उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ज्यादातर ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों को कवर करता है. यह राज्य के गन्ना बेल्ट में आता है और यहां खेती से जुड़ी परेशानियां, मजबूत सामुदायिक पहचान और त्रिकोणीय राजनीतिक मुक़ाबले जैसी इस क्षेत्र की आम विशेषताएँ देखने को मिलती हैं.
बुढ़ाना एक सामान्य (अनारक्षित) विधानसभा क्षेत्र है और मुजफ्फरनगर लोकसभा सीट के पांच हिस्सों में से एक है. यह क्षेत्र पहली बार 1957 में 'फाइनल ऑर्डर DC (1953-1955)' के बाद बना था, 1967 में खत्म हो गया, और 2008 में 'संसदीय और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन आदेश' के तहत इसे फिर से बनाया गया. इसके मौजूदा दायरे में बुढ़ाना तहसील आती है, जिसमें परिसीमन रिकॉर्ड में बताई गई कुछ जगहों को शामिल नहीं किया गया है.
बुढ़ाना में अक्सर कड़े मुकाबले वाले चुनाव होते रहे हैं. यह सीट कई बार अलग-अलग पार्टियों के पास गई है और इसका फैसला अक्सर उम्मीदवार की मजबूती, स्थानीय गठबंधनों और जाट, मुस्लिम, दलित और OBC समुदायों के बीच बदलते समीकरणों से होता रहा है. इसी वजह से पश्चिमी उत्तर प्रदेश में यह एक अहम सीट मानी जाती है.
बुढ़ाना में अब तक छह विधानसभा चुनाव हो चुके हैं, जिनमें 1958 का उपचुनाव भी शामिल है. 1957 का पहला चुनाव एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीता था. अगले पांच चुनावों में पांच अलग-अलग पार्टियों ने यह सीट जीती. कांग्रेस ने 1958 का उपचुनाव जीता, जबकि 1962 में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया ने इस पर कब्जा किया. 45 साल के अंतराल के बाद जब यह सीट फिर से बनी, तो 2012 के बाद से समाजवादी पार्टी, बीजेपी और राष्ट्रीय लोक दल (RLD) ने एक-एक बार यह सीट जीती है.
समाजवादी पार्टी के नवाजिश आलम खान ने 2012 में बुढ़ाना सीट जीती और RLD के राजपाल सिंह बालियान को 10,588 वोटों से हराया. बीजेपी, जो पहले काफी पीछे चौथे स्थान पर रही थी, ने 2017 में यह सीट जीती, जब उमेश मलिक ने समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार प्रमोद त्यागी को 13,201 वोटों से हराया. 2022 में, RLD के राजपाल सिंह बालियान ने BJP के मौजूदा MLA उमेश मलिक को 28,310 वोटों से हराकर यह सीट जीती. राजपाल सिंह बालियान को 131,093 वोट मिले, जबकि उमेश मलिक को 102,783 वोट मिले.
बुढ़ाना विधानसभा क्षेत्र लोकसभा चुनावों में भी अहम रहा है. 2009 में RLD, बहुजन समाज पार्टी से 7,062 वोटों से आगे थी. 2014 में BJP, समाजवादी पार्टी से 91,041 वोटों से आगे थी. 2019 में RLD ने वापसी की और BJP से 16,645 वोटों से आगे रही. 2024 के संसदीय चुनाव में, समाजवादी पार्टी BJP से 16,076 वोटों से आगे रही. समाजवादी पार्टी के हरेंद्र सिंह मलिक को 116,151 वोट मिले और BJP के संजीव बालियान को 100,075 वोट मिले.
बुढ़ाना में वोटरों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हुई है. 2012 के विधानसभा चुनाव में यहां 330,066 रजिस्टर्ड वोटर थे और वोटिंग प्रतिशत 58.30 था. 2017 में यह संख्या बढ़कर 359,140 हो गई और वोटिंग प्रतिशत 67.14 तक पहुंच गया. 2019 में बुढ़ाना में 370,933 रजिस्टर्ड वोटर थे और वोटिंग प्रतिशत 68.02 था. 2022 में यह संख्या और बढ़कर 377,680 हो गई और वोटिंग प्रतिशत 67.68 रहा. 2024 की वोटर लिस्ट के अनुसार, इस क्षेत्र में 396,966 वोटर थे, जबकि वोटिंग प्रतिशत 60.95 रहा.
2011 की जनगणना के अनुमानों के अनुसार, बुढ़ाना हिंदू-बहुसंख्यक क्षेत्र है और यहां मुस्लिम आबादी भी काफी है. यहां की आबादी में अनुसूचित जातियों की हिस्सेदारी लगभग 9.56 प्रतिशत है. यह निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण है, जहां लगभग 83.38 प्रतिशत आबादी ग्रामीण और 16.62 प्रतिशत शहरी है. इस सामाजिक बनावट के कारण चुनावी मुकाबले में जाति और समुदाय का गणित अहम भूमिका निभाता है.
