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सेंसर विवाद से सुप्रीम कोर्ट तक... विजय की ‘जन नायगन’ क्यों बन गई पॉलिटिकल दंगल का अखाड़ा?

‘जन नायगन’ का विवाद सिर्फ सेंसर सर्टिफिकेट तक सीमित नहीं है. ये फिल्म, चुनावी पिक्चर का ट्रेलर बन गई है. थलपति विजय आखिरी फिल्म सिर्फ उनके फैन्स ही नहीं, बड़े पॉलिटिकल खिलाड़ियों के लिए भी दिलचस्पी का मुद्दा क्यों है? जवाब विजय के स्टारडम में नहीं, उनकी पॉलिटिक्स में छुपा है.

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पॉलिटिक्स के खेल में क्या है विजय की 'जन नायगन' का रोल? (Photo: IMDB)
पॉलिटिक्स के खेल में क्या है विजय की 'जन नायगन' का रोल? (Photo: IMDB)

तमिल सिनेमा के सुपरस्टार थलपति विजय की फिल्म 'जन नायगन' के सेंसर सर्टिफिकेट का विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में है. विजय अपनी पार्टी बनाकर फुल टाइम पॉलिटिक्स में उतरने जा रहे हैं और उन्होंने 'जन नायगन' को अपनी लास्ट फिल्म कहा है. उनकी पार्टी तमिलगा वेत्री कलगम (TVK) और विजय फैन्स का आरोप है कि चुनावी साल में विजय के साथ राजनीतिक पैंतरेबाजी करने के लिए 'जन नायगन' को इस तरह उलझाया जा रहा है.

सवाल ये है कि विजय की एक फिल्म तमिलनाडु में इतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा कैसे बन गई? जवाब विजय के स्टारडम में नहीं, उनकी पॉलिटिक्स में छुपा है— एक ऐसी पॉलिटिक्स जो तमिलनाडु में करीब 100 साल पुराने द्रविड़ राजनीति के ट्रेंड को तोड़ सकती है.

आजादी से भी पुरानी है तमिलनाडु की द्रविड़ पॉलिटिक्स
ब्राह्मणवादी वर्चस्व और जातिगत भेदभाव को मिटाना. तमिल अस्मिता, महिलाओं और दलितों को समानता, धार्मिक अंधविश्वास दूर करके तार्किक सोच को बढ़ावा देना— तमिलनाडु की राजनीति इन्हीं विचारों का प्रैक्टिकल करती आई है. इसकी जड़ है 100 साल से भी पहले शुरू हुआ द्रविड़ आंदोलन. आज का तमिलनाडु, तब ब्रिटिश राज में मद्रास प्रेजिडेंसी का हिस्सा था.

वहां की राजनीति में नॉन-ब्राह्मण आंदोलन का पहला कदम जस्टिस पार्टी के जरिए पड़ा. 1916 में बनी भारत की ये पहली नॉन-ब्राह्मण पार्टी, तथाकथित रूप से हिंदूवादी, उत्तर भारतीय वर्चस्व और ब्राह्मणवादी कांग्रेस की विरोधी थी. पर ये अपने आप में एक एलीट संगठन थी. आज तमिलनाडु में 69% आरक्षण है— देश में सबसे ज्यादा. लेकिन रिज़र्वेशन यहां आज़ादी या संविधान से पहले, 1920 के दशक में ही आ चुका था और ये जस्टिस पार्टी की सबसे बड़ी विरासत है.

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पेरियार, DMK और AIADMK की द्रविड़ पॉलिटिक्स
भाषा विज्ञान में ‘द्रविड़ वर्सेज आर्यन’ की एकेडमिक बहस से द्रविड़ पहचान की थ्योरी निकली. और इस द्रविड़ पहचान को जन आंदोलन बनाने का काम किया ई वी रामस्वामी उर्फ पेरियार ने. उन्होंने उत्तर भारतीय वर्चस्व की तरफ झुकी राजनीति को, द्रविड़ संस्कृति पर आर्यन संस्कृति के वर्चस्व की नजर से देखा.

