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चौंकाने वाली रिपोर्ट: बड़े बच्चे की बेरोजगारी बन रही माता-पिता के डिप्रेशन की वजह

आज के समय में बेरोजगारी सिर्फ युवाओं की समस्या नहीं रह गई है, बल्कि इसका असर पूरे परिवार पर देखने को मिल रहा है. खासकर भारत में जहां परिवार एक-दूसरे पर काफी हद तक निर्भर रहते हैं और जब बच्चों की नौकरी चली जाती है तो इसका सीधा असर माता-पिता की मानसिक स्थिति पर पड़ता है. इस मुद्दे को समझने के लिए किए गए एक नए अध्ययन में कई चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं, जो दिखाते हैं कि बेरोजगारी कैसे पीढ़ियों के बीच भावनात्मक बोझ बन जाती है. 

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बड़े बच्चे की नौकरी जाने से माता-पिता में बढ़ रहा डिप्रेशन. (Photo: ITG)
बड़े बच्चे की नौकरी जाने से माता-पिता में बढ़ रहा डिप्रेशन. (Photo: ITG)

ऐसे समय में जब नौकरी की असुरक्षा बढ़ रही है और लोगों को नौकरी से निकाला जा रहा है. बड़ी-बड़ी कंपनियां छटनी कर रही हैं, इस बीच एक नए अध्ययन से पता चलता है कि भारत में बेरोजगारी का प्रभाव केवल व्यक्ति तक ही सीमित नहीं है. यह परिवारों में गहराई तक फैलता है, जिससे माता-पिता के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ता है. भारत के LASI के एक नए अध्ययन में पता चला है कि भारत में बुजुर्ग लोगों में डिप्रेशन का खतरा ज्यादा होता है, जब उनके बड़े (Adult) बच्चे बेरोजगार होते हैं. आंकड़े बताते हैं कि माता-पिता में ये खतरा लगभग 12 प्रतिशत तक बढ़ जाता है. इसकी वजह यह है कि कई परिवारों में माता-पिता बच्चों पर आर्थिक और सामाजिक रूप से निर्भर रहते हैं. ऐसे में जब बच्चे की नौकरी चली जाती है, तो पूरे परिवार पर तनाव बढ़ जाता है. 

रिसर्च में शामिल हैं इतने उम्र के लोग 

बता दें कि इस अध्ययन में 45 साल और उससे ऊपर के 73,000 से ज्यादा लोगों को शामिल किया गया है. इससे यह भारत में बुजुर्गों और परिवार के जीवन को सबसे व्यापक रूप से दिखाने वाला अध्ययन बन गया है.

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क्यों माता-पिता पर पड़ रहा है असर?

भारत में परिवार पीढ़ियों से बहुत करीब रहते हैं. कई बुजुर्ग लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों, हेल्थ और फाइनेंशियल मदद के लिए बच्चों पर निर्भर रहते हैं. इसके अलावा, कई माता‑पिता अपने बच्चों की नौकरी और आर्थिक स्थिति को अपनी सफलता से जोड़ते हैं. इसलिए जब बच्चे बेरोजगार होते हैं, तो उन्हें यह अपने परिवार की और अपनी व्यक्तिगत असफलता जैसा महसूस होता है. जब बेरोजगारी के कारण यह मदद और सहारा कम हो जाता है, तो तनाव सिर्फ पैसे का नहीं रहता. यह भावनात्मक दबाव बन जाता है, जिससे माता‑पिता की सुरक्षा और खुशहाली पर भी असर पड़ता है. रिसर्च में यह भी पाया गया है कि पहले जन्मे बच्चे की बेरोजगारी का असर माता-पिता पर सबसे ज्यादा होता है. यह पुरानी सामाजिक सोच को दर्शाता है कि सबसे बड़े बच्चों को परिवार का मुख्य सहारा माना जाता है जिसके कारण असर ज्यादा होता है. 

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इन लोगों पर पड़ता है कम असर

इस अध्ययन में एक और नया खुलासा हुआ है कि जो लोग सामाजिक संपर्क में रहते हैं उनके ऊपर इन चीजों का असर कम पड़ता है. लेकिन वहीं, अगर वे अलग और अकेले रहते हैं तो उनके ऊपर इसका असर ज्यादा दिखता है. जो बुजुर्ग सामाजिक रूप से सक्रिय रहते हैं यानी दोस्तों या ग्रुप में उठते-बैठते हैं उनमें अवसाद का खतरा काफी कम होता है, भले ही उनके बच्चे बेरोजगार हों. लेकिन जो लोग अकेले या अलग-थलग रहते हैं, उनमें मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएं जल्दी बढ़ती है. 

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