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'इंडिया का लूथर' कहे गए पत्रकार का रोल करेंगे जुनैद खान? इस ऐतिहासिक केस पर बेस्ड है आमिर के बेटे की फिल्म!

‘महाराज’ की अनाउंसमेंट के साथ जो फोटो शेयर की गई, उसमें  दो चीजें ध्यान देने लायक है- तारीख में साल 1862 और बीच में लिखा 'सुप्रीम कोर्ट ऑफ बॉम्बे' (जो बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट बना). ये दोनों चीजें 'महाराज लाइबल केस' की तरफ इशारा करती हैं. आइए बताते हैं क्या था ये केस…

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जर्नलिस्ट करसनदास मुलजी, जुनैद खान
जर्नलिस्ट करसनदास मुलजी, जुनैद खान

भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की नींव रखने वाले सबसे महत्वपूर्ण ब्रिटिश अधिकारियों में से एक, वारेन हेस्टिंग्स का ट्रायल इतिहास के सबसे चर्चित राजनीतिक मामलों में से एक है. हेस्टिंग्स पर, कलकत्ता का पहला गवर्नर-जनरल रहते हुए भ्रष्टाचार और दुराचार का आरोप था. ब्रिटिश संसद में हेस्टिंग्स का ट्रायल 1787 में शुरू हुआ और अगले 7 साल तक चला. इसे ब्रिटिश इतिहास के सबसे लंबे पॉलिटिकल ट्रायल्स में गिना जाता है.

ऐसा ही एक चर्चित ट्रायल भारत में भी हुआ जिसे प्रेस में 'वारेन हेस्टिंग्स के बाद आधुनिक समय का सबसे बड़ा ट्रायल' कहा गया. और इस ट्रायल की जड़ बना जर्नलिस्ट करसनदास मुलजी का गुजराती में लिखा एक लेख. आप सोच सकते हैं कि आज, 163 साल बाद इस लेख और करसनदास का जिक्र क्यों किया जा रहा है? 

इसकी वजह है 29 फरवरी को नेटफ्लिक्स के ऑनलाइन इवेंट में अनाउंस हुए नए प्रोजेक्ट. इस लिस्ट में सुपरस्टार आमिर खान के बेटे, जुनैद खान की डेब्यू फिल्म भी है, जिसका फर्स्ट लुक शेयर किया गया. फिल्म का नाम है 'महाराज'. 

फोटो- जुनैद खान के साथ आमिर खान (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

क्या है 'महाराज'?

करसनदास के लेख के बाद उनपर मानहानि का मुकदमा शुरू हुआ, जिसे इतिहास में 'महाराज लाइबल केस' (महाराज मानहानि केस) के नाम से जाना जाता है. रिपोर्ट्स में सामने आया था कि डायरेक्टर सिद्धार्थ पी मल्होत्रा अपनी नेटफ्लिक्स फिल्म 'महाराज' में इसी केस की कहानी लेकर आ रहे हैं. मगर नेटफ्लिक्स इंडिया ने सोशल मीडिया पर फिल्म की जो अनाउंसमेंट शेयर की, उसमें ये बात कन्फर्म हो रही है. 

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अनाउंसमेंट के साथ जो फोटो शेयर की गई, वो एक अखबार के फ्रंट पेज जैसी है. इसमें दो चीजें ध्यान देने लायक है- तारीख में साल 1862 और बीच में लिखा 'सुप्रीम कोर्ट ऑफ बॉम्बे' (जो बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट बना). ये दोनों चीजें 'महाराज लाइबल केस' की तरफ इशारा करती हैं. रिपोर्ट्स बताती हैं कि 'महाराज' में जुनैद एक जर्नलिस्ट का रोल कर रहे हैं. और कहानी का कनेक्शन जोड़ें तो जुनैद का किरदार करसनदास मुलजी पर बेस्ड है.

फोटो- ‘महाराज’ के टीजर से एक सीन (क्रेडिट: यूट्यूब)

'इंडिया का लूथर'

1832 में पैदा हुए करसनदास मुलजी सिर्फ एक जर्नलिस्ट ही नहीं, समाज सुधारक भी थे. उन्होंने कॉलेज के दिनों में ही, दादाभाई नौरोजी के अखबार 'रास्त गोफ्तार' के लिए लिखना शुरू कर दिया था. एक लिटररी कॉम्पिटीशन के लिए जब उन्होंने विधवा पुनर्विवाह के पक्ष में लेख लिखा, तो उन्हें घर से निकाल दिया गया. लेकिन समाज में जारी कुरीतियों और पिछड़ेपन को लगातार चैलेंज करने के लिए करसनदास ने 1855 में अपना खुद का अखबार 'सत्यप्रकाश' निकालना शुरू किया. अपने लेखों में उन्होंने हिंदुओं के वैष्णव मत में आने वाले पुष्टिमार्ग संप्रदाय (इसे वल्लभ संप्रदाय भी कहते हैं) की कुरीतियों और धर्मगुरुओं के व्यवहार पर लगातार कड़े सवाल उठाए. उन्होंने पुष्टिमार्ग के धर्मगुरुओं, जिन्हें महाराज भी कहा जाता था, के बनाए बहुत से नियमों को लेकर खुलासे किए और सबसे गंभीर खुलासा ये किया कि वे महिला भक्तों पर सेक्सुअल संबंध बनाने के लिए दबाव बनाते हैं!

