंग में कूद पड़ेंगे. तब चाहे-अनचाहे ही सबको इसका हिस्सा होना पड़ता.

सोवियत संघ के टूटने के बाद शीत युद्ध रुक गया. रूस अब भी ताकतवर था लेकिन बंटवारे के बाद उसे काफी कुछ संभालना था. वो उसमें जुट गया और अमेरिका निश्चिंत हो गया. अब वो अकेला सुपरपावर था, जिसने इंटरनेशनल संगठनों में फंडिंग करते हुए बड़ा नाम बना लिया. दुनिया या तो उसकी कर्जदार थी, या डरी हुई.
नब्बे के दौरान ही एक और बदलाव हुआ. ग्लोबलाइजेशन. इसमें भारत से लेकर चीन जैसे देश काफी मजबूत हुए. यूरोप भी यूनाइट होकर मजबूत हो चुका था. इधर अरब लीग के पास भी आर्थिक और कूटनीतिक मजबूती आ गई. कुल मिलाकर, दुनिया बाईपोलर से मल्टीपोलर हो चुकी. कई देशों के पास परमाणु ताकत भी है. ये लोडेड बंदूक की तरह है. यानी खतरा तो है लेकिन इसी खतरे की आशंका से कोई भी एक-दूसरे पर वार करने से पहले सौ बार सोचेगा. आर्थिक फायदों के लिए तनातनी भले हो लेकिन बहुध्रुवीय दुनिया में तीसरा युद्ध शायद ही हो.
क्या बदल सकता है अब
हाल में शांत पानी में कंकड़ आ गिरा. रूस यूक्रेन युद्ध के जरिए साफ संकेत दे चुका कि वो अपना असर दोबारा बढ़ाना चाहता है. इधर अमेरिका भी पीछे हटने के मूड में नहीं दिखता. यूरोप, एशिया और आर्कटिक जैसे इलाकों में उसकी सैन्य और रणनीतिक सक्रियता बढ़ी है. एक बार फिर शीत युद्ध जैसी तस्वीर बन रही है. यहां दो देश होंगे और दोनों तरफ बाकी देश बंटेंगे. ये स्थिति बारूद का ढेर है, जहां छोटी चिंगारी भी लपलपाकर सबको लील जाएगी.
हालांकि इसका दूसरा पहलू भी है. मौजूदा दुनिया अमेरिका और रूस तक सीमित नहीं. चीन एक बड़ी आर्थिक और सैन्य ताकत बन चुका है. भारत, यूरोपीय संघ, तुर्की और खाड़ी देश भी मजबूत हो चुके, जो किसी हाल में एक पाला नहीं चुनेंगे.