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थलपति विजय की TVK से लेकर हुमायूं कबीर तक... चुनावी दंगल में नई पार्टियों की एंट्री, क्या बदलेंगे समीकरण?

तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे चुनावी राज्यों में नई राजनीतिक पार्टियों का उदय हो रहा है. अभिनेता विजय की टीवीके (TVK) और हुमायूं कबीर की जनता उन्नयन पार्टी 2026 के विधानसभा चुनावों में ताल ठोकने को तैयार हैं जो स्थापित दलों के लिए चुनौती बन सकती हैं.

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तमिलनाडु में सत्ताधारी दलों को चुनौती दे रहे हैं थलपति विजय. (File photo: ITG)
तमिलनाडु में सत्ताधारी दलों को चुनौती दे रहे हैं थलपति विजय. (File photo: ITG)

अभिनेता जोसेफ विजय ने साल 2024 में 'तमिलगा वेत्री कड़गम' (TVK) लॉन्च की और वे 2026 के तमिलनाडु विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी में हैं . उन्होंने खुद को DMK और AIADMK के विकल्प के रूप में पेश किया है. इसी तरह पश्चिम बंगाल में टीएमसी से निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने 2025 के अंत में 'जनता उन्नयन पार्टी' बनाई है. वहीं, हालिया चुनावी इतिहास दिखाता है कि देशभर में राजनीतिक पार्टियों की लिस्ट लगातार लंबी होती जा रही है, लेकिन नए राजनीतिक दल पहले से स्थापित दलों को चुनौती देने में भारी संघर्ष करना पड़ रहा है.

तीन दशकों तक तमिल सिनेमा पर राज करने वाले थलपति विजय ने मनोरंजन की दुनिया छोड़ पूरी तरह राजनीति में आने का फैसला किया है.

बीबीसी के विश्लेषण के अनुसार, उनके फिल्मी किरदारों में एक खास बदलाव दिखा है. 90 के दशक में वह रोमांटिक हीरो थे, 2000 के दशक में 'एंग्री यंग मैन' बने और 2012 के बाद उनकी फिल्मों में वे एक 'रक्षक' (सैवियर) की छवि में नजर आए. माना जा रहा है कि ये बदलाव उनके राजनीतिक सफर की एक सोची-समझी तैयारी थी, ताकि वह जनता के बीच अपनी पैठ बना सकें.

नई पार्टियों का संघर्ष

हालिया चुनावी आंकड़े बताते हैं कि नई पार्टियों के लिए स्थापित बड़े दलों को चुनौती देना आसान नहीं है. साल 2016 में तमिलनाडु में 88 पार्टियों ने चुनाव लड़ा, जिनमें से सिर्फ 4 को ही सीटें मिलीं.

वहीं, 2021 में चुनाव लड़ने वाली 106 पार्टियों में से केवल 8 को प्रतिनिधित्व मिला. हैरानी की बात ये है कि उम्मीदवारों की भारी संख्या के बावजूद, 234 में से 195 सीटों पर जीत का अंतर 5,000 वोटों से अधिक रहा. ये दिखाता है कि छोटी पार्टियां अक्सर वोट तो काटती हैं, पर सीटें नहीं जीत पातीं.

आंकड़े बताते हैं कि तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में मुट्ठी भर पार्टियां ही सीटें जीत पाती हैं, लेकिन हाल के साल में चुनाव लड़ने वाली पार्टियों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हुई है. साल 2006 में 36 पार्टियों ने चुनाव लड़ा था और साल 2021 तक ये आंकड़ा निर्दलीय प्रत्याशियों को छोड़कर 106 तक पहुंच गया था. इसके परिणामस्वरूप प्रति निर्वाचन  क्षेत्र उम्मीदवारों की औसत संख्या 2006 में 12 से बढ़कर 2021 में 17 हो गई थी.

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लगतार बढ़ रहा है राजनीतिक दल का ग्राफ

सिर्फ तमिलनाडु ही नहीं, बल्कि केरल, पश्चिम बंगाल और असम में भी राजनीतिक दलों की संख्या में भारी उछाल आया है. केरल में 2006 में 27 पार्टियां थीं जो 2021 तक बढ़कर 48 हो गईं. पश्चिम बंगाल में इसी अवधि के दौरान पार्टियों की संख्या 34 से बढ़कर 58 हो गई है. असम में भी यही रुझान दिखा, जहां 30 से बढ़कर 41 पार्टियां मैदान में उतरीं. चुनावी मौसम नजदीक आते ही नए संगठनों की बाढ़ आ जाती है, लेकिन इनका असली प्रभाव नतीजों पर कितना होगा, ये देखना दिलचस्प होगा.

हाल ही में तृणमूल कांग्रेस निलंबित विधायक हुमायूं कबीर ने साल 2025 के अंत में जनता उन्नयन पार्टी की शुरुआत की और मौजूदा सरकार को हराने का संकल्प लिया.

जैसे-जैसे चुनाव का मौसम नजदीक आएगा, इन राज्यों में नए दलों के उभरने की संभावना है. लेकिन क्या इनका नतीजों पर कोई बड़ा असर पड़ेगा? हालिया मतदान के रुझान तो यही बताते हैं कि नहीं, लेकिन हर चुनाव अपने आप में अनोखा होता है और पिछले आंकड़े सिर्फ एक संकेत मात्र हैं.

चुनाव आयोग का चाबुक

गौरतलब है कि राजनीतिक पार्टियों की बढ़ती भीड़ पर चुनाव आयोग ने कड़ा रुख अपनाया है. अगस्त और सितंबर 2025 में आयोग ने देशभर की 808 राजनीतिक पार्टियों का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया है. इन पार्टियों ने पिछले छह चुनावों में से एक भी चुनाव नहीं लड़ा था. अकेले तमिलनाडु से ही 81 पार्टियों को इस लिस्ट से बाहर किया गया है. आयोग का ये कदम चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता लाने और केवल गंभीर खिलाड़ियों को ही मैदान में रखने की कोशिश का हिस्सा माना जा रहा है.

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