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CBSE क्लास 3 से ला रहा AI... कैसे ट्रेंड होंगे टीचर? वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ने बढ़ाई 'गुरुजी' की टेंशन

सीबीएसई का विजन है कि यह सिर्फ एक नया विषय नहीं है, बल्कि बच्चों को 'फ्यूचर रेडी' बनाने की तैयारी है. 2026-27 के सत्र से शुरू होने वाले इस पाठ्यक्रम में रट्टा मारने के बजाय गेम, पजल और एक्टिविटी के जरिए पढ़ाई होगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या हमारे टीचर्स इस 'मशीनी दिमाग' को पढ़ाने के लिए खुद तैयार हैं?

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अब ब्लैकबोर्ड नहीं, टैबलेट संभालेंगे टीचर'!
अब ब्लैकबोर्ड नहीं, टैबलेट संभालेंगे टीचर'!

क्लासरूम में अब सिर्फ चॉक और बोर्ड का जमाना लद गया है. AI यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस दौर में दुनिया की सबसे बड़ी चुनौती अब छात्रों को पढ़ाना नहीं, बल्कि टीचर्स को नए एजुकेशन सिस्टम के लिए तैयार करना है.

वर्ल्ड बैंक की हालिया रिपोर्ट 'From Prospective to Prepared Teacher' ने साफ चेतावनी दी है कि सरकारें भले ही नए इंफ्रास्ट्रक्चर पर करोड़ों खर्च कर दें, लेकिन अगर टीचर तैयार नहीं हैं, तो पूरी शिक्षा व्यवस्था फेल हो जाएगी.

भारत का बड़ा कदम: क्लास 3 से ही 'AI का मंत्र'

वहीं भारत भी इस ग्लोबल चुनौती का सामना कर रहा है. कुछ ही द‍िन पहले केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने सीबीएसई (CBSE) का नया करिकुलम लॉन्च किया है, जिसके तहत अब क्लास 3 से 8 तक के बच्चे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और 'कंप्यूटेशनल थिंकिंग' पढ़ेंगे.

सीबीएसई का विजन है कि यह सिर्फ एक नया विषय नहीं है, बल्कि बच्चों को 'फ्यूचर रेडी' बनाने की तैयारी है. 2026-27 के सत्र से शुरू होने वाले इस पाठ्यक्रम में रट्टा मारने के बजाय गेम, पजल और एक्टिविटी के जरिए पढ़ाई होगी. लेकिन सबसे बड़ा सवाल यही है, क्या हमारे टीचर्स इस 'मशीनी दिमाग' को पढ़ाने के लिए खुद तैयार हैं?

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फेल हो रहे हैं पुराने सुधार, वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट क्या कहती है?

वर्ल्ड बैंक की हाल‍िया र‍िपोर्ट के अनुसार, टीचर एजुकेशन सिस्टम अक्सर 'अविकसित' रह जाता है. इसके पीछ‍े कुछ चुनौतियां आज भी हैं. अभी तक हर देश में सिर्फ थ्योरी पर जोर द‍िया जाता है. वहीं ट्रेनिंग अक्सर यूनिवर्सिटी तक सीमित रहती है, जहां प्रैक्टिकल अनुभव की कमी होती है.

रिपोर्ट के अनुसार टीचर्स की कमी भी बड़ा मुद्दा है. कमी पूरी करने के लिए ट्रेनिंग का समय छोटा करना या मानकों में ढील देना लंबे समय में नुकसानदेह साबित हो रहा है. रिपोर्ट का संदेश साफ है कि एजुकेशन सिस्टम उतना ही अच्छा परफॉर्म करेगा, जितने अच्छे उसके टीचर्स होंगे.

एक्सपर्ट ने माना, वक्त की जरूरत है ट्रेनिंंग 

डीएवी स्कूल दिल्ली की प्र‍िंस‍िपल डॉ ज्योति अरोड़ा कहती हैं कि अब आने वाले दौर में टीचर का रोल सिर्फ एक 'सूचना देने वाला' या क‍िताबों की थ्योरी पढ़ाने वाला एकदम नहीं होने वाला है.  वजह साफ है, जानकारी तो गूगल पर भी उपलब्ध है. अब टीचर की भूमिका एक 'फैसिलिटेटर' (मार्गदर्शक) की है. सीबीएसई द्वारा क्लास 3 से AI शुरू करना एक क्रांतिकारी कदम है, लेकिन इसके लिए हमें टीचर्स को 'क्रिटिकल थिंकिंग' और 'टेक-सैवी' बनाने पर सबसे ज्यादा निवेश करना होगा. इतना ही नहीं टीचर्स को ट्रेन‍िंग देने वालों को भी बहुत अपडेट होना होगा. 

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एल्कॉन इंटरनेशनल स्कूल मयूर व‍िहार में गण‍ित के वर‍िष्ठ श‍िक्षक राजीव झा कहते हैं कि टीचर्स को अब 'एडप्टिव लर्निंग' सीखना होगा. AI टूल्स का इस्तेमाल करके कैसे हर बच्चे की जरूरत के हिसाब से पढ़ाई को कस्टमाइज किया जाए, यही भविष्य की सबसे बड़ी स्किल है. वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट सही कहती है कि फाउंडेशन मजबूत होनी चाहिए. जब तक हमारी टीचर ट्रेनिंग में प्रैक्टिकल और टेक्नोलॉजी का मेल नहीं होगा, तब तक हम 'विकसित भारत' के सपने को क्लासरूम में नहीं उतार पाएंगे.

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