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Maja Ma Review: सामाजिक मुद्दे के साथ पिछड़ा ट्रीटमेंट, औसत रह गई माधुरी की फिल्म

Maja Ma Review: माधुरी दीक्षित की फिल्म अमेजन प्राइम पर रिलीज हो गई है. ये फिल्म आपको हैरान तो करेगी, लेकिन अलग कारणों की वजह से. उन्हीं कारणों को आधार बनाकर ये रिव्यू तैयार किया गया है.

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Maja Ma पोस्टर में माधुरी दीक्षित
Maja Ma पोस्टर में माधुरी दीक्षित
फिल्म:मजा मा
2/5
  • कलाकार : माधुरी दीक्षित, गजराज राव
  • निर्देशक :आनंद तिवारी

सामाजिक मुद्दों पर फिल्म बनाने का एक बड़ा नुकसान होता है...आपकी ऑडियंस पहले ही काफी सीमित रह जाती है, ऐसी फिल्में सभी को पसंद आए, ऐसा हो नहीं सकता. और जिन्हें आ भी जाए, मुद्दा इतना संवेदनशील रहता है कि लोग किंतु-परंतु करने की स्कोप निकाल ही लेते हैं. ऐसे में इन फिल्मों को ऐसा ट्रीटमेंट देना पड़ता है कि मैसेज भी पहुंच जाए और ज्यादा बवाल भी ना हो. अब माधुरी दीक्षित की फिल्म आई है- मजा मा. अमेजन प्राइम पर रिलीज हुई है, इनका फिल्मों वाला ओटीटी डेब्यू कहा जा सकता है. सामाजिक मुद्दे पर ही फिल्म बनाई गई है, ऐसे में चुनौती बड़ी है, कितने सफल हुए हैं, जानते हैं.

कहानी

तेजस ( ऋत्विक भौमिकन) अमेरिका में पढ़ाई कर रहा है, वहीं पर एक लड़की से प्यार भी कर बैठा है, नाम है सुशु (बर्खा सिंह). सुशु का परिवार कहने को खुद को अब पूरी तरह अमेरिकी मानता है, लेकिन जड़े क्योंकि हिंदुस्तानी हैं, ऐसे में अपनी लड़की के लिए ऐसा रिश्ता ढूंढ रहा है जो संस्कारी हो, जो भारत की संस्कृति के बेहद करीब हो. इन्हीं मापदंडों पर कुछ परीक्षाएं पास करने के बाद तेजस फिट बैठ जाता है. अब लड़की के माता-पिता रिश्ते के लिए मान गए हैं, लेकिन तेजस के परिवार से मिलना बाकी है, ऐसे में अमेरिका से मजे मा की कहानी हिंदुस्तान दस्तक देती है और हमारी मुलाकात पल्लवी (माधुरी दीक्षित), मनोहर (गजराज राव), तारा ( सृष्टि श्रीवास्तव) से होती है. ये तेजस का परिवार है- मां पल्लवी डांस सिखाती है, पिता मनोहर अपनी सोसाइटी के प्रेसिडेंट हैं और बहन तारा एक सामाजिक कार्यकर्ता.

अब आगे की कहानी पल्लवी और उसके बेटे तेजस के इर्द-गिर्द ज्यादा घूमती है. पल्लवी की जिंदगी के कुछ ऐसे राज हैं, जो एक वायरल वीडियो के जरिए सभी के सामने आ जाते हैं. ये राज ऐसे हैं जिन्हें समाज आसानी से या कह लीजिए खुले दिमाग से स्वीकार नहीं कर सकता है. वो राज ही तेजस के शादी के सपनों के बीच आ जाते हैं. अब खुद पल्लवी कैसे उन राज से डील करती है, उसका परिवार उसका कितना साथ देता है, समाज उसे किस नजरिए से देखता है, मजे मा इन्हीं सवालों के जवाब 134 मिनट में टटोलती दिख जाती है.

ट्रेलर में कुछ, फिल्म निकली कुछ और 

मजे मा का रिव्यू करने से पहले इसके ट्रेलर की बात करना ज्यादा जरूरी हो जाता है. जरा थोड़ा फ्लैशबैक में जाइए, जब मजे मा का ट्रेलर रिलीज हुआ था, कहानी काफी मजेदार लग रही थी. हर सीन में कॉमेडी होगी, एक फन एलिमेंट होगा, ये तो सभी सोचकर बैठ गए थे. मजे मा का गुजराती में मतलब भी क्योंकि मस्ती में रहना होता है, तो और ज्यादा लगने लगा था कि फुल ऑन एंटरटेनमेंट होने वाला है. लेकिन अब जब फिल्म रिलीज हो गई है, वो सभी उम्मीदें टूटी हैं. इसे पॉजिटिव, निगेटिव कैसे भी ले सकते हैं, लेकिन एक बात स्पष्ट है- जो ट्रेलर में दिखाया गया, फिल्म में वैसा कुछ भी नहीं है. कहानी एकदम अलग है, मेकर्स ने ऐसा क्यों किया, इसका बेहतर जवाब वहीं दे पाएंगे.

