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5 उसूल, जिनसे AAP ने रच डाले राजनीति के खेल के नए नियम

5 उसूल, जिनसे AAP ने रच डाले राजनीति के खेल के नए नियम. राजनीतिक उदासीनता के दौर में आम आदमी पार्टी की जीत अच्छाई की जीत है.

अरविंद केजरीवाल की AAP ने रचा इतिहास अरविंद केजरीवाल की AAP ने रचा इतिहास

राजनीतिक उदासीनता के दौर में आम आदमी पार्टी की जीत अच्छाई की जीत है. हमने वो कहानियां भी सुनी हैं जो जातीय समीकरणों के मायने और अहमियत बताती हैं. ये भी हमें कई-कई बार बता दिया गया है कि राजनीति में धन और बाहुबल का महत्व है, ईमानदारी और पारदर्शिता का नहीं. कहा भी जाता है कि राजनीति अच्छे लोगों के लिए नहीं है. हमारे देश का चुनावी इतिहास ऐसी मिसालों से पटा हुआ है कि कैसे अच्छे उम्मीदवार हारने के लिए इलेक्शन में खड़े होते हैं. इस मुल्क के राजनीतिक इतिहास में ऐसी मिसालों ने अच्छे लोगों को सियासत में आने से हमेशा रोका. लेकिन अपने पहले ही चुनाव में व्यापक जनसमर्थन हासिल करने वाली आम आदमी पार्टी ने इस परंपरागत रुझान को बदल डाला है और फिर से रच डाले हैं राजनीतिक के खेल के नए नियम....

1. 'दिलेरी' को सलाम
मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह ने हैट्रिक लगा दी है. वैसे तमाम प्री-पोल सर्वे भी उन्हें अजेय बता रहे थे. लेकिन इसके बावजूद वह दो विधानसभा सीटों से चुनाव लड़े. अपनी ही सीट पर ना हार जाएं, इसलिए एहतियात के तौर पर उन्होंने बुधनी के साथ विदिशा से चुनाव मैदान में उतारने का फैसला किया.

वहीं अगर केजरीवाल की बात करें तो ना सिर्फ उनकी पार्टी चुनावी अखाड़े में पहली बार उतरी, बल्कि उन्होंने भी पहली बार चुनाव लड़ा. दिल्ली में कांग्रेस को लगातार तीन बार सत्ता दिलाने वाली पार्टी की दिग्गज नेता शीला दीक्षित के खिलाफ उन्होंने चुनाव लड़ने का ऐलान किया. अरविंद के पास एक सुरक्षित सीट से चुनाव लड़ने का विकल्प था, लेकिन वह शीला दीक्षित के राजनीतिक इतिहास से नहीं डरे. क्या होगा अगर पार्टी का नेता ही अपनी सीट हार जाए? ऐसा 'अगर-मगर' का सवाल केजरीवाल के जेहन में नहीं आया और जनता ने उनकी इस दिलेरी और साहस का सम्मान किया.

2. 'आदर्शों' को सलाम
कांग्रेस और बीजेपी सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी की बात करती हैं. लेकिन जब चुनाव आते हैं तो वो दोनों उम्मीदवारों के चयन के मामले में ईमानदारी की बजाय 'जीतने की योग्यता' को तवज्जो देती हैं. लेकिन केजरीवाल ने उन्हें गलत साबित कर दिया. पार्टी बनाते वक्त उन्होंने जनता से वादा किया कि वह किसी भी दागी व्यक्ति को टिकट नहीं देंगे. अन्य पार्टियों द्वारा आरोप लगाए जाने के बाद उन्होंने चुनाव से महज 4 दिन पहले पार्टी का एक उम्मीदवार हटा दिया. जाहिर है आम आदमी पार्टी को अपने उसूलों और आदर्शों की परवाह है.

3. 'ईमानदारी' को सलाम
सब जानते थे कि केजरीवाल की पार्टी के पास एक ही चीज है- ईमानदारी. यही उसकी दौलत है और यही उसका विरोधी पार्टियों को मात देने का हथियार, इसलिए अन्य पर्टियों ने कई मर्तबा उनकी और उनकी पार्टी की छवि पर दाग लगाने की कोशिश की. कई बार खुद केजरीवाल और पार्टी के अन्य नेताओं को निशाना बनाते हुए उनके खिलाफ जांच कराई गई. यहां तक कि अन्ना हजारे ने भी पार्टी की सत्यनिष्ठा पर सवाल उठाए. लेकिन केजरीवाल डटे रहे और अपनी ईमानदारी और पारदर्शिता का सबूत देते रहे. थोड़े वोटों से हारने वाली शाजिया इल्मी पर जब एक स्टिंग ऑपरेशन के जरिए गलत ढंग से पैसे वसूलने के आरोप लगे तो उन्होंने उम्मीदवारी छोड़ने का फैसला कर लिया था. चुनावी मैदान में वह तभी वापस आईं जब ये पाया गया है कि उन्हें फंसाने के लिए स्टिंग ऑपरेशन की टेपों के साथ छेड़छाड़ की गई है. जनता ने यह सब देखा और 'आप' को समर्थन दिया, क्योंकि उसके लिए ईमानदारी काफी मायने रखती है.

4. 'युवा' को सलाम
अधिकांश राजनीतिक पार्टियां युवाओं को सत्ता में भागीदारी की बात करती हैं. लेकिन सच तो यह है कि उनके ये जुमले सिर्फ होठों तक ही सीमित होते हैं. चुनावों में जब टिकट देने की बात आती है तो पार्टी आलाकमान दिग्गज और अनुभवी नेता को ही चुनता है. उनके मुताबिक राजनीति कूटनीति का खेल है, जो कि तजुर्बेकार नेता ही समझ सकते हैं. अगर वह युवा को टिकट देते भी हैं तो सत्ता और पार्टी की कमान उन्हीं उम्रदराज नेताओं के पास रहती है. लेकिन केजरीवाल इस स्थिति के उलट युवा वोटर और युवा उम्मीदवारों को तवज्जो दी. नतीजा सबके सामने है. दिल्ली विधानसभा का सबसे युवा सदस्य उन्हीं की पार्टी का है, जिसकी उम्र 25 साल है. जनता ने केजरीवाल के इस 'युवा' आदर्श पर मुहर लगाई.

5. 'जनता के मुद्दों' को सलाम
वैसे तो कांग्रेस और बीजेपी दोनों जनता से जुड़े मुद्दों की बात करते दिखते हैं. लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के मुद्दे को दरकिनार कर दिया. बीजेपी ने इस मुद्दे को अपनी सुविधा और फायेद के मुताबिक भुनाया. इसी मुद्दे ने बीजेपी को अपना सीएम उम्मीदवार हर्षवर्धन को बनाने के लिए मजबूर कर दिया, जबकि केजरीवाल ने इस समस्या को एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया. उन्होंने महंगी बिजली-पानी और आम जनता से जुड़ी समस्याओं को मुद्दा बनाया. साफ है कि ये विधानसभा चुनाव मोदी बनाम राहुल गांधी नहीं, बल्कि जनता बनाम व्यवस्था की जंग थे.

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