बुढ़ाना का अतीत मुजफ्फरनगर क्षेत्र के व्यापक इतिहास से गहराई से जुड़ा है. यह इलाका लंबे समय से पश्चिमी उत्तर प्रदेश के नहर-सिंचित मैदानी इलाकों से जुड़ा रहा है, जहां गन्ना स्थानीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ बन गया. समय के साथ, यह निर्वाचन क्षेत्र एक ग्रामीण बाजार और प्रशासनिक केंद्र के रूप में विकसित हुआ, जहां खेती और स्थानीय व्यापार आपस में गहराई से जुड़े रहे. हालांकि, आजादी के बाद यहां विकास एक समान नहीं रहा है, खासकर औद्योगिक विकास और खेती से अलग रोजगार के मामले में.
भौगोलिक दृष्टि से, बुढ़ाना उपजाऊ 'ऊपरी दोआब' के मैदानी इलाकों में स्थित है. यहां की जमीन समतल और खेती के लिए बहुत उपयुक्त है. गन्ना, गेहूं और धान यहां की मुख्य फसलें हैं. खेती के लिए नहरों से सिंचाई की सुविधा उपलब्ध है, जबकि डेयरी और छोटे ग्रामीण व्यापार भी स्थानीय अर्थव्यवस्था में योगदान देते हैं. यह निर्वाचन क्षेत्र आस-पास के कस्बों और बाजार केंद्रों से जुड़ा हुआ है, जो लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही, मजदूरों की आवाजाही और व्यापार को प्रभावित करते हैं.
बुढ़ाना में बुनियादी ढांचे के तहत जिला और राज्य की सड़कों के जरिए कनेक्टिविटी मौजूद है, जो इसे मुजफ्फरनगर और आस-पास के अन्य केंद्रों से जोड़ती हैं. रेल सुविधा के लिए लगभग 30-32 किलोमीटर दूर स्थित मुजफ्फरनगर रेलवे स्टेशन सबसे नजदीकी प्रमुख रेलहेड है. इस निर्वाचन क्षेत्र में बुनियादी स्कूल, स्वास्थ्य केंद्र और स्थानीय बाजार की सुविधाएं तो हैं, लेकिन यहां के निवासी अभी भी बेहतर सड़कों, जल निकासी व्यवस्था, स्वास्थ्य सेवाओं और शिक्षा के बुनियादी ढांचे की मांग करते हैं.
बुढ़ाना पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) के प्रमुख कस्बों और शहरों से जुड़ा हुआ है. जिला मुख्यालय मुजफ्फरनगर यहां से लगभग 30 से 32 किलोमीटर दूर है और यह सबसे नजदीकी प्रमुख प्रशासनिक केंद्र है. मेरठ लगभग 43 km दूर है, जबकि गाजियाबाद लगभग 98 km, नोएडा लगभग 100 km, ग्रेटर नोएडा लगभग 108 km और मुरादाबाद लगभग 96 km दूर है. दिल्ली सड़क मार्ग से लगभग 85 से 92 km दूर है, और NCR के अन्य शहर लोगों के आने-जाने, नौकरियों और शिक्षा के लिए आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं. राज्य की राजधानी लखनऊ काफी दूर, लगभग 500 से 520 km पर स्थित है और इस इलाके के दायरे से बाहर है.
राजनीतिक रूप से, 2027 में बुढ़ाना सीट पर कड़ा मुकाबला होने की संभावना है. अभी यह सीट RLD के पास है, और BJP अब इसकी प्रतिद्वंद्वी के बजाय सहयोगी है. पश्चिमी UP के व्यापक राजनीतिक समीकरण में समाजवादी पार्टी की अहमियत बनी हुई है, जबकि BSP का भी कुछ इलाकों में प्रभाव है. गन्ने की राजनीति, जातीय गठजोड़ और ग्रामीण मुद्दों वाली इस सीट पर 2027 का मुकाबला उम्मीदवार के चयन, स्थानीय गठजोड़ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के व्यापक राजनीतिक माहौल पर निर्भर करेगा. इसमें यह भी शामिल है कि वोटर RLD-BJP की साझेदारी को कैसे देखते हैं.