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वैष्णव संप्रदाय के एक धर्मगुरु जीवनलालजी महाराज ने एक केस के लिए कोर्ट में गवाही देने आने से इनकार कर दिया. महाराज ने लंदन से एक ऑर्डर निकलवाना चाहा कि वैष्णव धर्मगुरुओं को हमेशा के लिए, कोर्ट में पेश होने से छूट दी जाए. उन्होंने अपने अनुयायियों पर ये जोर डाला कि कोई वैष्णव न उनके खिलाफ लिखेगा, न उनपर मुकदमा करेगा. और अगर किसी ने केस किया तो सारा खर्च वैष्णव संप्रदाय के लोग मिलकर उठाएंगे और ये तय करेंगे कि महाराज को कोर्ट में पेश न होने दिया जाए. करसनदस ने लगातार इसके खिलाफ लिखना जारी रखा और इसका असर ये हुआ कि अनुयायी कम होने के बाद जीवनलालजी महाराज ने बॉम्बे छोड़ दिया. 

फोटो- करसनदास मूलजी (क्रेडिट: सोशल मीडिया)

वल्लभ संप्रदाय के धर्मगुरुओं के खिलाफ बन रहे माहौल को देखते हुए, सूरत के जादूनाथ महाराज ने बॉम्बे पहुंचकर कमान संभाली. जहां एक तरफ ट्रेडिशनल समाज महिला शिक्षा के खिलाफ था, वहीं जादूनाथ ने महिला छात्रों को सम्मानित करने वाले एक कार्यक्रम में हिस्सा लेकर बदलाव की एक उम्मीद भी दिखाई. मगर करसनदास पुरातनपंथी परंपराओं को उखाड़ फेंकने की अपनी मुहीम पर डटे हुए थे. 

21 सितंबर 1861 को उनका एक लेख बहुत विस्फोटक साबित हुए. गुजराती में लिखे इस आर्टिकल का शीर्षक हिंदी में कुछ यूं होता है- ‘हिंदुओं का असली धर्म और आज के पाखंडी मत’. लेख में उन्होंने कहा कि सम्प्रदाय के महाराज ‘व्यभिचार’ को बढ़ावा देते हैं और भक्तों पर दबाव बनाते हैं कि वे अपनी पत्नियों-बेटियों-बहनों को महाराज के साथ सेक्स के लिए प्रोत्साहित करें! करसनदास ने जादूनाथ महाराज का नाम लेते हुए सवाल उठाया कि किस वेद-पुराण-शास्त्र में ये लिखा है कि अपनी ब्याहता पत्नी को भोगने से पहले उसे पहले महाराज या किसी धर्मगुरु के लिए पेश करना चाहिए?

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रिपोर्ट्स के अनुसार, ‘महाराज’ में जयदीप अहलावत नेगेटिव शेड का एक किरदार निभा रहे हैं. ऑरिजिनल कहानी और जयदीप का टैलेंट देखते हुए लगता है कि शायद उनका किरदार, पुष्टिमार्ग के किसी धर्मगुरु पर बेस्ड हो. 

फोटो- ‘महाराज’ फर्स्ट कुक वीडियो का एक सीन (क्रेडिट: यूट्यूब)

इस लेख ने तूफान खड़ा कर दिया. जादूनाथजी महाराज ने करसनदास और उनके अखबार ‘सत्यप्रकाश’ पर मानहानि का मुकदमा ठोंक दिया और हर्जाने में 50,000 रुपये की मांग की, जो आज से 160 साल पहले बहुत ज्यादा बड़ी रकम थी. सुप्रीम कोर्ट ऑफ बॉम्बे में केस शुरू हुआ, मामला एक पूरे संप्रदाय की धार्मिक आस्था से जुड़ा था. दोनों पक्षों की तरफ से 64 गवाह पेश हुए. डॉक्टरों ने महाराज को सिफिलिस (सेक्सुअली ट्रांसमिट होने वाला एक इंफेक्शन) का ट्रीटमेंट देने की बात कही और कई गवाहों ने उनके ‘इरॉटिक’ एडवेंचर की कहानियां बताईं. 

अप्रैल 1862 में कोर्ट ने करसनदास के पक्ष में फैसला दिया. और उल्टे महाराज जादूनाथजी से, करसनदास को 11,500 रुपये हर्जाना देने का आदेश दिया. इस केस के लिए जनता में ऐसा उत्साह था जो पहले कभी नहीं देखा गया. करसनदास मूलजी ने जो किया, उसके लिए प्रेस ने मार्टिन लूथर किंग से तुलना करते हुए करसनदास मूलजी को ‘इंडिया का लूथर’ भी कहा. 

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पत्रकारिता के लिए भी ये केस एक नजीर बना. महाराज का मानहानि का दावा रिजेक्ट करते हुए कोर्ट ने कहा कि धर्मगुरु के दुष्कर्मों को एक्सपोज करके करसनदास अपना काम ही कर रहे थे. जजमेंट देते हुए कोर्ट ने कहा- ‘एक पत्रकार, जनता का टीचर होता है. प्रेस का असली काम ही लोगों को शिक्षित करना, ऊपर उठाना और ज्ञान देना है. इसी ने प्रेस को आधुनिक संसार की सबसे बड़ी शक्तियों में से एक बनाया है.’

करसनदास के समाज सुधार के काम, उनकी पत्रकारिता और निडरता की कहानियां, डेढ़ सदी से भी ज्यादा समय से कहीं दबी सी रह गई हैं. इसकी एक वजह ये भी है उनका अधिकतर काम गुजराती में था. अब जुनैद खान स्टारर ‘महाराज’ से इस इतिहास को खंगालना शुरू कर रही है. 

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