
अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जा करने की मंशा जाहिर किए जाने के बाद यह इलाका एक बार फिर दुनिया भर में चर्चा में है. सवाल उठ रहे हैं कि आखिर ऐसा क्या है ग्रीनलैंड में, जिसे लेकर ट्रंप इसे कब्जाने पर इतना जोर दे रहे हैं. इस मुद्दे पर अलग-अलग तरह की बातें सामने आ रही हैं. यह पहली बार नहीं है जब अमेरिका की तरफ से ग्रीनलैंड को लेकर इस तरह की दिलचस्पी दिखाई गई हो. ग्रीनलैंड और अमेरिका का रिलेशन 85 साल पुराना है, जिसे अमेरिका ने न सिर्फ सुरक्षा के लिए बल्कि न्यूक्लियर रिसर्च के लिए भी इस्तेमाल किया है.
अमेरिका लंबे समय से ग्रीनलैंड को रणनीतिक नजरिए से अहम मानता रहा है. इस कहानी की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध से होती है, जब हिटलर की अगुवाई में नाजी जर्मनी ने 1940 में डेनमार्क पर कब्जा कर लिया. इसके तुरंत बाद, साल 1941 में अमेरिका और डेनमार्क ने रक्षा समझौता किया. इसी समझौते के तहत अमेरिका उसकी मदद के लिए ग्रीनलैंड में दाखिल हुआ. उस समय ग्रीनलैंड डेनमार्क का एक उपनिवेश हुआ करता था.
अमेरिका ग्रीनलैंड किसी कॉलोनी के तौर पर नहीं बल्कि रणनीतिक जरूरतों के कारण पहुंचा था. उसका मकसद अटलांटिक क्षेत्र में सुरक्षा को मजबूत करना था. इसी दौरान रक्षा समझौतों के तहत अमेरिका ने ग्रीनलैंड में कई एयरफील्ड और मौसम निगरानी स्टेशन बनाए. ये ठिकाने जर्मन पनडुब्बियों पर नजर रखने और अटलांटिक के रास्ते उड़ान भरने वाले अमेरिकी सैन्य विमानों के लिए बेहद अहम थे.
1951 का समझौता और थुले एयर बेस
साल 1951 में डेनमार्क और अमेरिका के बीच एक अहम समझौता हुआ. इस समझौते के तहत अमेरिका को ग्रीनलैंड के उत्तर-पश्चिमी हिस्से में थुले एयर बेस बनाने की अनुमति दी गई. थुले एयर बेस नॉर्थ पोल से 1200 किलोमीटर दूर है. वहीं, ग्रीनलैंड की राजधानी नूक से इसकी दूरी करीब 1500 किलोमीटर है.

सोवियत (अब रूस) के साथ शीत युद्ध के दौर में थुले एयर बेस अमेरिका के लिए बेहद अहम बन गया था. अमेरिका ने इसे एक आर्कटिक आउटपोस्ट यानी सैन्य चौकी के तौर पर इस्तेमाल किया. यहां से मिसाइलों की निगरानी की जाती थी, स्पेस सर्विलांस होता था और जरूरत पड़ने पर लॉन्ग रेंज के अमेरिकी बॉम्बर्स सोवियत संघ तक पहुंच सकते थे. थुले एयर बेस के आसपास कई और सैन्य और तकनीकी प्रयोग भी किए गए.
अमेरिका का न्यूक्लियर प्रयोग
थुले एयर बेस के पास ही 1950 के दशक के आखिर में कैंप सेंचुरी नाम का एक खास प्रोजेक्ट शुरू किया गया. यह एक अमेरिकी का प्रयोग था, जिसका मकसद बर्फ की मोटी चादर के नीचे न्यूक्लियर-पावर्ड बेस बनाना था. इसके जरिए यह परखा जा रहा था कि क्या न्यूक्लियर मिसाइलों को बर्फ के नीचे छिपाकर लॉन्च किया जा सकता है.
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हालांकि, यह प्रयोग ज्यादा समय तक नहीं चला और साल 1967 में इस प्रोजेक्ट को बंद कर दिया गया. यह परियोजना अमेरिका और डेनमार्क के बीच ग्रीनलैंड को लेकर बनी संवेदनशील स्थितियों की एक अहम कड़ी रही. हालांकि, इसके बावजूद अमेरिका के हथियार और उसके सैन्य विमान ग्रीनलैंड बेस तैनात थे, जहां बाद में एक अमेरिकी सैन्य विमान क्रैश कर गया था.
1968 का विमान हादसा और रेडियोएक्टिव क्राइसिस
ग्रीनलैंड के इतिहास में 23 जनवरी 1968 को हुआ विमान क्रैश एक टर्निंग पॉइंट साबित हुआ. उस दिन एक अमेरिकी बी-52 बॉम्बर विमान ग्रीनलैंड के बर्फीले इलाके में दुर्घटनाग्रस्त हो गया था. एक ब्रिटिश मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस विमान में चार हाइड्रोजन बम लोड थे.
डेनमार्क के विरोध के बाद पेंटागन ने यह स्वीकार किया कि विमान पर परमाणु हथियार थे, हालांकि उनकी सटीक जानकारी सार्वजनिक नहीं की गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, विमान बर्फ में घुस गया और बम वहीं धंस गए. इस हादसे से डेनमार्क की सरकार काफी चिंतित हो गई. उस समय के डेनिश प्रधानमंत्री क्रैग ने अमेरिका से पूरी जानकारी मांगी और साफ कहा कि डेनमार्क की धरती पर परमाणु हथियारों की अनुमति नहीं है.
बाद में मार्च 1968 में अमेरिकी सैनिकों ने हादसे वाली जगह से रेडियोएक्टिव से सराबोर बर्फ और मलबा हटाया. इन्हें 18,000 गैलन की सीलबंद धातु कंटेनरों में भरकर थुले एयर बेस पर रखा गया, ताकि गर्मियों में समुद्री रास्ता खुलने पर इन्हें जहाज से बाहर ले जाया जा सके.

