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यूपी में निषाद पार्टी से बीजेपी का गठबंधन कितनी कर पाएगा राजभर की भरपाई

उत्तर प्रदेश में एनडीए से नाता तोड़कर अलग हो चुके भारतीय सुहेलदेव पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर की सियासी भरपाई के लिए बीजेपी ने निषाद पार्टी के साथ हाथ मिलाया है. ऐसे में देखना है कि बीजेपी और निषाद पार्टी की यह सियासी दोस्ती 2022 में क्या राजनीतिक गुल खिलाती है, क्योंकि दोनों ही नेता पूर्वांचल से है और इनका सियासी आधार भी अपनी-अपनी जातियों पर टिका है.

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स्वतंत्रदेव सिंह, धर्मेंद्र प्रधान, संजय निषाद स्वतंत्रदेव सिंह, धर्मेंद्र प्रधान, संजय निषाद
स्टोरी हाइलाइट्स
  • निषाद पार्टी का यूपी में बीजेपी के साथ गठबंधन
  • संजय निषाद क्या राजभर की भरपाई कर पाएंगे
  • पूर्वांचल की सियासत में निषाद-राजभर अहम हैं

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी अपना जातीय समीकरण और सियासी गठजोड़ बनाने में जुट गई है. ऐसे में बीजेपी ने 2022 के चुनाव के लिए अपना दल (एस) के अलावा संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने का ऐलान किया है. यूपी के चुनाव प्रभारी केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने निषाद पार्टी के साथ गठबंधन का औपचारिक ऐलान किया है. हालांकि.निषाद पार्टी सूबे में कितनी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ेगी, इस पर मुहर नहीं लगी. 

माना जा रहा है कि यूपी में एनडीए से नाता तोड़ चुके भारतीय सुहेलदेव पार्टी के प्रमुख ओम प्रकाश राजभर की भरपाई के लिए बीजेपी ने निषाद पार्टी के साथ हाथ मिलाया है. ऐसे में देखना है कि बीजेपी और निषाद पार्टी की यह सियासी दोस्ती 2022 में क्या राजनीतिक गुल खिलाती है?  

बीजेपी ने 2017 में बनाया सियासी समीकरण

बता दें कि बीजेपी यूपी में 15 साल के सियासी वनवास को खत्म करने के लिए 2017 के चुनाव में अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस) और ओम प्रकाश राजभर की पार्टी के साथ हाथ मिलाया था. इस तरह बीजेपी पिछड़ी जातियों में प्रभावशाली माने जाने वाले पटेल व राजभर को साथ लेकर 325 सीटों के साथ प्रचंड जीत हासिल थी. सूबे में योगी सरकार में ओम प्रकाश राजभर को कैबिनेट मंत्री भी बनाया गया था, लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी के साथ उनके रिश्ते बिगड़ गए और एनडीए से बाहर हो गए हैं. 

पूर्वांचल में राजभर वोटर अहम है

पूर्वांचल के कई जिलों में राजभर समुदाय का वोट राजनीतिक समीकरण बनाने और बिगाड़ने की ताकत रखता है. यूपी में राजभर समुदाय की आबादी करीब 3 फीसदी है, लेकिन पूर्वांचल के जिलों में राजभर मतदाताओं की संख्या 12 से 22 फीसदी है. गाजीपुर, चंदौली, मऊ, बलिया, देवरिया, आजमगढ़, लालगंज, अंबेडकरनगर, मछलीशहर, जौनपुर, वाराणसी, मिर्जापुर और भदोही में इनकी अच्छी खासी आबादी है, जो यूपी की चार दर्जन विधानसभा सीटों पर असर रखते हैं. 

2017 में ओमप्रकाश राजभर और बीजेपी के साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था, इसका सियासी फायदा दोनों पार्टियों को मिला था. बीजेपी ने राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी को 8 और अपना दल (एस) को 11 सीटें दी थी जबकि खुद 384 सीटों पर चुनाव लड़ी थी. राजभर की पार्टी को चार सीटों पर जीत मिली थी जबकि अपना दल 9 सीटें जीती थी.यूपी की लगभग 22 सीटों पर बीजीपी की जीत में राजभर वोटबैंक बड़ा कारण था. 

