लोकसभा चुनाव 2019 के तहत गुजरात की सूरत लोकसभा सीट पर बीजेपी ने फिर अपना परचम लहराया है. भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) प्रत्याशी दर्शना विक्रम 548230 वोटों के बड़े अंतर से अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी को शिकस्त देने में कामयाब रहीं. सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित इस सीट पर कुल 13 प्रत्याशी मैदान में थे. हालांकि मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही रहा.
2019 का जनादेश
भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) प्रत्याशी दर्शना विक्रम को सात लाख 95 हजार 651 वोट मिले, वहीं कांग्रेस उम्मीदवार अशोक पटेल को दो लाख 47 हजार 421 वोट मिले. 10532 वोटों के साथ नोटा का वोट प्रतिशत 0.99 रहा. नेशलिस्ट कांग्रेस पार्टी के एडवोकेट अजय को 5735 वोट मिले. बता दें कि इस सीट पर तीसरे चरण के तहत 23 अप्रैल को मतदान हुआ था और मतदान का प्रतिशत 63.67 रहा है.
2014 का चुनाव
पिछले चुनाव में इस सीट पर 63.9% मतदान हुआ था जिसमें बीजेपी प्रत्याशी दर्शना जरदोष को 7,18,412 वोट (75.8%) और कांग्रेस प्रत्याशी भूपत भाई देसाई को 1,85,222 (19.5%) वोट मिले थे.
सामाजिक ताना-बाना
सूरत न सिर्फ कारोबार के लिहाज से गुजरात व देश का अहम शहर है, बल्कि राजनीतिक तौर पर इसकी पहचान राष्ट्रीय फलक पर हमेशा से रही है. इस लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत ओलपाड, वरच्छा रोड, सूरत पश्चिम, सूरत पूर्व, करंज, सूरत उत्तर और कटा ग्राम विधानसभा सीट हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में यहां बीजेपी की हवा चली थी और सभी सात सीटों पर वह जीती थी. यहां तक कि पूरे सूरत जिले में बीजेपी ने अभूतपर्व प्रदर्शन करते हुए सत्ता वापसी सुनिश्चित की थी. जीएसटी और नोटबंदी के बावजूद इस व्यापारी जिले की 18 सीटों में से बीजेपी को 15 पर जीत मिली थी और कांग्रेस 3 पर सिमट गई थी.
सीट का इतिहास
स्वतंत्रता आंदोलन में अगुवा रहे और आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी के खिलाफ मुखर होकर विरोध करने वाले मोरारजी देसाई गुजरात की इसी सीट का नेतृत्व करते रहे हैं. देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ काम करने वाले मोराजी देसाई को नेहरू की मौत के बाद इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार में उप-प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी. इंदिरा से उनके रिश्ते ज्यादा नहीं चल पाए और कांग्रेस का विघटन हो गया. मोरारजी ने अपने खेमे के साथ अलग राह पकड़ ली और कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा. 1977 में आपातकाल के बाद जब जनता पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला तो मोरारजी देसाई को पीएम चुना गया. कांग्रेस से अलग होने के पहले वह लगातार पांच बार उसके टिकट पर सांसद सूरत सीट से बनते रहे.
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