क्योंकि स्मृति की जड़ें भी कभी बंगाल की माटी से जुड़ी रही हैं. बंगाल के इस चुनाव में 'पद्म फूल' खिलाने निकलीं बीजेपी नेता स्मृति ईरानी 'ममता बंदोपाध्याय' पर जब अपने रौ में हमलावर होती हैं तो उनका बंगाल कनेक्शन निखरकर सामने आ जाता है. स्मृति टिपिकल बांग्ला में बीजेपी के चुनाव चिह्न कमल फूल को 'पद्म फूल' बोलती हैं और सीएम ममता के साथ बनर्जी नहीं बल्कि 'बंदोपाध्याय' टाइटल लगाती हैं और खाटी बंगाली होने का एहसास कराती हैं.
एक चुनाव प्रचार के दौरान अपना बंगाल कनेक्ट बताते हुए स्मृति स्वयं कहती हैं- “आमी आपनादेर मेये, दिल्ली थेके आशिनी, बांग्लार माटी आमार निजेर...” मतलब कि, “मैं आप लोगों की बेटी हूं, मैं दिल्ली से आई नहीं हूं, बंगाल की मिट्टी भी मेरी अपनी है.”
इस बंगाल चुनाव में स्मृति ईरानी का 'बांग्ला अवतार' बीजेपी की रणनीति का एक अहम सांस्कृतिक-राजनीतिक प्रयोग बनकर उभरा है. बंगाल की राजनीति में लंबे समय से 'बाहरी बनाम स्थानीय' का नैरेटिव प्रभावी रहा है और इसी चुनौती का जवाब देने के लिए बीजेपी ने स्मृति ईरानी को आगे कर भाषा, संस्कृति और भावनात्मक जुड़ाव पर सक्रिय हस्तक्षेप किया है.
बंगाल चुनाव की "इम्पैक्ट प्लेयर" स्मृति
स्मृति ईरानी का बांग्ला भाषा पर अधिकार ने उन्हें बंगाली जनमानस से जोड़ने में बड़ी मदद की है. चुनावी सभाओं में जय श्री राम के घोष के साथ जनता का स्वागत करतीं स्मृति चुनावी अभियान में साफ तौर पर एक "इम्पैक्ट प्लेयर" बनकर उभरी हैं. वे सहजता से भीड़ का ध्यान अपनी ओर खींचतीं हैं. उनके बोलने के लहजे और हाव-भाव में आने वाले बारीक बदलावों, लोगों से नजरें मिलाने के अंदाज पर गौर करें तो वे एक एनर्जेटिक बंगाली वक्ता का एहसास देती हैं.
मैं तो इलिश, कतला भी खाती हूं
बाहरी होने के आरोपों पर स्मृति ईरानी अपना बंगाली कनेक्शन खालिस बांग्ला में बताते हुए कहती हैं, "आमि निजे बांग्ला बाड़ीर मे, आमार मां बांगाली बागची बाड़ीर मे, आपनी अमाय बोलून, आमि इलिश खाई, कातला खाई, आमि भापा चिंगड़ी खेते पारी, आलू सिधो भात, कोला मेखिए दूध भात खाची..."
स्मृति के कहने का अर्थ है, "मैं बंगाल के घर की लड़की हूं, मेरे मां बंगाली बागची परिवार की बेटी हैं. आप मुझे बताइए. मैं तो इलिश, कातला और भाप चिंगड़ी जैसी मछली खाती हूं. आलू भात खाती हूं, केला मिलाकर दूध-भात खातीं.. पर इस तरह की आलोचना से क्या बंगाल का विकास होगा."
स्मृति ईरानी का बांग्ला कनेक्शन केवल चुनावी नहीं, बल्कि पारिवारिक पृष्ठभूमि से भी जुड़ा है. उनकी मातृ पक्ष की जड़ें बंगाली हैं, जिससे उन्हें सांस्कृतिक रूप से बंगाल से जोड़ने का राजनीतिक आधार मिलता है.
