असम की राजनीति में बड़ा उलटफेर सामने आ रहा है. पूर्व असम कांग्रेस अध्यक्ष भूपेन कुमार बोरा ने कांग्रेस से इस्तीफा देने के कुछ ही घंटों बाद अपना इस्तीफा वापस ले लिया.
सुबह उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को इस्तीफा भेजा था. खबरों में कहा गया कि उन्होंने पार्टी में “अनदेखी” और उचित सम्मान न मिलने की बात लिखी थी. लेकिन दिन भर चली बैठकों और नेताओं की समझाइश के बाद उन्होंने इस्तीफा वापस लेने का फैसला किया.
कांग्रेस नेताओं की मनाने की कोशिश
इस्तीफे की खबर सामने आते ही कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेता गुवाहाटी स्थित उनके घर पहुंचे. मौजूदा असम कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई, पार्टी के अन्य नेताओं और सहयोगी दलों के प्रतिनिधियों ने उनसे मुलाकात की. इसके बाद बोरा ने यू-टर्न लेते हुए पार्टी में बने रहने का निर्णय किया. सूत्रों के मुताबिक, पार्टी नेतृत्व ने उन्हें संगठन में अहम भूमिका देने का भरोसा दिलाया.
हिमंत बिस्वा सरमा का बयान
इस पूरे घटनाक्रम पर असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने तीखी प्रतिक्रिया दी. उन्होंने कहा था कि भूपेन बोरा असम कांग्रेस के आखिरी हिंदू नेता हैं जो न विधायक थे, न मंत्री. उनका इस्तीफा प्रतीकात्मक संदेश देता है कि कांग्रेस में सामान्य परिवार से आने वाला व्यक्ति आगे नहीं बढ़ सकता.
सरमा ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति का आरोप लगाया और कहा कि उन्होंने बोरा के इस्तीफे का स्वागत किया है. हालांकि उन्होंने साफ किया कि बोरा ने बीजेपी जॉइन करने के लिए उनसे संपर्क नहीं किया है. उन्होंने यह भी कहा था कि वह शाम को बोरा के घर जाएंगे.
सरमा ने दावा किया कि असम में कांग्रेस की स्थिति बेहद खराब है और आने वाले दिनों में 4–5 विधायक भी पार्टी छोड़ सकते हैं. उन्होंने यह भी कहा कि फिलहाल राज्यसभा चुनाव को देखते हुए बीजेपी किसी को शामिल करने के लिए जल्दबाज़ी नहीं कर रही है.
क्या हैं सियासी मायने
भूपेन बोरा 2021 से 2025 तक असम कांग्रेस के अध्यक्ष रहे. उन्हें संगठन को जमीनी स्तर पर मजबूत करने का श्रेय दिया जाता है. उनके इस्तीफे और फिर वापसी ने यह संकेत दिया है कि पार्टी के अंदर असंतोष जरूर है, लेकिन फिलहाल टूट टल गई है. असम विधानसभा चुनाव से पहले यह घटनाक्रम कांग्रेस और बीजेपी दोनों के लिए अहम माना जा रहा है.