1946 में खरीद की पेशकश का दावा
ग्रीनलैंड को खरीदने को लेकर भी कई दावे सामने आते रहे हैं. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि 14 दिसंबर 1946 को अमेरिकी विदेश मंत्री जेम्स एफ. बायर्न्स ने डेनमार्क के विदेश मंत्री से मुलाकात के दौरान ग्रीनलैंड को 100 मिलियन डॉलर में खरीदने की पेशकश की थी.
हालांकि, बाद में 30 जनवरी 1947 की एक रिपोर्ट में अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट के हवाले से कहा गया कि अमेरिका ने कभी आधिकारिक तौर पर डेनमार्क को ग्रीनलैंड खरीदने का प्रस्ताव नहीं दिया. स्टेट डिपार्टमेंट का कहना था कि ग्रीनलैंड के भविष्य पर बातचीत जरूर हुई थी, लेकिन खरीद को लेकर कोई औपचारिक प्रस्ताव नहीं रखा गया था.
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कांगरलुसुआक: एक डॉलर में लौटा सैन्य ठिकाना
ग्रीनलैंड में अमेरिका का एक और अहम सैन्य ठिकाना था सोंडरेस्त्रोम एयर बेस, जिसे बाद में कांगरलुसुआक नाम दिया गया. यह बेस भी 1941 में बनाया गया था और अटलांटिक पार उड़ानों के लिए एक बड़ा रिफ्यूलिंग स्टेशन था. जब शीत युद्ध खत्म हुआ और आधुनिक विमानों को बार-बार रिफ्यूलिंग की जरूरत नहीं रही, तो अमेरिकी वायुसेना ने इस बेस को बंद करने का फैसला लिया.
इसके बाद सितंबर 1992 में अमेरिका ने कांगरलुसुआक एयर बेस और वहां मौजूद पूरा शहर ग्रीनलैंड की सरकार को प्रतीकात्मक रूप से सिर्फ एक डॉलर में बेच दिया था. इस सौदे में एयरपोर्ट, सभी इमारतें और स्थानीय इंफ्रास्ट्रक्चर शामिल थे.

थुले से पिटुफिक स्पेस बेस
अप्रैल 2023 में थुले एयर बेस का नाम बदलकर पिटुफिक स्पेस बेस कर दिया गया. यह बदलाव ग्रीनलैंड की सांस्कृतिक विरासत को सम्मान देने के मकसद से किया गया. आज भी पिटुफिक स्पेस बेस अमेरिका की मिसाइल डिफेंस सिस्टम, स्पेस सर्विलांस और बैलिस्टिक मिसाइल डिटेक्शन सिस्टम में अहम भूमिका निभाता है. यहां आमतौर पर करीब 700 लोग तैनात रहते हैं. इनमें अमेरिका की वायुसेना और स्पेस फोर्स के लगभग 150 स्थायी कर्मी शामिल हैं. इनके अलावा डेनमार्क और ग्रीनलैंड के अधिकारी भी यहां मौजूद रहते हैं.
ग्रीनलैंड किसका है?
ग्रीनलैंड आज भी डेनमार्क का हिस्सा है. इस रिश्ते का इतिहास हजार साल से भी ज्यादा पुराना है, जब नॉर्स यानी वाइकिंग लोग यहां आकर बसे थे. डेनमार्क ने 1700 के दशक में ग्रीनलैंड को औपनिवेशिक तौर पर नियंत्रित किया. बीते वर्षों में ग्रीनलैंड को काफी हद तक स्वायत्तता मिली है, लेकिन विदेश नीति और रक्षा जैसे मामलों पर आज भी डेनमार्क का नियंत्रण है. वहीं, ग्रीनलैंड में समय-समय पर डेनमार्क से पूरी आजादी की मांग भी उठती रही है.