ईरान के परमाणु परीक्षण को लेकर अमेरिका और इजराइल पूरी तरह से आक्रामक हैं. उन्होंने साफ कर दिया है कि वे ईरान को परमाणु शक्ति नहीं बनने देंगे. इसी कड़ी में इजराइल और अमेरिका ने पिछले 24 घंटे में ईरान पर हजारों बम गिरा दिए. इन हमलों में सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है.
अब परमाणु कार्यक्रम की बात निकली है तो भारत का 1998 का इतिहास याद आना लाजमी है. इस साल भारत ने अपना दूसरा न्यूक्लियर टेस्ट किया था. इसी ऐतिहासिक और रोंगटे खड़े कर देने वाली घटना को जॉन अब्राहम की फिल्म 'परमाणु- द स्टोरी ऑफ पोखरण' में बेहद खूबसूरती से दिखाया गया है.
खास बात ये है कि अमेरिका ने ईरान की तरह ही भारत को हर हाल में परमाणु परीक्षण करने से मना किया था और अपनी नजरें गड़ा रखी थीं. लेकिन, भारत ने अपनी सुरक्षा और संप्रभुता को ऊपर रखते हुए, अमेरिका के कड़े प्रतिबंधों और धमकियों की परवाह किए बिना राजस्थान के पोखरण में सफल परमाणु परीक्षण कर दुनिया को चौंका दिया था.
फिल्म परणाणु में क्या दिखाया गया?
फिल्म 'परमाणु' सीधे तौर पर 1998 में हुए 'ऑपरेशन शक्ति' (पोखरण-II) पर आधारित है. यह कहानी सिर्फ एक परीक्षण की नहीं, बल्कि उस जिद और जुनून की है जो भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के अधिकारियों में देश को परमाणु संपन्न बनाने के लिए था. फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक तरफ दुनिया भर की निगाहें भारत पर थीं, वहीं दूसरी तरफ भारतीय टीम चुपचाप अपने मिशन को अंजाम देने में जुटी थी.
फिल्म का सबसे रोमांचक हिस्सा वह है जब भारतीय टीम अमेरिकी सैटेलाइट की नजरों से बचकर परीक्षण की तैयारी करती है. पोखरण के रेगिस्तान में दिन के उजाले में काम करना नामुमकिन था क्योंकि उपग्रहों के कैमरे सब रिकॉर्ड कर रहे थे. फिल्म में दर्शाया गया है कि कैसे वैज्ञानिक और फौजी रात के अंधेरे में काम करते थे और सुबह होने से पहले सबूत मिटा देते थे, ताकि अमेरिका को भनक तक न लगे.
'परमाणु' सिर्फ तकनीकी जानकारी नहीं देती, बल्कि यह दिखाती है कि जब देश की सुरक्षा का सवाल हो, तो भारत किसी के दबाव में नहीं आता. यह फिल्म भारतीय दृढ़ इच्छाशक्ति का प्रमाण है, जिसने अंतरराष्ट्रीय दबाव की फिक्र न करते हुए भारत को दुनिया के परमाणु मानचित्र पर स्थापित किया.
अमेरिका नहीं चाहता था भारत बने परमाणु संपन्न
जानकारी के लिए आपको बता दें कि भारत ने अपना पहला परमाणु परीक्षण साल 1974 में कर दिया था. उस मिशन को 'स्माइलिंग बुद्धा' पुकारा गया. हालांकि दो दशक बाद दुनिया के कई देशों की परमाणु ताकत बढ़ गई. जिसके बाद भारत की सत्ता ने भी तय किया उन्हें ज्यादा परमाणु बनाने चाहिए.
लेकिन अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत जैसे देश न्यूक्लियर पावर पाएं . अमेरिका और बाकी देश इससे काफी गुस्सा भी थे. अब अमेरिका के मना करने के बावजूद भारत न्यूक्लियर टेस्ट करने जाता है. सबसे खास बात इस मिशन को बहुत गुपचुप पूरा करना था. जिसके लिए कुछ खास अफसरों को चुना गया. इन खास अफसरों को ना कोई स्पेशल रैंक दी गई, न सैलरी न ही कोई मेडल. फिल्म परमाणु में जॉन अब्राहम का किरदार डायलॉग भी बोलता है, जो इस तरह - 'हमने जो सोचा, वो देश के लिए था. हमने जो किया, वो देश के लिए है. हमने जो पाया, वो देश का होगा.'
अगर आपने 'परमाणु- द स्टोरी ऑफ पोखरण' (Parmanu- The Story of Pokhran) नहीं देखी है तो अभी देख लीजिए. कैसे राजस्थान में जैसलमेर का पोखरण फोर्ट में अड्डा बनता है. कैसे न्यूक्लियर टेस्ट होता है और सिर्फ 30 मिनट में कैसे 6 परीक्षण होते हैं. ये सब फिल्म में दिखाया जाता है.