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जंग की खबरों के बीच बच्चों को कैसे रखें शांत? वार एंजाइटी से बचाने के लिए पेरेंट्स अपनाएं ये टिप्स

विशेषज्ञ मानते हैं कि परीक्षा का दबाव पहले से ही छात्रों के मन में तनाव बढ़ा देता है. जब इसके साथ युद्ध, हमले या पूरी दुनिया के कई देशों के टकराव की खबरें जुड़ जाती हैं, तो टीनेज बच्चों में डर, असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता की भावना पैदा हो सकती है.

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‘वार एंग्जायटी’ क्या है? एग्जाम दे रहे बच्चों के लिए क्यों खतरनाक (Image Credit: Pexels)
‘वार एंग्जायटी’ क्या है? एग्जाम दे रहे बच्चों के लिए क्यों खतरनाक (Image Credit: Pexels)

ईरान में खामनेई की मौत की खबरों के बाद जिस तरह सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर युद्ध की आशंका, हमलों और जवाबी कार्रवाई को लेकर लगातार बहस और वीडियो चल रहे हैं, उसने माहौल में अलग ही बेचैनी पैदा कर दी है. इसी बीच देश भर में बोर्ड परीक्षाएं भी जारी हैं. ऐसे समय में ‘वार एंग्जायटी’ यानी युद्ध से जुड़ी चिंता का असर बच्चों पर ज्यादा गहरा पड़ सकता है. खासकर एग्जाम दे रहे बच्चों पर. 

विशेषज्ञ मानते हैं कि परीक्षा का दबाव पहले से ही छात्रों के मन में तनाव बढ़ा देता है. जब इसके साथ युद्ध, हमले या पूरी दुनिया के कई देशों के टकराव की खबरें जुड़ जाती हैं, तो टीनेज बच्चों में डर, असुरक्षा और भविष्य को लेकर अनिश्चितता की भावना पैदा हो सकती है.  मनोचिकित्सकों के अनुसार, इसका असर पढ़ाई में ध्यान भटकने, नींद कम होने, चिड़चिड़ापन बढ़ने या अचानक घबराहट के रूप में दिख सकता है. जो बच्चे पहले से एंग्जायटी या परीक्षा तनाव से जूझ रहे हैं, उनमें यह असर और ज्यादा हो सकता है. 

क्या हाती है वार एंग्जायटी?

हावर्ड यूनिवर्सिटी की एक स्टडी के मुताबिक वार एंजाइटी, जिसे कभी-कभी न्यूक्लियर एंग्जायटी भी कहा जाता है, युद्ध या सैन्य संघर्ष से जुड़ी खबरें, तस्वीरें और वीडियो देखने के बाद पैदा होने वाली सामान्य मानसिक प्रतिक्रिया है.  एक स्टडी के मुताबिक यूक्रेन युद्ध की खबरें जब दो साल लंबी महामारी के बाद सामने आईं, तो उन्होंने लोगों के मन पर गहरा असर डाला. विशेषज्ञ मानते हैं कि उस समय लोग पहले से ही थकान, चिंता और नियंत्रण की कमी जैसी भावनाओं से गुजर रहे थे, इसलिए युद्ध की खबरों का प्रभाव और ज्यादा महसूस हुआ.

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आंकड़े क्या कहते हैं?

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन के एक पोल में करीब 80% लोगों ने माना कि रूस-यूक्रेन युद्ध की खबरों ने उन्हें मानसिक रूप से काफी तनाव दिया.  सामूहिक हिंसा से जुड़ी चिंता का लंबे समय में क्या असर पड़ता है, इस पर अभी भी शोध जारी है. वहीं  फिनलैंड में हुई एक स्टडी में पाया गया कि जो किशोर न्यूक्लियर युद्ध को लेकर ज्यादा चिंतित थे, उनमें पांच साल बाद सामान्य मानसिक रोग जैसे एंग्जायटी और डिप्रेशन का खतरा अधिक था.

ज्यादा खबरें, ज्यादा घबराहट

रिसर्च बताती है कि जो लोग पहले से एंग्जायटी से जूझ रहे होते हैं, वे ऐसे संकटों की खबरें और ज्यादा देखने लगते हैं. इससे उनकी चिंता और बढ़ जाती है. यह एक दुष्चक्र बन जाता है, जितनी ज्यादा खबरें, उतनी ज्यादा बेचैनी.

