निर्देशकः अनुराग कश्यप
कलाकारः कल्कि कोकलिन, नसीरुद्दीन शाह, प्रशांत प्रकाश, गुलशन देवैया, पूजा
अनुराग कश्यप हिंदी सिनेमा में लगातार ध्यान खींचने वाला काम कर रहे हैं. बात विषय की हो, उसके ट्रीटमेंट की हो, अभिनेताओं, औजारों या फिर खास टेक्नीशियनों के चुनाव की. अपने (दुस्)साहसिक फैसलों से वे हमें चौंकाते आए हैं.
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उनकी दैट गर्ल इन यलो बूट्स एक दौड़ती हुई गहरी कसमसाहट की तरह है. बाप को खोजते हिंदुस्तान आई ब्रिटिश भारतीय रुथ (कोकलिन) कलेजे में घुटन का गुब्बारा दबाए मुंबई की गलियों में भटक रही है.
ड्रग एडिक्ट ब्वायफ्रेंड प्रशांत (प्रकाश), माफिया चिटियप्पा/चूतियापा गौड़ा (देवैया), कुछ ठग और भ्रष्ट सरकारी बाबू एक घेरा बनाते और चूसते हैं उसे. अनुराग की दूसरी फिल्मों की अराजकता के उलट यह ज्यादा व्यवस्थित है.
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चरित्रों और परिवेश के रेखांकन में गहरा संतुलन. रुथ के मजबूरी के मसाज पार्लर की उखड़ी दीवारें, रिसेप्शनिस्ट माया (पूजा) की अनवरत भदेस फोन वार्ता, मुंबई का खुले मुंह का शोर और मनों का अंधेरा. साथ में यथार्थ की तमाम ध्वनियां. इन सबके बैकड्रॉप में बीच-बीच में बजता वरुण ग्रोवर का कबीरी गाना यह संसार भरम की भूली, आप नजर नहिं आवै.
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तथ्यतः देखें तो पाएंगे कि यही पंक्तियां फिल्म का असल क्लाइमैक्स है, जो इस तरह खुलकर आती हैं कि देखकर कलेजा कांप जाए. हर परिस्थिति के तनाव और भावों को चेहरे पर गहराई के साथ नैरेट करके कल्कि (जो इसकी सह-लेखक भी हैं) ने इसे अपने जीवन की यादगार फिल्म में तब्दील कर लिया है.
वे अपने कंधों पर पूरी फिल्म लेकर चल सकती हैं, यह भरोसा पुख्ता हुआ है. उनके क्लाइंट दिवाकर बने शाह के अलावा पूजा, देवैया और प्रकाश किस्से को शिद्दत से उकेरने में खासी मदद करते हैं.