जस्टिस पार्टी के राजनीतिक आंदोलन को पेरियार ने द्रविड़ पहचान का सामाजिक आंदोलन बनाया. उनका 'आत्मसम्मान आंदोलन' तमिल अस्मिता के डीएनए में शामिल हो गया. कांग्रेस सरकारों की विवादित नीतियों ने पेरियार के आंदोलनों को और आग दी. अनिवार्य हिंदी शिक्षा के खिलाफ आंदोलन में सी एन अन्नादुरई और एम करुणानिधि जैसे तेज-तर्रार युवा भी जस्टिस पार्टी में आ गए.

पेरियार ने अपना आंदोलन और मजबूत करने के साथ पार्टी को नया नाम भी दिया— द्रविड़ कज़गम (Dravidar Kazhagam). लेकिन उन्होंने पार्टी को चुनावों से दूर रखा. इसलिए पेरियार की द्रविड़ कज़गम से लोग राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए अलग हुए, लेकिन 'द्रविड़ आत्मसम्मान' तमिल राजनीति में कॉमन आइडिया बना रहा. अन्नादुरई के पेरियार से मतभेद बढ़े तो उन्होंने अलग पार्टी बना ली— द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (DMK). द्रविड़ विचारों को अपने लेखन में उतारने वाले करुणानिधि भी अन्नादुरई के साथ हो लिए.

करुणानिधि की लिखी फिल्म ‘पराशक्ति’ (1952) ने द्रविड़ विचारधारा को सिनेमा के ज़रिए घर-घर पहुंचाया. सुपरस्टार एम जी रामचंद्रन यानी MGR भी DMK का चेहरा बने. फिल्मों के ज़रिए राजनीति और विचारधारा का ये मेल तमिलनाडु की राजनीति का स्थायी मॉडल बन गया. DMK राजनीति के शिखर पर पहुंची तो पहले अन्नादुरई मुख्यमंत्री बने, फिर करुणानिधि. जब करुणानिधि से मतभेद हुए तो एम जी आर अपनी पॉपुलैरिटी के दम पर एक नई पार्टी ले आए— ऑल इंडिया अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कज़गम (AIADMK).

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DMK ने कांग्रेस को तमिलनाडु में पूरी तरह साफ कर दिया था, तो एम जी आर की AIADMK राज्य में दूसरी बड़ी पार्टी बन गई. आगे चलकर एम जी आर भी मुख्यमंत्री बने. लेकिन दोनों पार्टियों ने मिलकर द्रविड़ सिद्धांतों को स्टेट मशीनरी का हिस्सा बना दिया. इसलिए पिछले करीब 50 सालों में सत्ता इन्हीं दो दलों के बीच घूमती रही. कांग्रेस और बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियां तमिलनाडु में अपने दम पर जगह नहीं बना सकीं.

नए सवालों का जवाब देने में फेल हुए कमल हासन, रजनीकांत
द्रविड़ आंदोलन से निकले सिद्धांत नीतियों में अपनी जगह बना चुके हैं. सामाजिक न्याय पॉलिसी मेकिंग का हिस्सा है और द्रविड़ पहचान सुरक्षित है. लेकिन आज के तमिल युवाओं में एक नई बेचैनी है— पोस्ट द्रविड़ एंग्ज़ायटी. कई बड़े सवाल मुंह ताक रहे हैं— द्रविड़ राजनीति कामयाब तो है, पर आगे क्या? दो ही पार्टियों में से एक कब तक चुनते रहें? पहचान की लड़ाई जीत ली, मगर नौकरियां कहां हैं? पॉलिटिक्स में उत्तर भारतीय कल्चर न होने के बावजूद भ्रष्टाचार क्यों है? जब नीतियों में सोशल जस्टिस दिखता है तो ज़मीन पर क्यों नहीं दिखता?

तमिल सिनेमा के दो सबसे बड़े सुपरस्टार रजनीकांत और कमल हासन, तमिलनाडु की मॉडर्न पॉलिटिक्स में एक ऑप्शन बनने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं. रजनीकांत ने 2017 में राजनीति में एंट्री की बात कही तो उनके फैन क्लब्स ने मिलकर एक संगठन की शक्ल ले ली— रजनी मक्कल मंद्रम (RMM). लेकिन रजनीकांत आध्यात्म, राष्ट्रवाद वगैरह की बात करने लगे. तमिलनाडु में लोगों को ये शब्द बीजेपी-कांग्रेस वाली पॉलिटिक्स की याद दिलाने लगते हैं. आखिरकार उन्होंने पॉलिटिकल हाइवे के टोल प्लाज़ा से पहले यू-टर्न मार लिया.

