असम में चुनावी माहौल के बीच गुरुवार को पंचायत आजतक असम 2026 का आयोजन किया गया. इस दौरान मंच पर मुस्लिम वोट, पहचान और राजनीतिक रणनीति को लेकर तीखी बहस देखने को मिली. चर्चा में विभिन्न दलों के नेताओं ने असम के मुसलमानों की राजनीतिक दिशा, उनकी पहचान से जुड़े सवालों और राज्य की बदलती राजनीतिक परिस्थितियों पर अपने-अपने तर्क रखे. इस खास सेशन का नाम था 'मुसलमानों के मन में क्या है' जिसमें शरमन अली (MLA Raijor Dal), अमीनुल इस्लाम (MLA, AIUDF) और करीमुद्दीन बरभुइया (MLA AIUDF) ने शिरकत की.
मुसलमानों का क्या है रुख?
कार्यक्रम की शुरुआत में यह सवाल उठा कि असम का मुस्लिम नागरिक आखिर चाहता क्या है और क्या उसकी राजनीतिक पसंद बदल रही है. इस पर एनडीए खेमे से जुड़े नेता ने करीम उद्दीन ने कहा कि असम के मुसलमानों में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा को लेकर एक दिलचस्प स्थिति है. उनके मुताबिक, “असम में किसी भी मुस्लिम से पूछ लीजिए, उसके दिल में हिमंता बिस्वा सरमा के लिए गुस्सा भी है और उम्मीद भी. यही सच्चाई है.” उन्होंने कहा कि देशभर में मुसलमान अलग-अलग क्षेत्रीय दलों के साथ खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन असम में अब एक नया राजनीतिक विकल्प तलाशने की कोशिश भी हो रही है.
सवाल, जो अक्सर बनता है परेशानी
दूसरी ओर अमीनुल इस्लान ने कहा कि असम के मुसलमानों की सबसे बड़ी चिंता पहचान और सुरक्षा से जुड़ी है. उनके मुताबिक राज्य में डी-वोटर और एनआरसी जैसे मुद्दे आज भी पूरी तरह हल नहीं हुए हैं. उन्होंने आरोप लगाया कि चुनाव के समय इन मुद्दों को और ज्यादा उछाला जाता है. अमीनुल इस्लाम ने कहा, “असम के मुसलमानों के मन में हमेशा यह सवाल रहता है कि उन्हें भारतीय माना जाता है या नहीं. कई बार उन्हें बांग्लादेशी कहकर परेशान किया जाता है, जबकि उनके पास सभी वैध दस्तावेज होते हैं.”
चर्चा के दौरान असम में जनसांख्यिकीय बदलाव यानी डेमोग्राफी के सवाल पर भी तीखी बहस हुई. इस मुद्दे पर एक पक्ष ने कहा कि धुबरी, बरपेटा और गोलपारा जैसे इलाकों में आबादी का संतुलन बदल रहा है और यह स्थानीय लोगों की चिंता का कारण है. हालांकि MLA शरमन अली ने इस दावे को खारिज करते हुए कहा कि यह पूरी तरह सही तथ्य नहीं है. उन्होंने कहा कि कई जिलों के पुनर्गठन और प्रशासनिक बदलावों के कारण आंकड़ों का स्वरूप बदला है, जिससे यह भ्रम पैदा हुआ है कि डेमोग्राफी अचानक बदल गई है. उनके मुताबिक, “अगर किसी जिले को अलग कर दिया जाए तो प्रतिशत बदल जाता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि अचानक जनसंख्या में बड़ा बदलाव हो गया.”
चुनावी रिजल्ट पर क्या असर डालेगा मुस्लिम वोट
कार्यक्रम में राजनीतिक दलों की रणनीति और मुस्लिम वोट के बंटवारे पर भी चर्चा हुई. अमीनुल इस्लाम ने कहा कि मुस्लिम वोट पहले से ही अलग-अलग दलों में बंटा हुआ है. उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ दल मुसलमानों के मुद्दों पर खुलकर बात नहीं करते, जबकि चुनाव के समय इन मुद्दों का राजनीतिक इस्तेमाल किया जाता है.
वहीं दूसरी ओर एक नेता ने दावा किया कि असम के मुसलमानों को अब वास्तविक समाधान की तलाश है और इसके लिए सत्ता के साथ संवाद जरूरी है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में अल्पसंख्यक हमेशा संख्या के कारण कमजोर स्थिति में रहते हैं, इसलिए उन्हें अपने मुद्दों के समाधान के लिए व्यावहारिक रास्ता अपनाना होगा. उनके मुताबिक, “अगर कोई लंबे समय से लंबित समस्याओं को हल कर सकता है तो वह हिमंता बिस्वा सरमा हैं.”
चर्चा में यह भी मुद्दा उठा कि अगर किसी इलाके में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई होती है तो सरकार की जिम्मेदारी पुनर्वास की भी होती है. नेताओं ने कहा कि अगर लोगों को हटाया जाता है तो उनके बच्चों की शिक्षा, रहने की व्यवस्था और बुनियादी सुविधाओं का भी ध्यान रखना चाहिए.
कुल मिलाकर असम पंचायत के मंच पर यह साफ दिखा कि असम की राजनीति में मुस्लिम पहचान, एनआरसी, जनसांख्यिकी और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दे अभी भी बेहद संवेदनशील और निर्णायक बने हुए हैं. आने वाले चुनावों में यह देखना दिलचस्प होगा कि मुस्लिम मतदाता किस राजनीतिक दिशा में जाते हैं, चुनावी रिजल्ट पर कैसा असर डालने वाले हैं.