एजेंडा आजतक 2024 (Agenda Aajtak 2024) के दूसरे दिन 'हंसी खुशी' के सेशन में कवि सुरेंद्र शर्मा और अशोक चक्रधर ने हिस्सा लिया. इस दौरान दोनों ने अपनी कविताओं और लतीफों से लोगों को खूब गुदगुदाया. कवि अशोक चक्रधर कवियों की नीति पर भी अपनी बात रखी. उनका मानना है कि हास्य कविताएं ऐसी होनी चाहिए कि सामने वाले को गुस्से की जगह हंसी आ जाए.
हास्य कविताओं को सुनकर किसी को गुस्सा आए तो आपका हास्य निरर्थक
कवि अशोक चक्रधर ने कहा कि हास्य का धर्म है कि उसे सुनकर किसी को गुस्सा ना आए. अगर आप ऐसा लिखेंगे कि सामने वाले को गुस्सा आ जाए तो आपका हास्य निरर्थक है. सामने वाला जिसपर व्यंग्य किया जा रहा है वह भी वाह कहे. दरअसल हस व्यक्ति ये मानता है कि मेरे बारे यह चीज थोड़ी ना कही जा रही है. हर कोई अपने लिए मानता है कि वह भ्रष्टाचार से ऊपर है. शिष्टाचार की श्रेणी में आता है. लेकिन हम सबके अंदर किसी ना किसी प्रकार का भ्रष्टाचार है.
हास्य कवियों की नीति, कुछ हद तक अनीति भी होती
अशोक चक्रधर आगे कहते हैं कि हम जो भी व्यंग्य करना चाहते हैं उसे पहले अपने ऊपर करते हैं. सामने वाले पर बाद में करते हैं. यही हमारी रणनीति, यही हमारी कार्यनीति है, यही हमारी अनीति है.अनीति इसलिए क्योंकि हम थोड़ा सा गलत काम करते हैं निंदा करके. लेकिन जब दुनिया में युद्ध चल रहा रोज सैंकड़ों बच्चे मारे जा रहे हैं. ऐसी स्थिति में कविताएं और साहित्य आपके अंदर सोए हुए भावनाओं को जगाने और मनोभावों को सामने लाने का काम करती है.
जनता का तेवर कवियों को बहुत जल्दी पता चल जाता है
अशोक चक्रधर के मुताबिक जनता का तेवर कवियों को बहुत जल्दी पता चल जाता है, अगर कवि निर्पेक्ष ढंग से जनता के बीच जाएं, कविता सुनाएं और तालियों की गणना करें, तो आपको पता चल जाएगा कि वैलेट में कितना वोट किसके लिए गिरने वाले हैं. तापमान कभी भी बदल सकता है.
कविता हमें समाज की तकलीफें बयां करने का मौका देती है
अशोक चक्रधर कहते हैं कि हम प्यार और मोहब्बत वाले लोग हैं. कई बार भारी बातें होती है और हम उनके प्रति आभारी नहीं हो पाते हैं. फिर हम काम आते हैं. हम भी समाज के प्राणी है. समाज में रहते हुए अपनी और अन्य लोगों की तकलीफें शेयर करते हैं. हम इसीलिए यहां बैठे हैं. वह अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि हाल ही में कवियों में एक कवि सम्मेलन समिति बनी है. जिसमें कवियों को एक मंच पर आने को मिलता है. सब विचारधारा के लोग बैठते हैं. कोई युद्ध नहीं करता. टीआरपी नहीं होती. आत्मीयता से अपनी बात कहने का मौका मिलता है. कविता तकलीफों को बयां करने का मौका देती है.