एक्ट्रेस लैला खान और उनके परिवार के पांच सदस्यों का अचानक गायब हो जाना और फिर एक आलीशान फार्महाउस के नीचे से उनकी सड़ती हुई लाशें मिलना- यह भारतीय अपराध जगत की सबसे खौफनाक और दिल दहला देने वाली सामूहिक हत्याओं में से एक है. साल 2011 में जब 'वफा: ए डेडली लव स्टोरी' जैसी फिल्म में राजेश खन्ना के साथ काम कर चुकीं लैला खान, अपनी मां सेलिना और चार भाई-बहनों के साथ अचानक लापता हो गईं, तो किसी को अंदाजा नहीं था कि इस गुमशुदगी के पीछे कितना भयानक सच छिपा है.
पूरे 15 साल बीत जाने के बाद भी यह मामला आज भी लोगों के जेहन में डर पैदा कर देता है. इस खौफनाक साजिश का अंत इगतपुरी के एक फार्महाउस के नीचे दबे छह कंकालों और एक बेरहम सौतेले पिता को मिली मौत की सजा के साथ हुआ, जबकि इस जुर्म का एक कथित मददगार आज भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है. मुंबई क्राइम ब्रांच के पूर्व अधिकारी अंबादास पोटे, जिन्होंने इस हाई-प्रोफाइल केस की कमान संभाली थी, उन्होंने हाल ही में मशहूर क्राइम राइटर हुसैन जैदी के साथ बातचीत में इस केस की उन परतों को खोला जो किसी भी कमजोर दिल इंसान को विचलित कर सकती हैं.
कैसे शुरू हुई कलह?
जांच अधिकारी अंबादास पोटे के मुताबिक, इस पूरे हत्याकांड की जड़ें परिवार के अंदरूनी कलह और लालच से जुड़ी हुई थीं. लैला खान की मां सेलिना ने परवेज टाक नाम के शख्स से तीसरी शादी की थी. यह पूरा परिवार मुंबई के ओशिवारा इलाके में एक साथ रहता था. लेकिन इस हंसते-खेलते परिवार में तब दरार आने लगी जब परवेज टाक को लैला के एक्टिंग करियर से दिक्कत होने लगी. वह नहीं चाहता था कि लैला फिल्मों में काम करे और साथ ही उसे इस बात की भी टीस थी कि लैला उसे तवज्जो नहीं देती थी.
टाक ने कई बार सेलिना के सामने अपनी नाराजगी जताई, लेकिन सेलिना ने हमेशा अपने बच्चों का पक्ष लिया और टाक की बातों को नजरअंदाज कर दिया. इसके बाद जब पारिवारिक संपत्ति को लेकर विवाद बढ़ा और टाक ने लैला को काम के सिलसिले में दुबई भेजने का दबाव बनाया, तो रिश्तों की कड़वाहट दुश्मनी में बदल गई. लैला के साफ मना करने के बाद टाक के सिर पर खून सवार हो गया और उसने पूरे परिवार को खत्म करने का खौफनाक प्लान तैयार किया.
फार्महाउस अचानक बन गया कत्लगाह
परवेज टाक ने अपनी इस साजिश को अंजाम देने के लिए बेहद शातिराना तरीका अपनाया. उसने नासिक के पास इगतपुरी में स्थित परिवार के ही एक फार्महाउस पर अपने एक जान-पहचान वाले शख्स को वॉचमैन के तौर पर रखवाया. इसके बाद उसने सेलिना और बच्चों को कुछ दिन वहां जाकर छुट्टियां बिताने के लिए राजी कर लिया. जब काफी दिनों तक पूरा परिवार मुंबई वापस नहीं लौटा, तो सेलिना के पहले पति नादिर शाह को शक हुआ और उन्होंने पुलिस में लापता होने की शिकायत दर्ज कराई.
शुरुआती तफ्तीश में पुलिस के हाथ कुछ खास नहीं लगा, लेकिन जब टीम ने परिवार के मुंबई वाले घर की तलाशी ली, तो वहां से पुलिस को परवेज टाक का एक पहचान पत्र हाथ लगा. इसके बाद पुलिस का पूरा शक टाक पर गहरा गया. आखिरकार, मुंबई पुलिस और जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया और टाक को कश्मीर के सुदूर इलाके से धर दबोचा.