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कमल 2018 में अपनी पार्टी मक्कल नीधि मय्यम (MNM) लेकर आए. उनके पास आइडियाज़ की भरमार थी, लेकिन सोशल एंकर नहीं था. न ज़मीनी पॉलिटिक्स में उनकी कोई पैठ दिखी. कमल और रजनी दोनों ही अपने सुपरस्टार स्टेटस को पॉलिटिक्स में भुनाने की कोशिश में ज्यादा नजर आए. इसलिए लोगों से उन्हें कोई पॉजिटिव रिस्पॉन्स नहीं मिला.

कहां खड़े हैं थलपति विजय?
1990 के दशक से स्टार रहे विजय अपनी फिल्मों में सिस्टम से खूब टकराए हैं. ‘गिल्ली’ (2004) में उनका हीरो पॉलिटिकल विरासत के दम पर एक लड़की को परेशान कर रहे लोकल नेता से भिड़ता दिखा. उनकी डायलॉगबाज़ी लोगों को ऐसे लोगों के खिलाफ डटकर लड़ने का मैसेज दे रही थी. यहीं से विजय के फैन्स ने उन्हें टाइटल दिया— थलपति (जनता का लीडर).

'थुपक्की' (2012), 'कत्थी' (2014) और 'मर्सल' (2017) जैसी फिल्मों में विजय ने कॉर्पोरेट शोषण, किसानों की ज़मीन, मेडिकल करप्शन और सरकारी मशीनरी पर सीधे सवाल उठाए. ये फिल्में सिर्फ सिस्टम की आलोचना नहीं करतीं, बल्कि विरासत में मिली सत्ता पर भी सवाल उठाती हैं.

गौर करने वाली बात ये भी है कि एक जन आंदोलन से निकलीं दोनों बड़ी पार्टियां DMK और AIADMK लीगेसी के भरोसे ही टिकी हैं. DMK की कमान एक परिवार के हाथ में है और AIADMK की उन्हीं के पास, जिनकी वफादारी MGR या जयललिता से जुड़ी हो. लीगेसी अलग है, लेकिन स्ट्रक्चर एक जैसा है.

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यहां विजय की पोजीशन बहुत अलग है— वो किसी राजनीतिक विरासत का हिस्सा नहीं हैं. वो द्रविड़ पहचान, धर्म या जाति की राजनीति नहीं करते. उनका फोकस गवर्नेंस, करप्शन और युवाओं को मिल रहे मौके हैं. उनकी पोजीशन कुछ ऐसी है कि— द्रविड़ सिद्धांत और पिछले संघर्ष का सम्मान है, मगर अब बात आगे की होगी. ये उन्हें पोस्ट द्रविड़ एंग्ज़ायटी का चेहरा बनाता है.

यह भी पढ़ें: इस वजह से विवादों में है विजय की फिल्म 'जन नायगन'

विजय को क्यों टीम में लेना चाहेंगे बड़े खिलाड़ी?
लेकिन विजय का पुराने बैरियर को तोड़ना, नेशनल पॉलिटिक्स के बड़े खिलाड़ियों जैसे बीजेपी या कांग्रेस के लिए भी एक नया मौका बनेगा. दशकों से तमिलनाडु में पैर जमाने की अधूरी तमन्ना लिए ये खिलाड़ी, विजय की पीठ पर सवार होकर एंट्री मार सकते हैं. इसलिए विजय, बीजेपी या कांग्रेस के लिए भी दिलचस्पी का मुद्दा हैं.

'जन नायगन' पॉलिटिक्स में एंट्री से पहले विजय की आखिरी फिल्म है. इसमें वो फिर से 'सिस्टम' की धज्जियां उड़ाने वाले मोड में हैं. यानी 'जन नायगन' से हीरो विजय ही नहीं, नेता विजय का भी भौकाल बनेगा. तमिलनाडु में अप्रैल-मई तक नई सरकार के लिए चुनाव होने वाले हैं. अगर 'जन नायगन' इससे पहले रिलीज हो गई, तो विजय को तगड़ा फायदा मिलेगा. और इसलिए ये सिर्फ विजय की आखिरी फिल्म ही नहीं, एक अल्टिमेट पॉलिटिकल जंग का मैदान भी है.

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