scorecardresearch
 

बंगाली कार्ड: TMC के लिए नई वैचारिक पहचान बनाने की कोशिश में जुटी हैं ममता बनर्जी?

अब लगता है कि टीएमसी में बदलाव हो रहा है. पार्टी ने राज्य विधानसभा चुनावों से पहले बंगाली उप-राष्ट्रवाद को लागू करके बीजेपी की हिंदुत्ववादी राजनीति का मुकाबला करने का फैसला किया है. ममता बनर्जी ने खुद को स्थापित करने के साथ, टीएमसी नेताओं ने बीजेपी पर 'बाहरी लोगों' की पार्टी के रूप में हमला करना शुरू कर दिया है.

TMC की नेता ममता बनर्जी पार्टी के लिए नई विचारधारा तलाशने में जुटीं (फाइल-पीटीआई) TMC की नेता ममता बनर्जी पार्टी के लिए नई विचारधारा तलाशने में जुटीं (फाइल-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी से मिल रही कड़ी टक्कर
  • कई मुद्दों पर टीएमसी की विचारधारा साफतौर पर नहीं रही
  • ममता जय बंगाल के नारे से साथ बंगाली उप-राष्ट्रवाद को आगे कर रहीं

एक राजनीतिक संगठन के रूप में अपने दो दशक पुराने इतिहास में, तृणमूल कांग्रेस (TMC) अपने प्रशंसकों के बीच एक अच्छी तरह से परिभाषित वैचारिक नींव बनाने में कामयाब रही है. लेकिन ममता बनर्जी के साथ ही शुरू और खत्म होने वाली पार्टी के लिए आने वाला समय बेहद चुनौतीभरा है और उसे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) से कड़ी चुनौती मिलने के आसार हैं. तो क्या टीएमसी चुनाव से पहले अपनी नई विचारधारा गढ़ने की कोशिश में है.

टीएमसी का जन्म बंगाल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) शासन के लगातार विरोध के स्वरूप में हुआ था. एक फायरब्रांड विपक्षी नेता के रूप में ममता बनर्जी ने कांग्रेस से अपने राजनीतिक करियर की शुरुआत की. बाद में उन्होंने सीपीआई-एम की "बी-टीम" करार देते हुए कांग्रेस को छोड़ दिया. सत्ता में रहते हुए, कुछ ने उन पर आरोप लगाए कि भूमि अधिग्रहण मामले में उन्होंने अपनी ही नीतियों को पीछे छोड़ दिया और लेफ्ट से भी आगे निकल गईं.

बंगाली उप-राष्ट्रवाद 
"मां, माटी, मानुष" के अपने नारे की बदौलत टीएमसी पिछले एक दशक में काफी आगे निकल गई और ममता बनर्जी पार्टी की सर्वोच्च नेता के रूप में उभर कर आईं. हालांकि, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) के ठीक विपरीत, जिसकी आरएसएस में निहित एक स्पष्ट हिंदुत्व विचारधारा है, तृणमूल कांग्रेस एक वैचारिक मूल से परे है. यहां यह आश्चर्यजनक नहीं है कि ममता बनर्जी ने अतीत में कांग्रेस और बीजेपी दोनों के साथ समझौता किया. अब चाहे राम मंदिर का मामला हो, ट्रिपल तलाक हो, चीन के साथ सीमा विवाद हो, या सीएए/एनआरसी के मुद्दा हो, टीएमसी का रुख लगभग हमेशा एक स्पष्ट वैचारिक स्थिति के बजाए तत्काल राजनीतिक लक्ष्य या वोट बैंक को देखते हुए तय किया गया.

लेकिन अब लगता है कि टीएमसी में बदलाव हो रहा है. पार्टी ने राज्य विधानसभा चुनावों से पहले बंगाली उप-राष्ट्रवाद को लागू करके बीजेपी की हिंदुत्ववादी राजनीति का मुकाबला करने का फैसला किया है. ममता बनर्जी ने खुद को स्थापित करने के साथ, टीएमसी नेताओं ने बीजेपी पर 'बाहरी लोगों' की पार्टी के रूप में हमला करना शुरू कर दिया है.

मूल निवासी बनाम बाहरी 
बंगाल के मंत्री ब्रत्य बसु ने मूल निवासी बनाम बाहरी का मुद्दा उठाते हुए कहा कि उनका (बीजेपी) एकमात्र उद्देश्य बंगालियों को नियंत्रित करना है ताकि हम उनके अधीन रहें. क्या चीजें इतनी कम हुई हैं कि बंगाल और बंगाली उनके आगे झुकेंगे? क्या बंगालियों को दूसरे राज्यों के नेताओं को हम पर थोपा जाना चाहिए? 
 
