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बंगाल: टीएमसी की विपक्षी एकजुटता की अपील पर क्यों नहीं तैयार लेफ्ट-कांग्रेस? 

बंगाल में बीजेपी की रणनीति को मात देने के लिए टीएमसी ने बिहार की तर्ज पर बंगाल में सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर चुनाव लड़ने की अपील की है, लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट ने इस ऑफर को रिजेक्ट कर दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस और लेफ्ट बंगाल में ममता बनर्जी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है.  

सीताराम येचुरी और राहुल गांधी सीताराम येचुरी और राहुल गांधी
स्टोरी हाइलाइट्स
  • बंगाल में इसी साल मार्च में होने हैं विधानसभा चुनाव
  • ममता बनर्जी के सामने अपने दुर्ग को बचाने की चुनौती
  • कांग्रेस-लेफ्ट साथ मिलाकर बंगाल में किस्मत आजमाएंगे

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की सियासी तपिश ने कड़ाके की ठंड में राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है. बंगाल की सियासी जंग फतह करने के लिए बीजेपी आक्रमक तरीके से ममता बनर्जी के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है. बीजेपी की रणनीति को मात देने के लिए टीएमसी ने बिहार की तर्ज पर बंगाल में सभी विपक्षी दलों को एकजुट होकर चुनाव लड़ने की अपील की है, लेकिन कांग्रेस और लेफ्ट ने इस ऑफर को रिजेक्ट कर दिया है. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर क्या वजह है कि कांग्रेस और लेफ्ट बंगाल में ममता बनर्जी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने को तैयार नहीं है.  

बंगाल का राजनीतिक तपिश जिस तरह से बढ़ रही है, वैसे-वैसे राज्य का सियासी मिजाज भी बदल रहा है. 10 साल से सत्ता पर काबिज ममता बनर्जी के कई साथी पार्टी छोड़कर बीजेपी का दामन थाम लिए हैं, जिसके चलते टीएमसी के लिए यह चुनाव काफी चुनौतीपूर्ण बन गया है. एक दर्जन से ज्यादा बड़े टीएमसी नेता ममता को साथ छोड़कर बीजेपी को सत्ता में लाने की जद्दोजहद कर रहे हैं. यही वजह है कि टीएमसी ने सभी विपक्षी दलों को बीजेपी के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है. 

टीएमसी सांसद सौगत रॉय ने बुधवार को पत्रकारों से कहा, 'अगर वाम मोर्चा और कांग्रेस वास्तव में बीजेपी के खिलाफ हैं तो उन्हें ममता बनर्जी का साथ देना चाहिए. उन्होंने कहा कि टीएमसी प्रमुख ममता बनर्जी ही बीजेपी के खिलाफ धर्मनिरपेक्ष राजनीति का असली चेहरा हैं, जो बीजेपी की सांप्रदायिक और विभाजनकारी राजनीति के खिलाफ मजबूती के साथ लड़ रही हैं.'  

टीएमसी के प्रस्ताव पर राज्य कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी ने प्रदेश में बीजेपी के मजबूत होने के लिए ममता बनर्जी को जिम्मेदार बताया. उन्होंने कहा, ''हमें टीएमसी के साथ गठबंधन में कोई दिलचस्पी नहीं है. पिछले 10 सालों से हमारे विधायकों को खरीदने के बाद टीएमसी को अब गठबंधन में दिलचस्पी क्यों है. अगर ममता बनर्जी बीजेपी के खिलाफ लड़ने को इच्छुक हैं तो उन्हें कांग्रेस में शामिल हो जाना चाहिए, क्योंकि वही सांप्रदायिकता के खिलाफ लड़ाई का एकमात्र देशव्यापी मंच है. 

वहीं, माकपा के वरिष्ठ नेता सुजान चक्रवर्ती ने कहा कि वाम मोर्चा और कांग्रेस को राज्य में नगण्य बताने वाली टीएमसी हमारे साथ गठबंधन को क्यों बेकरार है. बीजेपी भी इसी तरह से वाममोर्चा को लुभाने का प्रयास कर रही है, जिससे यह साबित होता है कि बंगाल में भी लेफ्ट काफी महत्वपूर्ण है. उन्होंने दावा किया कि वाम मोर्चा और कांग्रेस विधानसभा चुनावों में टीएमसी को मात देगा. 

बता दें कि बंगाल विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और लेफ्ट ने गठबंधन कर रखा है. हालांकि, एक दौर में कांग्रेस 1977 तक राज्य की सत्ता पर काबिज रही तो लेफ्ट ने 2011 तक राज किया है. ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अलग होकर 1998 में टीएमसी की स्थापना की थी और 2011 में लेफ्ट के 30 साल पुराने मजबूत दुर्ग को ध्वस्त करने में कामयाब रहीं. इसी के बाद से लेफ्ट दोबारा से बंगाल में उभर नहीं पाया है. 

बंगाल में कांग्रेस के कमजोर होने से अच्छा खासा जनाधार टीएमसी में शिफ्ट हो गया है जबकि लेफ्ट का कैडर भी खिसक गया है. ऐसे में कांग्रेस और लेफ्ट अब ममता के साथ जाकर अपना बचा कुछ सियासी आधार भी नहीं खोना चाहते हैं. इतना ही नहीं लेफ्ट और कांग्रेस अगर टीएमसी के साथ जाते हैं तो उन्हें कितनी सीटें चुनाव में लड़ने को मिलेगी, वो अहम सवाल है.

इसीलिए कांग्रेस और लेफ्ट यह मानकर चल रहे हैं कि बंगाल में टीएमसी अगर सत्ता से बेदखल होती है तो उसका राजनीतिक आधार वापस कांग्रेस और लेफ्ट में लौट आएगा. यही वजह है कि टीएमसी के ऑफर को ठुकरा दिया है. 

बंगाल के सियासी रण में कांग्रेस और वाम मोर्चा ने साथ मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ने का फैसला लिया है. 2016 में भी दोनों दलों ने मिलकर किस्मत आजमाया था, कांग्रेस 42 सीटें जीती थी जबकि वाममोर्चा को 32 सीटें मिली थीं. हालांकि, उस समय कांग्रेस ने लेफ्ट से आधी सीटों पर चुनाव लड़ा था. इस बार के चुनाव में अभी तक सीट बंटवारे का फॉर्मूला सामने नहीं आया है. 


 

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