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UP Election: बीजेपी छोड़ रहे मंत्रियों-विधायकों की भाषा एक जैसी, CM योगी की बढ़ा सकती है टेंशन

उत्तर प्रदेश बीजेपी में मची भगदड़ ने पार्टी के सियासी समीकरण को बिगाड़ दिया है. बीजेपी ने पांच साल पहले जिस सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सत्ता का वनवास खत्म किया. बीजेपी छोड़ने वाले विधायक और मंत्री उसी पर चोट कर रहे हैं. यूपी में अभी तक जिन विधायक और मंत्रियों ने पार्टी छोड़ा है, उनमें ज्यादातर ओबीसी हैं. ऐसे में एक भाषा में योगी सरकार पर दलित-पिछड़ों के साथ भेदभाव करने का आरोप लगा रहे हैं.

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स्वामी प्रसाद मौर्य, अखिलेश यादव, रोशनलाल वर्मा स्वामी प्रसाद मौर्य, अखिलेश यादव, रोशनलाल वर्मा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • योगी कैबिनेट के तीन मंत्री दे चुके हैं इस्तीफा
  • बीजेपी छोड़ने वाले ज्यादातर नेता ओबीसी हैं
  • बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग को लगी चोट

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के ऐलान के साथ ही बीजेपी को एक के बाद एक लगातार सियासी झटके लग रहे हैं. स्वामी प्रसाद मौर्य का मंत्री पद से इस्तीफा और बीजेपी छोड़ने के बाद से दो मंत्री दौरा सिंह चौहान और धर्म सिंह सैनी सहित आधा दर्जन से ज्यादा विधायकों ने पार्टी को अलविदा कह दिया है. बीजेपी छोड़ने वाले तीनों मंत्रियों और सभी विधायकों की भाषा एक जैसी है और बीजेपी की सोशल इंजीनियरिंग को चोट करने वाली मानी जा रही है.

स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को कैबिनेट से दिए इस्तीफे में जिन बातों का जिक्र करते हुए योगी सरकार पर आरोप लगाया था. उसी बात को सभी मंत्रियों और विधायकों ने भी अपने इस्तीफे में दोहराया है. सहारनपुर के नकुड़ सीट से विधायक और योगी सरकार में आयुष मंत्री धर्म सिंह, शिकोहाबाद के विधायक मुकेश वर्मा, औरया से बिधूना विधायक विनय शाक्य और लखीमपुर खीरी से विधायक बाला प्रसाद अवस्थी ने इस्तीफा दे दिया है. इसके अलावा सुल्तानपुर सदर से विधायक सीताराम वर्मा ने भी इस्तीफा दे दिया है. 

एक सुर में बोल रहे हैं बीजेपी छोड़ने वाले मंत्री-विधायक
गुरुवार को बीजेपी छोड़ने वाले धर्म सिंह सैनी ने अपने इस्तीफे में लिखा है बीजेपी की प्रदेश सरकार ने अपने पांच वर्षों के कार्यकाल में दलित, पिछड़ों, वंचितों, किसानों और अल्पसंख्यक समुदाय के नेताओं व जनप्रतिनिधियों को कोई तवज्जो नहीं दी और न ही उन्हें उचित सम्मान दिया. मुकेश वर्मा, विनय शाक्य, सीताराम वर्मा और बाला प्रसाद अवस्थी ने भी इन्हीं बातों का जिक्र करते हुए योगी सरकार और बीजेपी पर सवाल खड़े किए थे. 

बता दें कि योगी कैबिनेट से सबसे पहले स्वामी प्रसाद मौर्य ने मंगलवार को मंत्री पद से इस्तीफा दिया था. इस दौरान उन्होंने अपने इस्तीफे में जिस बात को लिखा था, उन्हीं बातों को दारा सिंह चौहान ने भी बुधवार को अपने इस्तीफे में लिखा. इससे पहले बीजेपी विधायक भागवती सागर, रोशनलाल वर्मा, ब्रजेश प्रजापति के इस्तीफे की भाषा भी यही थी. योगी सरकार पर उन्हीं बातों का आरोप लगाया, जिसे लेकर स्वामी प्रसाद मौर्य ने बीजेपी छोड़ी थी.