डांस और फिर लोहे की रॉड से खूनी खेल
गिरफ्तारी के बाद जब पुलिस ने सख्ती से पूछताछ की, तो परवेज टाक ने जो कबूलनामा किया उसने पुलिस अधिकारियों के भी होश उड़ा दिए. टाक ने बताया कि पूरा परिवार अपनी मित्सुबिशी कार से बेहद खुश होकर फार्महाउस पहुंचा था. उस शाम सबने मिलकर बारबेक्यू का लुत्फ उठाया, गाने गाए, डांस किया और फिर थककर सोने चले गए. जब सब गहरी नींद में थे, तब टाक और उसके वॉचमैन साथी ने लोहे की रॉड और चाकुओं से पूरे परिवार पर हमला बोल दिया. इस खूनी खेल के बीच लैला के भाई इमरान ने गंभीर रूप से घायल होने के बाद भी अपनी मां और बहनों को बचाने की आखिरी कोशिश की, लेकिन वह नाकाम रहा.
टाक के सिर पर इस कदर हैवानियत सवार थी कि हर पीड़ित के जमीन पर गिर जाने के बाद भी वह तब तक उन पर वार करता रहा, जब तक कि उनकी सांसें पूरी तरह थम नहीं गईं. पुलिस को गुमराह करने के लिए हत्यारों ने परिवार की एक गाड़ी को जम्मू ले जाकर लावारिस छोड़ दिया ताकि सबको लगे कि परिवार देश छोड़कर भाग गया है.
तीन-तीन करके दफनाए गए शव
हत्याकांड को अंजाम देने के बाद लाशों को ठिकाने लगाने के लिए भी बेहद शातिर दिमाग का इस्तेमाल किया गया था. फार्महाउस के परिसर में एक स्विमिंग पूल बनाने के लिए पहले से ही एक बड़ा गड्ढा खुदा हुआ था. टाक और उसके साथी ने उसी गड्ढे को कब्र में तब्दील कर दिया. सबूतों को पूरी तरह मिटाने के लिए उन्होंने पहले तीन शवों को गड्ढे के सबसे नीचे रखा और उन्हें गद्दों व तकियों से ढक दिया.
इसके ठीक ऊपर बाकी बचे तीन शवों को रखा गया और फिर पूरे गड्ढे को मिट्टी से भरकर समतल कर दिया गया.जब क्राइम ब्रांच की टीम जांच के लिए फार्महाउस पहुंची, तो लगातार हुई बारिश के कारण उस गड्ढे के ऊपर की मिट्टी थोड़ी धंस गई थी. पोटे ने बताया कि इसी धंसी हुई जमीन ने उनका शक बढ़ाया. पुलिसकर्मियों ने जब वहां खुदाई शुरू की, तो टाक लगातार कहानियां बदलकर उन्हें भटकाने की कोशिश कर रहा था. करीब छह घंटे की कड़ी मशक्कत और गहरी खुदाई के बाद आखिरकार जमीन के भीतर से इंसानी कंकाल और अवशेष बाहर आने लगे, जिसे देखकर वहां मौजूद हर शख्स सन्न रह गया.
कानून का हंटर और कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
साल 2012 में जब यह मामला खुला था, तब मुंबई के तत्कालीन संयुक्त पुलिस आयुक्त (अपराध) हिमांशु रॉय ने सख्त लहजे में कहा था कि परवेज टाक एक बेहद शातिर और खतरनाक अपराधी है, लेकिन वह कानून के शिकंजे से बच नहीं पाएगा. उनका यह दावा सालों बाद सच साबित हुआ. एक दशक से भी लंबे समय तक चले ट्रायल के बाद, साल 2024 में मुंबई की एक सत्र अदालत ने परवेज टाक को दोषी पाते हुए मौत की सजा सुनाई. अदालत ने इस जघन्य अपराध को 'दुर्लभ से दुर्लभतम' (Rarest of Rare) श्रेणी में रखते हुए टिप्पणी की कि यह हत्याकांड इतनी बेरहमी से किया गया था जिसने समाज की सामूहिक आत्मा को झकझोर कर रख दिया.
यह कोई गुस्से में उठाया गया कदम नहीं था, बल्कि ठंडे दिमाग से की गई सामूहिक हत्याएं थीं, जिसके बाद बेहद चालाकी से सबूतों को छिपाया गया और यही वजह थी कि 17 महीनों तक दुनिया को इस बात की कानों-कान खबर नहीं हुई. हालांकि, परवेज टाक आज सलाखों के पीछे अपनी मौत की सजा का इंतजार कर रहा है, लेकिन उसका वो साथी जिसने इस कत्लेआम में उसका साथ दिया था, वह आज भी पुलिस के लिए एक अनसुलझी पहेली बना हुआ है.