ने वाम मोर्चे की 34 वर्ष पुरानी ‘दादागिरी’ समाप्त करते हुए में तृणमूल कांग्रेस का परचम लहराया, जबकि जयललिता की अन्ना द्रमुक ने द्रमुक का सफाया कर तमिलनाडु में सत्ता तक पहुंच बनाई. कांग्रेस असम और केरल में अपना झंडा बुलंद करने में कामयाब रही जबकि पांडिचेरी थोडे अंतर से उसके हाथ से फिसल गया.
विधानसभा चुनाव के शुक्रवार को घोषित नतीजों में अब तक की स्थिति के अनुसार असम में कांग्रेस ने शानदार तिकड़ी जमाते हुए दो तिहाई बहुमत के साथ अपना गढ़ मजबूत किया और केरल में महीन बहुमत से वाम लोकतांत्रिक मोर्चे से सत्ता छीन ली. हालांकि पुडुचेरी में उसे बागियों के हाथों सत्ता गंवानी पड़ी.
पश्चिम बंगाल में परिवर्तन के रथ पर सवार ममता ने तीन दशक से अधिक समय से सत्ता पर काबिज वाम विचारधारा को जड़ से उखाड़ फेंका. ममता ने अपने सहयोगी दलों कांग्रेस और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर ऑफ इंडिया (एसयूसीआई) के साथ मिलकर वाम मोर्चे को तगड़ा झटका दिया. ममता के गठबंधन को 294 सदस्यीय विधानसभा में 225 सीटें मिलीं. रेल मंत्री ममता बनर्जी ने हालांकि खुद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ा.
तृणमूल कांग्रेस ने 142 सीटें जीत ली हैं और 44 सीटों पर उसके उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं, जबकि कांग्रेस को 36 सीटें मिली हैं और वह पांच सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. दूसरी ओर विरोधी खेमे में वाम मोर्चे का नेतृत्व करने वाली माकपा ने 32 सीटें जीती हैं और वह आठ सीटों पर बढ़त बनाए हुए है. माकपा को इन चुनाव परिणामों में शर्मिंदगी झेलनी पड़ी क्योंकि मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य सहित उनके कई बड़े नाम धराशाई हो गए. हार के फौरन बाद भट्टाचार्य ने इस्तीफा दे दिया.
पश्चिम बंगाल और केरल में हार के बाद अब वाम मोर्चे के पास ले देकर त्रिपुरा में ही सरकार बची है.
तमिलनाडु ने विजेता को सब कुछ सौंप देने की अपनी प्रतिष्ठा बरकरार रखते हुए जयललिता को शानदार तरीके से सत्ता के गलियारों तक पहुंचाया. उनका गठबंधन 234 सदस्यीय विधानसभा में 200 सीटें जीत चुका है.
अन्नाद्रमुक को अपने बूते पर ही 150 सीटें मिलने की संभावना है. पार्टी 73 सीटें जीत चुकी है और अन्य 77 सीटों पर उसके उम्मीदवार बढ़त बनाए हुए हैं.
द्रमुक ने सिर्फ 10 सीटें जीती हैं और 13 पर उसके उम्मीदवार आगे हैं, जबकि 63 सीटों पर चुनाव लड़ने वाली सहयोगी कांग्रेस पार्टी केवल चार सीटें ही जीत पाई है और एक पर उसका उम्मीदवार अपने प्रतिद्वंद्वियों से आगे है. प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के वी थंगबालू चेन्नई के मैलापुर में 30 हजार से अधिक वोट से पीछे चल रहे हैं.
2006 के चुनाव तमिलनाडु के लिए अलग नतीजे लेकर आए थे, जब राज्य में पहली बार अल्पमत सरकार बनी थी. द्रमुक ने उस समय 96 सीटें जीती थीं और कांग्रेस तथा अन्य के बाहर से मिले समर्थन के बूते पर सरकार बनी थी. अन्नाद्रमुक को 61 सीटों पर जीत हासिल हुई थी. जयललिता और मुख्यमंत्री करूणानिधि क्रमश: श्रीरंगम और तिरूवरूर विधानसभा क्षेत्र से विजयी हुए हैं, जबकि उप मुख्यमंत्री और द्रमुक के हैवीवेट एम के स्तालिन कोलाथुर में पीछे चल रहे हैं. पार्टी की हार के बाद करूणानिधि ने इस्तीफा दे दिया है.
असम में कांग्रेस ने शानदार प्रदर्शन किया और पार्टी तीसरी बार सत्ता में लौटी. कांग्रेस ने 2006 के मुकाबले अपनी स्थिति में काफी सुधार किया है. उस समय पार्टी को 126 सदस्यीय विधानसभा में 53 सीटें मिली थीं, जबकि इस बार पार्टी 60 सीटें जीत चुकी है और 18 पर उसके उम्मीदवार आगे चल रहे हैं.
असम में मुख्य विपक्षी दल असम गण परिषद का सूपड़ा साफ हो गया है और उसे केवल पांच सीटें ही हाथ लगी हैं, जबकि छह अन्य स्थानों पर उसके उम्मीदवार बढ़त पर हैं. पिछली विधानसभा में परिषद के पास 24 सीटें थीं.
केरल में वाम मोर्चे की हार उतनी शर्मनाक नहीं रही, जितनी पश्चिम बंगाल में, जहां वाम लोकतांत्रिक मोर्चा सत्ता की दौड़ में कांग्रेस नेतृत्व वाले संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चे के साथ कदम से कदम मिलाकर दौड़ता रहा, लेकिन अंतत: उसे मामूली अंतर से हार स्वीकार कर लेनी पड़ी. यूडीएफ को 72 सीटें मिलीं, जो 140 सदस्यीय विधानसभा में आधे से दो अधिक हैं. इसी तरह एलडीएफ को 68 सीटें मिली हैं. वयोवृद्ध मार्क्सवादी नेता वी एस अच्युतानंदन ने अकेलेदम भ्रष्टाचार के खिलाफ जो अभियान चलाया, उससे यूडीएफ की झोली में आने वाली सीटों में कमी आई.
87 वर्षीय मुख्यमंत्री ने माकपा को सबसे बड़े दल के रूप में उभरने में मदद की, जबकि कांग्रेस को 38 सीटों पर विजय हासिल हुई.
पुडुचेरी उस समय कांग्रेस के हाथों से सरक गया, जब जनता ने एन रंगास्वामी कांग्रेस और अन्ना द्रमुक के गठबंधन को इस केन्द्रशासित प्रदेश की 30 सदस्यीय विधानसभा में बहुमत थमा दिया. कुछ महीने पहले ही कांग्रेस का दामन छोड़ने वाले पूर्व मुख्यमंत्री एन रंगास्वामी के नेतृत्व वाली एनआर कांग्रेस को 15 सीटें मिली हैं, जबकि अन्नाद्रमुक को पांच सीटें हासिल हुईं.
सत्तारूढ़ कांग्रेस को सात सीटों से सब्र करना पड़ा जबकि उसके सहयोगी द्रमुक को दो सीटें मिलीं. एक सीट पर निर्दलीय उम्मीदवार ने बाजी मारी.