मनोचिकित्सकों के अनुसार, पैनिक अटैक या एंग्जायटी डिसऑर्डर से पीड़ित लोगों के लिए युद्ध की खबरें ट्रिगर का काम करती हैं. लगातार फ्लैश होती ब्रेकिंग न्यूज, धमाकों के वीडियो और संभावित हमलों की आशंका मानसिक स्थिति को और कमजोर कर सकती है. वहीं छात्रों में एकाग्रता की कमी आती है, वो बार बार स्क्रोल करते हैं, उन्हें भव‍िष्य की चिंता और एक अनजाना भय होता है जिसका असर याद करने समझने की शक्त‍ि पर पड़ता है. 

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बच्चों पर असर

विशेषज्ञों का कहना है कि छोटे बच्चों पर इसका असर और गहरा हो सकता है. वे युद्ध या धमाकों जैसी घटनाओं को पूरी तरह समझ नहीं पाते, जिससे उनके मन में स्थायी डर बैठ सकता है.  इसके लक्षणों में डरावने सपने आना, बिस्तर गीला करना, चिड़चिड़ापन और सामाजिक गतिविधियों से दूरी बनाना शामिल हो सकते हैं.

एक अंतरराष्ट्रीय अध्ययन के अनुसार, युद्ध प्रभावित इलाकों में रहने वाले बच्चों में PTSD (पोस्ट-ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) के लक्षण देखे गए हैं. यूक्रेन युद्ध के दौरान बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं तीन गुना तक बढ़ी—जिनमें अवसाद, चिंता और नींद की परेशानी प्रमुख थीं.

विशेषज्ञ क्या कहते हैं?

IHBAS, दिल्ली के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश के अनुसार, लगातार नकारात्मक खबरें देखने से मस्तिष्क में स्ट्रेस हार्मोन बढ़ जाता है. इसका असर नींद की कमी, चिड़चिड़ापन और पैनिक अटैक के रूप में दिख सकता है.

मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि बच्चों को सुरक्षित माहौल देना बेहद जरूरी है. माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों से खुलकर बात करें, उनके डर को समझें और भरोसा दिलाएं कि वे सुरक्षित हैं.

डॉ. अनिल शेखावत सलाह देते हैं कि ऐसे समय में मीडिया की खपत सीमित रखें. दिनभर खबरों में डूबे रहने के बजाय केवल विश्वसनीय स्रोतों से जरूरी जानकारी लें. योग, ध्यान और परिवार के साथ समय बिताना मानसिक संतुलन बनाए रखने में मददगार हो सकता है.

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विशेषज्ञ से जानें- पेरेंट्स क्या करें?

खबरों की सीमा तय करें, बच्चों के सामने लगातार न्यूज चैनल या युद्ध से जुड़े वीडियो न चलाएं. 
खुलकर बात करें, बच्चे अगर सवाल पूछें तो उन्हें सरल और आश्वस्त करने वाले शब्दों में जवाब दें. 
सुरक्षा का भरोसा दें, उन्हें समझाएं कि वे सुरक्षित हैं, ये सब जो घट रहा अस्थायी है, इसमें न फंसें. 
रूटीन बनाए रखें, पढ़ाई, खेल और नींद का नियमित समय बनाए रखना मानसिक संतुलन में मदद करता है. 
स्क्रीन टाइम नियंत्रित करें, खासकर सोशल मीडिया पर वायरल डरावने या उन्मादी वीडियो से दूरी रखें. 

लक्षण दिखें तो मदद लें 

अगर बच्चा लगातार डर, घबराहट या नींद की समस्या से जूझ रहा है, तो विशेषज्ञ से सलाह लेने में देरी न करें. व‍िशेषज्ञ मानते हैं कि युद्ध की खबरें भले ही दूर कहीं घट रही हों, लेकिन उनका मनोवैज्ञानिक असर घर के भीतर तक पहुंच सकता है. ऐसे समय में बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत स्थिर माहौल, भरोसे और संवाद की होती है. 

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