योगी सरकार पर गंभीर आरोप लगाए
बीजेपी छोड़ रहे मंत्रियों और विधायकों की भाषा एक जैसी होने के साथ-साथ एक बात और भी मिल रही है कि ज्यादातर ओबीसी समुदाय से जुड़े हुए हैं. इसके अलावा जिन तीनों मंत्रियों ने इस्तीफा दिया है, वो 2017 के चुनाव में बसपा से बीजेपी में आए थे. बीजेपी छोड़ने वाले विधायक भी स्वामी प्रसाद मौर्य के करीबी माने जाते हैं, जिसके चलते साफ जाहिर होता है कि 
इन सभी नेताओं के इस्तीफों की भाषा एक ही जगह लिखी गई है. 

इस्तीफे में जिस तरह से योगी सरकार और बीजेपी पर दलित, पिछड़ों, वंचितों को लेकर आरोप लगाए गए है. इससे साफ है कि इस्तीफे के जरिए ओबीसी और दलित वोटों को सियासी संदेश देने की रणनीति है. यूपी में बीजेपी की ओबीसी राजनीति का किला ध्वस्त करने का सोचा-समझा प्लान माना जा रहा है. बीजेपी के ओबीसी विधायक-मंत्रियों को जिस तरह से इस्तीफे आए हैं, वो भी पुष्टि कर रहे हैं कि अखिलेश से पूरी तरह आश्वासन पाने के बाद ही इन सभी नेताओं ने बीजेपी को छोड़ने का फैसला लिया है. इस्तीफा के बाद भी इन सभी नेताओं के अखिलेश यादव के साथ तस्वीर भी सामने आ रही है. 

CM योगी की छवि को नुकसान
बीजेपी के सामने अपने उस सोशल इंजीनियरिंग को बचाने की चुनौती खड़ी हो गई है, जिसके बूते उसे बीते विधानसभा चुनाव में तीन-चौथाई का बड़ा और ऐतिहासिक बहुमत हासिल हुआ था. मुश्किल यह है कि बीजेपी ने सोशल इंजीनियरिंग को उन्हीं बाहर से लाए नेताओं के समूह ने बीते चुनाव में जमीनी स्तर पर मजबूती दी थी. अब ऐसे ही नेताओं का समूह ठीक चुनाव से पहले पार्टी की फिजा खराब करने में जुटे हैं. बीजेपी छोड़ने वाले सभी मंत्री और विधायकों ने योगी सरकार पर पिछड़ों-दलित और सामाजिक न्याय की राजनीति को कमजोर करने का आरोप लगाया है. 

बीजेपी की यह भगदड़ का सर्वाधिक नुकसान सीएम योगी आदित्यनाथ की छवि को हो रहा है. वह भी ऐसे समय, जब पार्टी 'योगी उत्तर प्रदेश के लिए उपयोगी' के नारे से चुनाव मैदान में है. जाहिर तौर पर ओबीसी नेताओं के इस भगदड़ के कारण योगी की स्थिति को कमजोर कर रहा है, क्योंकि सभी नेता एक सुर में दलित-पिछड़ो के साथ भेदभाव किए जाने के आरोप लगा रहे है. 

बीजेपी की बढ़ने वाली है चिंता
दरअसल इस बार सपा का निशाना भाजपा का गैर-यादव पिछड़ा वोट बैंक है. सपा के रणनीतिकारों को पता है कि इस वोट बैंक में बड़ी सेंध लगाए बिना सत्ता की चाबी हासिल नहीं होगी. सपा जब इस रणनीति पर आगे बढ़ रही थी, तब बीजेपी की ओर से इसका काउंटर करने की पहल नहीं की गई. इसका नतीजा यह हुआ कि नाराज ओमप्रकाश राजभर सपा के साथ चले गए. बसपा के कई गैर-यादव कद्दावर नेताओं ने भी सपा का दामन थाम लिया. 

उत्तर प्रदेश में अलग-अलग जातियों में असर रखने वाले और कुछ खास इलाकों में असर रखने वाले कई छोटे समूह भी सपा के साथ चले गए. इन सभी छोटे दलों का आधार ओबीसी जातियों के बीच है. स्वामी प्रसाद मौर्य और बाकी विधायकों के इस्तीफों से पहले ही अखिलेश यादव ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव पार्टी, केशवदेव मौर्य की महान दल, जनवादी पार्टी से समझौता कर चुके थे. अपना दल की अनुप्रिया पटेल की मां कृष्णा पटेल भी अखिलेश खेमे में हैं. ऐसे में निश्चित तौर पर बीजेपी की चिंता बढ़ गई है.

 

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