मुद्दा ठीक उठाया, ट्रीटमेंट में झोल

इस फिल्म का रिव्यू लिखते समय एक बात का ध्यान और रखना पड़ रहा है कि कही कोई स्पॉइलर ना दे दिया जाए. असल में पूरी फिल्म एक ऐसे राज पर टिकी हुई है, जिसका ट्रेलर में कही जिक्र नहीं है, लेकिन पूरी फिल्म उसी पर आधारित है. इतना जरूर बता सकते हैं कि मेकर्स ने एक सामाजिक मुद्दा उठाया है जो पहले भी कई फिल्मों और सीरीज के जरिए एक्सप्लोर किया जा चुका है. लेकिन दिक्कत ये है कि मजे मा के मेकर्स ने उस मुद्दे को काफी 'पिछड़ा ट्रीटमेंट' दिया है. इसे ऐसे समझ सकते हैं कि एक बात को कहने को कई तरीके हैं, संवेदनशील मुद्दा हो तो इस बात का और ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है. लेकिन मजे मा में हुआ ये है कि मुद्दे को काफी रिग्रेसिवन ढंग से उठाया गया है. इस सब के ऊपर कुछ सीन्स में इतना ज्यादा ड्रामा दिखाया गया है कि आप भी अपना सिर पकड़ लेंगे. मतलब इस फिल्म में अगर किसी की सच्चाई का पता करना है तो सिर्फ एक तरीका है- लाइ डिटेक्टर टेस्ट. फिल्म के 10-15 मिनट तो ये टेस्ट ही खा गया है.

माधुरी दीक्षित का अच्छा काम

फिल्म के साथ प्लस प्वाइंट ये जरूर है कि इसने कुछ रिश्तों को बखूबी स्क्रीन पर उतारा है. फिर चाहे वो मां-बेटे के रूप में माधुरी दीक्षित और ऋत्विक का रिश्ता हो, या फिर माधुरी और गजराज राव का पति-पत्नी वाला रोल. माधुरी के उसकी बेटी बनी श्रृस्टि श्रीवास्तव के साथ भी बढ़िया और इंटेंस सीन्स देखने को मिले हैं. ये सब इसलिए हुआ है क्योंकि फिल्म में सिर्फ इन्हीं कलाकारों ने अच्छा काम किया है. मेकर्स ने माधुरी दीक्षित की अदाओं और उनके डांस स्किल्स का बखूबी इस्तेमाल किया है. इस सब के ऊपर उनके किरदार को अलग-अलग शेड्स दिए गए हैं, जिसके साथ एक्ट्रेस ने न्याय किया. फिल्म में जो थोड़ी बहुत कॉमेडी नजर आने वाली है, उसका श्रेय गजराज राव को जाता है. नेचुरल एक्टर हैं, इसलिए यहां भी काम अच्छा लगा है. ऋत्विक ने भी तेजस वाला रोल मजबूती के साथ निभाया है, श्रृस्टि भी अपने सामाजिक कार्यकर्ता वाले किरदार में ढल सी गई हैं. सिमोन सिंह का भी फिल्म में एक अहम किरदार है, माधुरी के साथ उनके कई सीन्स भी हैं, वे छाप छोड़ने में कामयाब रही हैं.

लेकिन स्टार कास्ट में ही एक बहुत बड़ा झोल भी है. फिल्म में बर्खा सिंह, शीबा चड्ढा और रजत कपूर के लिए कुछ भी नहीं है. ये फिल्म में लड़की वालों का पूरा परिवार है, यानी कि कहानी के कई सेगमेंट इनके खाते में गए हैं. लेकिन मेकर्स ने क्या सोचकर इन्हें अग्रेजी का एक ऐसा फर्जी एक्सेंट थमाया है कि पूरी फिल्म में ये सभी सिर्फ संघर्ष करते दिखे हैं. सारे अजीबोगरीब और 'रिग्रेसिव' डॉयलाग भी इन तीनों को ही मिले हैं. 

देखनी चाहिए या नहीं?

मजे माज का डायरेक्शन आनंद तिवारी ने किया है, समाजिक मुद्दे उठाने में इन्हें एक्सपर्ट भी कह सकते हैं. लेकिन इस बार ये चूके हैं, मुद्दा गलत नहीं उठाया है, नीयत में भी खोट नहीं है, लेकिन ट्रीटमेंट जिस तरह का दिया गया है, वो कई बार हैरान कर गया है. ये बात भी समझ से परे हैं कि जिस मुद्दे पर आपको इतना भरोसा था, उसे ट्रेलर में छिपाया क्यों गया? क्या पहले से डाउट था कि लोग इस मुद्दे पर शायद फिल्म देखना पसंद नहीं करेंगे? ये जो भरोसे की कमी रही, ये फिल्म के दौरान भी झलक जाती है. इसी वजह से हम कह रहे हैं कि मेकर्स ने सामिजक मुद्दे को एक पिछड़ा ट्रीटमेंट दिया है, थोड़ी और डेयरिंग दिखाते तो शायद ये फिल्म लीक से हटकर या गेमचेंजर मानी जाती.

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