राजभर के कमी की भरपाई करेंगे निषाद

ओमप्रकाश राजभर की सियासी कमी की भरपाई के लिए बीजेपी ने संजय निषाद की निषाद पार्टी के साथ मिलकर 2022 के चुनाव लड़ने का फैसला किया है ताकि पूर्वांचल में सियासी समीकरण को मजबूत बनाया जा सके. ओम प्रकाश राजभर बलिया से हैं तो संजय निषाद गोरखपुर से हैं. इस तरह से दोनों ही पूर्वांचल और अतिपिछड़ी जाति से आते हैं. यही वजह है कि बीजेपी ने संजय निषाद को साथ लाकर अपना सियासी समीकरण को दुरुस्त करने की कवायद की है. 

निषाद के आने से बीजेपी को मिलेगा फायदा

2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने संजय निषाद को साथ लेकर ओम प्रकाश राजभर की 'मोनोपोली' (एकाधिकार) को तोड़ने में सफल रही थी. बीजेपी ने संजय निषाद के बेटे को संतकबीरनगर से संसदीय का चुनाव अपने सिंबल पर लड़ाया था, जिसके चलते पूर्वांचल में निषाद समुदाय का एकमुश्त वोट उसे मिला था. 2022 के चुनाव में बीजेपी फिर से इसी समीकरण को जमीन पर उतारने का दांव चला है, जिसके लिए निषाद पार्टी से गठबंधन की औपचारिक घोषणा कर दी है. 

बीजेपी ने संजय निषाद के जरिए अति पिछड़ों में सर्वाधिक जनसंख्या वाले निषाद जाति संबंधित करीब 6-7 उपजातियों को साधने की कोशिश की है. राजभर समुदाय की तरह निषाद समुदाय का भी पूर्वांचल में अच्छा खासा वोट बैंक हैं. निषाद समुदाय के तहत निषाद, केवट, बिंद, मल्लाह, कश्यप, मांझी, गोंड आदि उप जातियां आती हैं. सूबे में 20 लोकसभा सीटें और तकरीबन 60 के करीब विधानसभा सीटें ऐसी हैं जहां निषाद वोटरों की संख्या अच्छी खासी है. 

गोरखपुर, गाजीपुर, बलिया, संतकबीर नगर, मऊ, मिर्जापुर, भदोही, वाराणसी, इलाहाबाद ,फतेहपुर, सहारनपुर और हमीरपुर जिले में निषाद वोटरों की संख्या अधिक है. ऐसे में बीजेपी ने संजय निषाद को साथ मिलाकर राजभर समजा की नाराजगी से संभावित नुकसान से बचने के लिए की कवायद की है, लेकिन सूबे में निषाद समाज अलग-अलग खेमों में बटे हैं और सभी खेमों के अलग-अलग नेता हैं. बिहार में निषाद समुदाय के मंत्री और वीआईपी पार्टी के अध्यक्ष मुकेश सहनी भी यूपी में चुनाव लड़ने का दम भर रहे हैं.

निषाद वोटों पर विपक्ष की नजर

सपा से लेकर कांग्रेस तक की नजर सूबे में निषाद समुदाय के वोटों पर है. सपा निषाद समुदाय से आने वाली फूलनदेवी की मूर्ती को गोरखपुर में लगाने का ऐलान किया है. इतन ही नहीं अखिलेश यादव ने सपा के पिछड़ा वर्ग के मोर्चा की कमान डा राजपाल कश्यप  को सौंप रखी है तो विशंभर प्रसाद निषाद जैसे नेता पार्टी के राज्यसभा सदस्य हैं. वहीं, कांग्रेस भी निषादों को साधने के लिए बोट यात्रा यूपी में निकाल चुकी हैं. ऐसे में देखना है कि निषाद समुदाय 2022 के चुनाव में किसकी नैया पार लगाते हैं. 

 

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