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क्या होती है पैनिक बाइंग? एक्सपर्ट से समझें शॉपिंग के पागलपन के पीछे छुपा मनोव‍िज्ञान

पैनिक बाइंग वह मानसिक स्थिति है जिसमें लोग किसी वस्तु की कमी या खत्म होने के डर से अत्यधिक खरीदारी करते हैं. ये व्यवहार केवल राशन तक सीमित नहीं, बल्कि नए गैजेट्स, सेल या ट्रेंडिंग प्रोडक्ट्स पर भी लागू होता है. मनोवैज्ञानिक बताते हैं कि यह असुरक्षा की भावना, सोशल मीडिया का प्रभाव और 'हर्ड मेंटालिटी' से जुड़ा है. जान‍िए- कैसे बचें.

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आउट ऑफ स्टॉक का डर दिखाकर कंपनियां कैसे घुमाती हैं आपका दिमाग? (Source: Twitter)
आउट ऑफ स्टॉक का डर दिखाकर कंपनियां कैसे घुमाती हैं आपका दिमाग? (Source: Twitter)

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी नए फोन की सेल शुरू होने वाली हो और आप रात के 12 बजे फोन लेकर बैठ जाएं? या फिर जैसे ही खबर आए कि किसी चीज की कमी होने वाली है, आप जरूरत से ज्यादा सामान घर में भर लें? हम इसे अक्सर 'क्रेज' या 'जरूरत' का नाम देते हैं, लेकिन मनोविज्ञान की भाषा में इसे 'पैनिक बाइंग' (Panic Buying) कहते हैं.

सवाल ये है कि आखिर पढ़े-लिखे लोग भी इस 'भेड़चाल' का हिस्सा क्यों बन जाते हैं? क्यों हमें लगता है कि अगर आज यह नया प्रोडक्ट नहीं खरीदा, तो हम दुनिया से पीछे छूट जाएंगे? आइए, आज मेंटल हेल्थ की नजर से इस दिमागी उलझन को समझते हैं.

क्या है ये 'पैनिक बाइंग'?

असल में पैनिक बाइंग वो स्थिति है जब लोग किसी चीज के खत्म होने के डर से या दूसरों को देखकर अचानक बहुत ज्यादा खरीदारी करने लगते हैं. यह सिर्फ राशन तक सीमित नहीं है. आज के दौर में यह 'FOMO' (Fear Of Missing Out) यानी कुछ छूट जाने के डर के रूप में नए आईफोन, जूतों के नए कलेक्शन या किसी ट्रेंडिंग गैजेट पर भी लागू होता है.

दिमाग में चलता है कौन सा 'केमिकल लोचा'?

जब हम देखते हैं कि 'सिर्फ 2 आइटम बचे हैं' या 'सेल 10 मिनट में खत्म होने वाली है', तो हमारे दिमाग का 'अमिगडाला' (Amygdala) हिस्सा एक्टिव हो जाता है. यह दिमाग का वह हिस्सा है जो हमें 'खतरे' का अहसास कराता है. यहां खतरा जान का नहीं, बल्कि उस प्रोडक्ट को खो देने का होता है. जैसे ही हम उसे खरीद लेते हैं, दिमाग में 'डोपामाइन' रिलीज होता है, जो हमें जीत का अहसास कराता है.

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एक्सपर्ट्स की राय: क्यों बेकाबू हो जाता है मन?

इस व्यवहार पर जाने-माने मनोवैज्ञानिक और डीयू मनोव‍िज्ञान विभाग के हेड प्रो चंद्र प्रकाश कहते हैं कि पैनिक बाइंग असल में इंसान के अंदर छिपी असुरक्षा की भावना है. जब हमें लगता है कि किसी चीज की सप्लाई कम है और मांग ज्यादा, तो हमारा दिमाग 'सर्वाइवल मोड' में चला जाता है. हमें लगता है कि अगर हमारे पास वह चीज नहीं है जो सबके पास है, तो हम कमजोर या पीछे रह जाएंगे. यह एक तरह का 'कंट्रोल' पाने की कोशिश है. जब दुनिया में अनिश्चितता होती है, तो खरीदारी हमें यह झूठा अहसास दिलाती है कि हालात हमारे नियंत्रण में हैं.

मेंटल हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. विधि एम. पिलनिया का कहना है कि आजकल सोशल मीडिया इस आग में घी डालने का काम करता है. जब आप देखते हैं कि आपके सर्कल में हर कोई एक खास ब्रांड के पीछे भाग रहा है, तो आपका 'सोशल आइडेंटिटी' का डर जाग जाता है. इसे 'हर्ड मेंटालिटी' कहते हैं. व्यक्ति को लगता है कि अगर उसने भीड़ के साथ कदम नहीं मिलाया तो वह समाज से कट जाएगा. यह मानसिक तनाव और एंग्जायटी को बढ़ाता है, जिससे लोग बिना सोचे-समझे खर्च कर बैठते हैं.

इस पागलपन से कैसे बचें?

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'24-घंटे' का नियम: कोई भी बड़ा या ट्रेंडी सामान खरीदने से पहले खुद को 24 घंटे का समय दें. अगले दिन आपकी उत्तेजना अपने आप कम हो जाएगी.

लिस्ट बनाएं: शॉपिंग पर जाने से पहले या ऐप खोलने से पहले अपनी जरूरतों की लिस्ट लिखें. लिस्ट से बाहर कुछ भी न खरीदें.

नोटिफिकेशन बंद करें: सेल और डिस्काउंट वाले एप्स के नोटिफिकेशन ऑफ रखें. 'लिमिटेड ऑफर' वाले मैसेज अक्सर आपके पैनिक को ट्रिगर करते हैं.

याद रखिए, कोई भी गैजेट या सामान आपकी मानसिक शांति से बड़ा नहीं है. अगली बार जब 'Buy Now' पर क्लिक करने के लिए हाथ कांपें, तो एक गहरी सांस लें और खुद से पूछें, 'क्या मुझे इसकी वाकई जरूरत है, या बस भेड़चाल का हिस्सा हूं?'

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