पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में इस बार भवानीपुर सीट सबसे ज्यादा चर्चा में है. जो सीट कभी ममता बनर्जी के लिए सबसे सुरक्षित मानी जाती थी, BJP ने उसे अब राज्य की सबसे हाई-वोल्टेज चुनावी लड़ाई में बदल दिया है. शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतारकर भारतीय जनता पार्टी ने साफ संकेत दे दिया है कि वो सिर्फ मुकाबला नहीं, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त भी हासिल करना चाहती है.
जातिगत सर्वे, बूथ-स्तर की रणनीति और घर-घर प्रचार के जरिए BJP ने इस सीट को पूरी तरह से चर्चा के केंद्र में ला दिया है. कोलकाता जैसे विविधताओं वाले शहर में भवानीपुर एक अलग पहचान रखता है. 'मिनी भारत' कहे जाने वाले इस क्षेत्र में बंगाली हिंदू और मुस्लिमों के साथ गुजरात, राजस्थान, बिहार, झारखंड और ओडिशा से आए प्रवासियों की बड़ी संख्या है. 2011 से ये सीट TMC का गढ़ रही है.
ममता बनर्जी यहां से लगातार अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करती रही हैं, लेकिन 2026 का चुनाव इस समीकरण को बदलता दिख रहा है. भवानीपुर में कोलकाता नगर निगम के आठ वार्ड शामिल हैं. इसमें वार्ड संख्या 63, 70, 71, 72, 73, 74, 77 और 82 शामिल हैं. इन सभी वार्डों में तृणमूल कांग्रेस के पार्षद हैं. इस सीट की सबसे बड़ी खासियत इसकी सामाजिक संरचना है.
भवानीपुर विधानसभा सीट खास क्यों है?
भवानीपुर में करीब 42% बंगाली हिंदू, 34% गैर-बंगाली हिंदू और करीब 24% मुस्लिम मतदाता हैं. यही विविधता लंबे समय तक TMC के पक्ष में रही, लेकिन अब BJP गैर-बंगाली कारोबारी समुदाय में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है. मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) ने भी चुनावी समीकरण बदल दिए हैं. भवानीपुर में 47000 से ज्यादा लोगों के नाम हटा दिए गए हैं.
इनमें 40% से ज्यादा मुस्लिम बताए जा रहे हैं. इसके साथ ही 14000 नामों की जांच अभी जारी है. साल 2021 तक भवानीपुर ममता बनर्जी के लिए सुरक्षित सीट थी. जब नंदीग्राम में उन्हें हार का सामना करना पड़ा, तब इसी सीट ने उपचुनाव के जरिए उन्हें विधानसभा में वापस पहुंचाया था. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. इस बार BJP ने सीधे शुभेंदु अधिकारी को मैदान में उतार दिया है.
BJP की रणनीति बूथ स्तर पर हिंदू वोटों को एकजुट करने, जातीय समीकरण साधने और अधिकतम मतदान सुनिश्चित करने पर केंद्रित है. पार्टी कार्यकर्ता चक्रबेरिया, एलनबी रोड और बकुलबागान जैसे इलाकों में सक्रिय हैं. घर-घर जाकर मतदाताओं से संपर्क किया जा रहा है. बुजुर्गों और बीमार समर्थकों के लिए व्हीलचेयर जैसी सुविधाओं का भी वादा किया जा रहा है.
द टेलीग्राफ की एक रिपोर्ट के अनुसार, एक साल से भी ज्यादा समय तक BJP ने भवानीपुर में जाति और समुदाय के समीकरणों को समझने के लिए काम किया है. BJP से जुड़े एक सूत्र ने बताया, "हमें काफी हद तक अंदाजा है कि बंगाली भाषी मतदाता कहां ज्यादा हैं, किन इलाकों में मुसलमानों का पलड़ा भारी है और कहां गैर-बंगाली व्यापारियों का दबदबा है."
भवानीपुर में TMC की 'घोरर मेये' रणनीति
साल 2019 के लोकसभा चुनाव में BJP ने यहां मजबूत प्रदर्शन किया था. कोलकाता दक्षिण सीट पर मुकाबले में उसे मामूली अंतर से बढ़त भी मिली थी, जिसमें भवानीपुर का योगदान अहम था. साल 2024 लोकसभा चुनाव में भी TMC की बढ़त घटकर 8297 वोट रह गई थी. BJP पिछले एक साल से ज्यादा समय से यहां जातीय और सामुदायिक सर्वे कर रही है.
BJP के मुताबिक उसे हर इलाके के वोटिंग पैटर्न की स्पष्ट समझ है. उसी के आधार पर रणनीति तैयार की गई है. रैलियों के जरिए भी माहौल बनाने की कोशिश की जा रही है. हाल ही में BJP ने ममता बनर्जी की सभा के पास ही रैली कर शक्ति प्रदर्शन किया, जिससे दोनों दलों के समर्थकों में तनाव की स्थिति बन गई. तृणमूल कांग्रेस के लिए भवानीपुर प्रतिष्ठा का सवाल है.
यह ममता बनर्जी का राजनीतिक घर रहा है. TMC इस बार भी 'घोरर मेये' यानी 'घर की बेटी' की भावनात्मक अपील पर भरोसा कर रही है. ममता बनर्जी को एक स्थानीय, सुलभ और लोगों से जुड़ी नेता के रूप में पेश किया जा रहा है. TMC कार्यकर्ता हर घर तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. हाउसिंग कॉम्प्लेक्स में मीटिंग्स की जा रही हैं. कई योजनाओं को जमकर प्रचार किया जा रहा है.
4 मई के नतीजे करेंगे मुकाबले पर फैसला
इनमें 'लक्ष्मी भंडार', 'कन्याश्री' और 'स्वास्थ्य साथी' जैसी योजनाएं चुनाव प्रचार का अहम हिस्सा हैं. खासतौर पर महिलाओं और परिवारों को मिलने वाले लाभों पर जोर दिया जा रहा है. गैर-बंगाली समुदाय में BJP की बढ़त को रोकने के लिए भी TMC सक्रिय है. फिरहाद हकीम समेत कई नेता अपने-अपने समुदायों से संपर्क कर रहे हैं. ममता बनर्जी खुद भी लगातार पदयात्राएं और रैलियां कर रही हैं.
25 और 26 अप्रैल को उन्होंने भवानीपुर में रोड शो कर अपनी ताकत दिखाई. नंदीग्राम में मिली हार के बाद भवानीपुर ममता बनर्जी के लिए और भी अहम हो गया है. यह सिर्फ एक सीट नहीं, बल्कि उनकी राजनीतिक पहचान का केंद्र है. अब सवाल यही है कि क्या ममता अपना गढ़ बचा पाएंगी या BJP यहां इतिहास रच देगी. 4 मई के नतीजे इस हाई-प्रोफाइल मुकाबले का फैसला करेंगे.