स्मृति का बांग्ला कनेक्शन
स्मृति ने अपना बंगाल कनेक्शन बताते हुए कहा कि उनके नाना कोलकाता के साल्टलेक में रहते थे और उनके परिवार के कुछ लोग दमदम में भी रहते थे. स्मृति ईरानी की मांग शिबानी बागची बंगाली-ब्राह्मण हैं. मां के बांग्ला मूल के कारण स्मृति को बांग्ला भाषा पर अच्छी पकड़ है.
अपनी मां के प्रभाव के कारण बंगाली असल में उनकी मातृभाषाओं में से एक है. वह घर पर इसे सुनते और बोलते हुए बड़ी हुईं. यही वजह है कि वह धारा प्रवाह बंगाली बोलती हैं.
स्मृति ईरानी ने बांग्ला फिल्म 'अमृता' में एक्टर विक्टर बनर्जी के साथ लीड रोल में काम की हैं. इस दौरान भी उन्होंने अपना बंगाली में भाषण देने की कला को रिफाइन किया.
चुनावी सभाओं और रोड शो में उनका धाराप्रवाह बांग्ला बोलना सिर्फ भाषाई कौशल नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है. कोलकाता और आसपास के इलाकों में उन्होंने कई बार भाषण और मीडिया बातचीत के दौरान सीधे बांग्ला में संवाद किया.
मा-बोनेरा, भय पाबेन ना
बंगाली पहचान की वजह से केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को बीजेपी उन्हें सिर्फ स्टार प्रचारक के रूप में नहीं बल्कि स्थानीय संवेदना से जुड़ी राष्ट्रीय नेता के रूप में पेश कर रही हैं ताकि 'आउटसाइडर' होने के आरोपों का जवाब दिया जा सके.
स्मृति ईरानी को टीएमसी पर महिला सुरक्षा और सम्मान के मुद्दों पर आक्रामक चेहरा बनकर उतरीं हैं. आरजी कर रेप पीड़िता की मां के साथ खड़ी होकर स्मृति ने महिला सुरक्षा के मुद्दे पर ममता बनर्जी सरकार को सीधे घेरा है.
RG Kar मामले जैसी घटनाओं पर वो बांग्ला में बोलकर महिलाओं के बीच विश्वास जगाती हैं. बीजेपी ‘नारी शक्ति’ और ‘मातृ शक्ति भरोसा कार्ड’ जैसी योजनाओं को भी उनके जरिए प्रमोट करती दिखती है.
एक रैली में स्मृति ईरानी ने कहा, "मा-बोनेरा, भय पाबेन ना, अन्यायेर बिरुद्धे आमरा आपनादेर पासे आछी.” यानी कि माताओं-बहनों, डरिए मत, अन्याय के खिलाफ लड़ाई में हम आपके साथ हैं.
"बांग्लार मा-बोनेदेर सम्मानेर जन्नो आमादेर लोराई चालिये जेते होबे, पद्म फुले वोट दिन, आपनादेर अधिकार सुरक्षित होबे.” यानी कि बंगाल की माताओं-बहनों के सम्मान के लिए हमें संघर्ष जारी रखना होगा. कमल के फूल पर वोट दीजिए, आपके अधिकार सुरक्षित होंगे.
“मा-बोनेरा” जैसे संबोधनों के जरिए स्मृति सीधे महिला मतदाताओं से कनेक्ट होती हैं. इससे बीजेपी को महिला वोट-बैंक में अपनी पकड़ मजबूत करने का अवसर मिलता है. जो बंगाल जैसे राज्य में चुनावी रूप से निर्णायक साबित हो सकता है. बता दें कि ममता बनर्जी के वोट बैंक में महिलाओं का बड़ा चंक है.
स्मृति स्थानीय राजनीतिक शब्दावली जैसे 'माटी', 'पद्म फूल', 'मां-माटी-मानुष' को अपने नैरेटिव में शामिल कर रही हैं. यह दरअसल स्मृति ईरानी के शब्दों में 'ममता बंदोपाध्याय' की पारंपरिक राजनीतिक भाषा को उन्हीं के मैदान में चुनौती देने की रणनीति है.