(अजय झा)
Umesh Malik
BJP
Anees
BSP
Bheem Singh
AIMIM
Devendra Kumar
INC
Saleem
ASPKR
Nota
NOTA
Devendra Malik Pahalwan
AAAP
Anu Kumar
IND
Rajendra Kumar
IND
Arvind Kumar
IND
Captain Neel Kumar
JAISMP
उत्तर प्रदेश में साल 2027 के विधानसभा चुनावों को लेकर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन पर अब संशय गहराने लगा है. हालांकि दोनों पार्टियों ने पहले गठबंधन में चुनाव लड़ने की बात कही थी, लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर तनातनी शुरू हो गई है. कांग्रेस सांसद इमरान मसूद का कहना है कि अखिलेश यादव की सक्रियता से कोई फर्क नहीं पड़ता, अगर गठबंधन करना है तो सीट शेयरिंग को तुरंत अंतिम रूप दिया जाना चाहिए. इस पर पलटवार करते हुए सपा सांसद इकरा हसन ने मसूद के बयान को बेवकूफी भरा बताया और कहा कि यूपी में भाजपा को सिर्फ अखिलेश यादव ही हरा सकते हैं.
यूपी में 2027 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों के तहत सपा ने 'Gen-Z' यानी नई पीढ़ी के युवाओं और छात्रों को साधने के लिए बड़ा दांव चला है. पार्टी ने प्रदेशभर के कॉलेजों और यूनिवर्सिटी कैंपस में 'PDA जागरूकता अभियान' शुरू किया है, जिसके जरिए छात्रों से फीडबैक लेकर चुनावी घोषणा पत्र तैयार किया जाएगा.
यूपी में 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन की रस्साकशी अब इमरान मसूद और इकरा हसन की तीखी जुबानी जंग में बदल गई है. मसूद के अल्टीमेटम के जवाब में सपा ने अपनी युवा सांसद इकरा हसन को फ्रंटफुट पर उतारकर कांग्रेस को साफ संदेश दे दिया है.
उत्तर प्रदेश चुनाव से पहले कांग्रेस ने अतिपिछड़ा वर्ग को लेकर एक प्रस्ताव तैयार किया है. इसमें कानूनी सुरक्षा के साथ सरकारी कामकाज में हिस्सेदारी बढ़ाने की बात भी है. यह प्रस्ताव बिहार में किए गए EBC वादों की तर्ज पर तैयार किया गया है.
यूपी में 2027 के चुनावों से पहले सपा-कांग्रेस गठबंधन की रस्साकशी अब इमरान मसूद और इकरा हसन की जुबानी जंग में बदल गई है. मसूद जहां सीटों के जल्द बंटवारे के लिए दबाव बना रहे हैं, वहीं इकरा हसन ने पलटवार कर साफ किया है कि प्रदेश में भाजपा को हराने में केवल अखिलेश यादव ही सक्षम हैं.
यूपी में राज्यसभा की 10 और विधान परिषद की 11 सीटों के लिए अगले दो महीने में चुनाव होने हैं. राज्यसभा की सीटों का कार्यकाल 25 नवंबर को खत्म हो रहा है, जिनमें बीजेपी की 8, सपा और बसपा की 1-1 सीट शामिल है. बसपा राज्यसभा से पूरी तरह बाहर हो जाएगी, जबकि सपा को 2 सीटें मिलने की उम्मीद है. बीजेपी और एनडीए के पास 292 के करीब विधायक हैं, जिससे 7 सीटें आसानी से जीती जा सकती हैं.
सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने प्रदेश की सभी 403 सीटों पर कम से कम 27 हजार वोट बढ़ाने का लक्ष्य रखा है, जिसे मिशन 27K कहा जा रहा है. 2022 चुनाव में करीब 50 सीटें ऐसी थीं जहां हार-जीत का अंतर 10 हजार वोट से कम था, और इनमें से अधिकतर बीजेपी या सहयोगी दलों को मिलीं.
बसपा ने विधानसभा सीट-188 सुल्तानपुर से इम्तियाज अहमद भुट्टो को प्रभारी और प्रत्याशी घोषित किया है. पार्टी प्रदेश अध्यक्ष विश्वनाथ पाल ने अखिलेश यादव के PDA पर हमला करते हुए इसे "धोखा" बताया.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर से हलचल तेज हो गई है. हाल ही में केंद्रीय मंत्री और राष्ट्रीय लोक दल (आरएलडी) के अध्यक्ष जयंत चौधरी ने भारतीय क्रिकेटर मोहम्मद शमी से मुलाकात की. इस मुलाकात के बाद से ही राजनीतिक गलियारों में अटकलों का दौर शुरू हो गया है, क्योंकि राज्य में उपचुनाव नजदीक हैं. दिल्ली से लेकर अमरोहा तक इस बैठक को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हो रही हैं.
उत्तर प्रदेश चुनाव 2027 के मद्देनजर सपा और कांग्रेस में गठबंधन पर सहमति के बावजूद सीटों के बंटवारे को लेकर पेच फंसा हुआ है. ऐसे में दोनों ही दल सभी 403 सीट पर चुनाव लड़ने की तैयारी शुरू कर दी है. कांग्रेस जहां अपनी बार्गेनिंग पावर बचाने के लिए जल्द सीट-शेयरिंग चाहती है, वहीं सपा जल्दबाजी के मूड में नहीं दिख रही है.