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Film Review: उलझी स्क्रिप्ट ने काटे 'तितली' के पर

दिबाकर बनर्जी और यशराज के प्रोडक्शन में और कनु बहल के निर्देशन में बनी फिल्म तितली में अति यथार्थवाद की छाया है. इस फिल्म के रिव्यू से जानिए क्या दर्शकों को प्रभावित कर पाएगी तितली.

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फिल्म तितली
फिल्म तितली

फिल्म : तितली
डायरेक्टर: कनु बहल
स्टार कास्ट: शशांक अरोड़ा, अमित सयाल ,ललित बहल , रणवीर शौरी, शिवानी रघुवंशी
अवधि: 1 घंटा 57 मिनट
सर्टिफिकेट:A
रेटिंग: 2.5 स्टार

फिल्म 'तितली' के डायरेक्टर कनु बहल ने इसके पहले निर्माता निर्देशक दिबाकर बनर्जी की कई फिल्मों में सहायक निर्देशक के तौर पर काम किया है. कनु ने 'लव सेक्स और धोखा' फिल्म को लिखने में भी सहायता की है. इस बार दिबाकर ने कनु बहल को फिल्म 'तितली' डायरेक्ट करने का मौका दिया है और खुद यशराज फिल्म्स के साथ फिल्म को प्रोड्यूस भी कर रहे हैं. आइए जानते हैं कि कनु की तितली कितनी उड़ान भर पाई है.

कहानी
यह कहानी है दिल्ली के एक लूटेरे परिवार की जिसके मुखिया डैडी (ललित बहल) हैं और उनके तीन बेटे विक्रम (रणवीर शौरी), बावला (अमित सयाल) और तितली (शशांक अरोड़ा) हैं. परिवार का बिजनेस सिर्फ लूटमार का है जिसे घर के दोनों बड़े भाई विक्रम और प्रदीप तो आगे बढ़ाते हैं लेकिन सबसे छोटे तितली का इस काम में मन नहीं लगता और वो सब छोड़ छाड़ के आगे बढ़ जाना चाहता है. इसी बीच तितली की शादी सहित कहानी में कई मोड़ आते हैं. अब क्या तितली अपने मकसद में कामयाब हो पाता है या घरवालों की वजह से लूटपाट में लग जाता है? ये जानने के लिए आपको फिल्म देखनी जरूरी है.

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स्क्रिप्ट
फिल्म की कहानी खुद डायरेक्टर कनु बहल ने शरत कटारिया के साथ मिलकर लिखी है जो एक अलग तरह की सोच रखने वाले परिवार की जिंदगी को दर्शाता है. फिल्म में कल्पना से बचने की कोशिश की गई है. फिल्म का परिवार एक टिपिकल 'पुरुष प्रधान' परिवार है. फिल्म में हिंसा अपनी चरम सीमा पर दिखाई पड़ता है और लूटपाट के लिए बहुत सारा खून खराबा दिखाया गया है.

इतनी हिंसा एक वक्त के बाद बोर करने लगती है. स्क्रिप्ट फिल्म को बांधकर रख पाने में कई जगह असफल हो जाती है. फिल्म की कहानी एक तरफ 'पैसे की महत्ता' को दर्शाती है तो वहीं इसमें रोमांटिक एंगल बनाने के चक्कर कहानी कहीं और ही जाने लगती है. डार्क फिल्म में चमकदार लव स्टोरी घुसाने की कोशिश की गई है.

अभिनय
विक्रम के किरदार में रणवीर शौरी ने काफी उम्दा एक्टिंग की है वहीं टाइटल रोल कर रहे शशांक का काम सराहनीय है. बावला के किरदार में अमित सयाल ने बेहतरीन एक्टिंग की है खास तौर से कुछ गंभीर सीन्स में तो वो काफी जमे हैं. अगर कोई अच्छा डायरेक्टर एक सहज अभिनय करने वाले कलाकार की तलाश में है तो अमित सयाल उनकी खोज को पूरी कर सकते हैं. फिल्म में चार मर्दों के बीच नीलू उर्फ शिवानी ने भी एक मजबूत लड़की के रूप में अच्छा काम किया है.

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कमजोर कड़ी
फिल्म की कमजोर कड़ी इसकी बिखरी हुई स्क्रिप्ट है. गंभीर और डार्क कहानी के साथ-साथ लव स्टोरी का एंगल फिल्म को खिचड़ी बना देता है. इंटरवल से पहले फिल्म दर्शकों को बांधती है लेकिन इसके बाद स्क्रिप्ट में काफी झोल है. कुल जमा बात है कि स्क्रिप्ट और भी क्रिस्प, कसी हुई और टू द पॉइंट हो सकती थी.

क्यों देखें
अगर आप एडल्ट हैं, डार्क फिल्में पसंद हैं और ओवर रीयलिस्टिक सिनेमा के कायल हैं, तो यह फिल्म देख सकते हैं.

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