
‘धुरंधर: द रिवेंज’ की कहानी कुछ ऐसी परतों में लिपटी है, जहां हर किरदार के पीछे एक रहस्य छिपा है और हर सीन के भीतर कोई अनकहा सच सांस ले रहा है. आदित्य धर ने बड़े ही बेहतरीन तरीके से इन्हें आपकी सोच और विवेक पर छोड़ दिया है.
लेकिन अगर कहानी को थोड़ा गहराई से खंगालें, तो एहसास होता है कि शायद कुछ ऐसे चेहरे भी थे- जो कभी सामने होकर भी सामने नहीं आए, लेकिन हर अहम मोड़ पर मौजूद थे. तो हमने सोचा क्यों अपनी इस खोज से आपकी भी पहचान कराएं. फिल्म देखते हुए हमें महसूस हुआ कि ये लोग भी भारतीय जासूस की कैटेगरी में आते हैं, पर इन्हें सामने से दिखाया नहीं गया. इन्हें फिल्म में हमने महसूस तो किया पर पहचान नहीं पाए.
धुरंधर में कितने जासूस?
आपको सबसे पहले लगेगा कि तीन- हमजा (रणवीर सिंह), मोहम्मद आलम (गौरव गेरा), रिजवान (मुस्तफा अहमद). फिर शायद उजैर बलोच (दानिश पंडोर)- पर नहीं, उजैर को तो फंसाया गया था, वो एजेंट नहीं था.
अब आपको याद आएंगे जमील जमाली (राकेश बेदी)? तो जवाब- बिल्कुल सही. इनका जिक्र भले ही शुरुआत में होता है, लेकिन खुलासा फिल्म के अंत में होता है. पर अभी और एक एजेंट है- जो पाकिस्तान में था पर किसी की नजर उसपर गई नहीं. या यूं कहें कि फिल्म मेकर आदित्त धर को जरूरत नहीं लगी कि उन्हें भी फौरी तौर पर सामने लाया जाए.
नोट: तो चलिए हम जिक्र कर देते हैं. हालांकि पहले बता दें कि ये सिचुएशन के आधार पर एक 'वाइल्ड गेस' है. हम ऐसा दावा नहीं करते हैं. और हां इस आर्टिकल को पढ़ते हुए आपको कुछ स्पॉइलर्स भी मिल सकते हैं.
मीम फेस्ट का हिस्सा बना ये जासूस!
कहानी को देखें और समझें तो लगता है कि वो एजेंट हैं- कैफे 'वाशमा भट्ट' के मालिक भट्ट साहब! हां, हम कह सकते हैं कि ये भी हिन्दुस्तानी एजेंट हैं. इसीलिए तो दुध सोडा वाले आलम जब पाकिस्तान आए तो पहली ही फुरसत में उन्हें यहां नौकरी मिली. आलम खुद फिल्म में बताते हैं कि- पाकिस्तान आने के बाद भट्ट साहब ने ही उन्हें पनाह दी, उन्होंने 6 साल तक भट्ट साहब के कैफे में नौकरी की तब जाकर ल्यारी में ठिकाना मिल पाया. ठीक वैसे ही जैसे हमजा को आलम के यहां मिली थी.
एक और तरीके से समझाते हैं. आलम और हमजा को जब भी अपने पर्सनल विचारों का डिस्कशन करना होता था, या अपना मन हल्का करना होता था, वो इसी कैफे में आते थे. ध्यान देने वाली बात ये है कि आलम-हमजा अपनी दुकान तक पर ऐसी बातें डिस्कस नहीं करते थे, फिर यही जगह क्यों?
किसी और का कैफे और पब्लिक प्लेस में होने के बावजूद आलम और हमजा अपना बड़ा प्लान यहीं डिस्कस करते थे. उस दौरान कैफे भी पूरा खाली पाया जाता. हमजा ने तो अपनी जिंदगी की पूरी कहानी आलम को यहीं सुनाई थी- कि कैसे वो जसकीरत से हमजा बना, कैसे उसने अतीफ अहमद से बंदूक खरीदी, विधायक के परिवार को मारा और फिर जेल से भगाकर अजय सान्याल ने उसे एजेंट बनने की ट्रेनिंग दी.

जैसे उसे पता था कि भट्ट साहब की दुकान सेफ्टी पॉइंट है. जैसे हर एजेंट को उसके एक खास मकसद के साथ मिशन पर भेजा जाता है, वैसे भट्ट साहब को बस नजर रखने के लिए अपॉइंट किया गया था, एक्शन लेने के लिए नहीं.
कुछ ऐसे जासूस भी रहे...
एक एजेंट को तो, आदित्य धर ने खुद ही जाहिर कर दिया था. हालांकि इसका नाम-पहचान नहीं बताई गई थी. पर 9/11 का पहला प्लान फेल हो जाने के बाद मेजर इकबाल ने इसे खूब टॉर्चर किया था. वो भारतीय था और पकड़ा भी गया था.
अब धुरंधर: द रिवेंज में जमील जमाली का खुलासा हुआ, तो इसी के साथ एक बंदे का जिक्र और मन में कौंध गया. ये जमील साहब के ड्राइवर हो सकते हैं. किसी का पर्सनल ड्राइवर होना- ऐसी जॉब है जिसमें सबसे भरोसे का आदमी रखा जाता है.
जमील जब हमजा को आखिर में मरगला हिल्स के अंधेरे रास्ते से उठाता है, वहां वो ड्राइवर के साथ ही आता है. कार के अंदर पिछली सीट पर बैठे हुए, जब वो हमजा को पत्नी-बेटे: यालिना और जायान को भूल जाने की बात कहता है, और उसके नए डॉक्यूमेंट्स उसे देता है, तब वो वहां मौजूद होता है. अब इसके बाद भले ही जमील जमाली ने एयरपोर्ट पहुंचने के बाद ड्राइवर को बाहर खड़े रहने का इशारा किया हो- लेकिन ड्राइवर हमजा से वाकिफ है कि वो कौन है. पाकिस्तान से भगाया जा रहा है.
ऐसे में जमील को सालों पुराना सच खुलने का डर तो लगेगा ही. तो मुमकिन है कि वो भी भारतीय ही हो. जिसकी पहचान उजागर नहीं की गई.
हमने तो कुल मिलाकर 7 गिन लिए. पर कहा जाए कि पाकिस्तान में हिंदुस्तानी एजेंट कई हैं, बस जरूरत के मुताबिक उन्हें प्लांट किया गया है और फिल्म में उनकी पहचान छुपाई गई है- तो गलत नहीं होगा.
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