उन्होंने कहा कि त्रिपुरी कांग्रेस में सुभाष बोस के हारने के बाद से उत्तर भारतीयों ने बंगालियों को किनारे करने की कोशिश की है. वहीं अब ममता बनर्जी के साथ भी दोहराया जा रहा है, लेकिन वह बोस की तरह ही लड़ाई जारी रखे हुए हैं. बंगालियों को दूसरे राज्यों के नेताओं को उन पर थोपा नहीं जाएगा!

दूसरी ओर, ममता बनर्जी पर मुस्लिम तुष्टीकरण का आरोप लगाने वाली बीजेपी के लगातार अभियान ने टीएमसी के खिलाफ हिंदुओं के एक वर्ग को अलग-थलग कर दिया है. खोई हुई जमीन को फिर से हासिल करने की कोशिश में ममता बनर्जी ने बंगाली भाषी आबादी के बीच धार्मिक ध्रुवीकरण को विफल करने के लिए जातीय कार्ड खेला. उन्हें अक्सर "रवींद्र-नजरुल" के बारे में बात करते हुए सुना जा सकता है कि राज्य के दो प्रतीक बंगाली गौरव पर आधारित समावेशी संस्कृति पर चोट कर रहे हैं. पिछले साल से, उन्होंने बीजेपी के "जय श्री राम" मंत्र के इस्तेमाल के खिलाफ "जय बंगला" के नारे का उपयोग करना शुरू कर दिया है.

 
मूल रूप से बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान शेख मुजीब के नेतृत्व वाली “मुक्ति वाहिनी” द्वारा युद्ध के दौरान इस्तेमाल किया गया था, अब तृणमूल कांग्रेस ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गढ़े नारे“जय हिंद” के साथ इसका इस्तेमाल करना शुरू किया है.

हाल के वर्षों में, ममता बनर्जी खुद को बंगाली गौरव के रूप में अपनी छवि को मजबूत करने की कोशिशों में लगी हुई हैं. उनकी सरकार ने कक्षा 10 तक हर स्कूल में बंगाली पाठ अनिवार्य कर दिया है. राज्य विधानसभा ने 2018 में राज्य का नाम "बांग्ला" में बदलने के लिए एक प्रस्ताव पारित किया है. हालांकि अभी तक इसे केंद्र की मंजूरी नहीं मिली है.

बदनामी का खतरा
टीएमसी चाहती है कि उसकी खुद की पहचान बंगाल अस्मिता के रूप में रहे और पार्टी सिर्फ बंगाल तक ही सीमित न रहे. यह तब सामने आया जब पार्टी के सांसद सौगात राय ने कुछ महीने पहले अभिनेत्री रिया चक्रवर्ती की ऑनलाइन ट्रोलिंग की आलोचना की थी. 

उन्होंने कहा कि मुझे लगता है कि रिया एक बंगाली है. अदालत में दोषी साबित होने से पहले ही वह भी पीड़िता थी. बंगालियों के प्रति बर्बरता अभियान ने एक बार फिर से बीजेपी को उजागर किया. हमने असम एनआरसी में भी कुछ ऐसा ही देखा था.

हालांकि इसके उलट राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि टीएमसी की ऐसी कोशिश खतरे से खाली नहीं है. जादवपुर विश्वविद्यालय में प्रोफेसर मोनोजीत मोंडल बताते हैं कि इससे मतदाताओं का ध्रुवीकरण भी हो सकता है. क्या टीएमसी गैर-बंगाली मतदाताओं का विरोध कर सकेगी जो कई सीटों पर अहम भूमिका निभा सकते हैं? रवींद्रनाथ टैगोर और नज़रुल इस्लाम जैसे प्रतीक ने कभी भी इस तरह की किसी विशेष संस्कृति में विश्वास नहीं किया. टैगोर ने अपने पूरे जीवन में अंतरराष्ट्रीयता में विश्वास किया और विश्व भारती की स्थापना की, जहां पूरी दुनिया जुट सकती थी.

मंडल आगे कहते हैं, यह धारणा कि बीजेपी बाहरी लोगों की पार्टी है, पूरी तरह से सही नहीं हो सकती है. उनका कहना है कि बीजेपी यहां चुनाव लड़ने के लिए बाहर से नेताओं को नहीं ला रही है. बीजेपी खुद टीएमसी के लोगों को ले रही है!

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें डाउनलोड करें