फिल्म का नाम: बेयरफुट टू गोवा
डायरेक्टर: प्रवीण मोर्चले
स्टार कास्ट: फारुख जफर, सारा नहर, प्रखर मोर्चले और पूर्वा पराग
अवधि: 77.44 मिनट
सर्टिफिकेट: U
रेटिंग: 2.5 स्टार
कई सारे फिल्म समारोहों से होती हुई 'बेयरफुट टू गोवा ' अब रिलीज होने को तैयार है, और यह पारिवारिक रिश्तों पर आधारित एक ड्रामा है. दादी, पोते, पोती, लड़का और बहू इसके मुख्य पात्र हैं, आइये जान लेते हैं कि आखिर कहानी क्या है. रॉक ऑन -2 की तैयारी के लिए शिलांग जाएंगी श्रद्धा कपूर
एक उम्रदराज महिला (फारुख जफर) जो दादी होने के साथ मां भी हैं, वो गोवा में अपने घर पर अकेली रहती हैं और उनका बेटा अपनी पत्नी और बच्चों के साथ मुंबई में जीवन बसर करता रहता है. बस मां की ममता है जो बार बार उसे चिट्ठी लिखवाने पर मजबूर करती है और हमेशा हाथ के बनाए हुए बेसन के लड्डू और खत मुंबई कुरियर कर देती है. लेकिन बहू (पूर्वा पराग) एक बार भी वो चिट्ठी या लड्डू अपने पति या बच्चों तक नहीं पहुंचने देती है. और किन्ही कारणों से जब बच्चों को अपनी दादी मां के बारे में खबर मिलती है तो दोनों बच्चे दीया (सारा नहर) और प्रखर (प्रखर मोर्चले) घर में बिना बताए अपनी दादी से मिलने के लिए निकल पड़ते हैं, और आखिरकार गोवा पहुंच जाते हैं, अब क्या वो दोनों अपनी दादी को घर वापस ला पाते हैं, यही है कहानी 'बेयरफुट टू गोवा' की. अमिताभ समेत कई को पद्म सम्मान
पहले फिल्म के एक्टर्स की बात करते हैं, दादी के रूप में स्वदेश और पीपली लाइव के बाद एक्ट्रेस फारुख जफर ने एक बार फिर से अपने किरदार को जीवंत करने की पूरी कोशिश की है, वहीं बहू का किरदार निभाती हुई पूर्वा पराग ने हर एक फ्रेम में अपने टैलेंट का दम दिखाती हैं. फिल्म में दोनों बच्चों ने ठीक वैसे ही काम किया है जैसा कि डायरेक्टर साहेब ने डिमांड की होगी, साथ ही डायरेक्टर प्रवीण मोर्चले ने भरपूर प्रयास किया है कि एक ऐसे विषय को सामने लाया जाए जो अक्सर घर घर की कहानी में होता है, खास तौर पर बच्चों के जज्बे को दिखाने की कोशिश की है. तो एक तरह से फिल्म तीन अलग अलग अवस्थाओं को भी बयान करती है, एक बच्चों की, दूसरी वयस्क माता पिता की और तीसरी वृद्धावस्था की.
फिल्म के बैकग्राउंड में आने वाले गीत भी एकदम स्थिति के अनुरूप ही आते हैं और उनके बोल दिल को छू जाते हैं जैसे 'अब न मछली गीत गाती है और ना ही बरगद बोलता है'. वहीं कुछ ऐसे संवाद हैं जो आपके भीतर घर कर जाते हैं जैसे - 'बुढ़ापे और ढलते सूरज को अंधकार से लड़ना ही पड़ता है'
निर्देशक ने छोटी छोटी बारीकियों पर भी विशेष ध्यान दिया है जैसे ताला चाबी, स्वेटर की बुनाई, दादी का चश्मा, 1990 की डायरी और उसमें लिखा हुआ पता, लेकिन फिल्म में कहीं कहीं आप कुछ कमी जरूर पा लेते हैं, जैसे जब भी भावुक क्षण दिखाने की कोशिश की जाती है तो आप उसे महसूस नहीं कर पाते हैं, दादी की व्यथा या बच्चों का मोह आपको छू नहीं पाता है और यही फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी लगती है. वैसे निर्देशक का पहला प्रयास है फिल्म के माध्यम से पारिवारिक रिश्तों को और सुदृढ़ करने का; और यही कारण है कि 'बेयरफुट टू गोवा' को अलग अलग फिल्म समारोहों में सराहा गया है.
अगर आप कमर्शियल सिनेमा से हटकर खास रिश्तों पर आधारित फिल्में देखने में यकीन रखते हैं तो ही ये फिल्म आपके लिए है.