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15 मिनट में घर में 'मेड'! ये करियर का नया दौर या नई चुनौती, जान‍िए क्या बदल रहा है? 

विशेषज्ञों का कहना है कि यह गिग इकोनॉमी का एक ब्लैक बॉक्स है, जहां फिक्स्ड सैलरी और मेडिकल बेनिफिट नहीं मिलते. ग्राहकों की चिंता है कि तकनीक भरोसे का विकल्प नहीं बन पा रही, क्योंकि घरेलू कामगारों का पारंपरिक भरोसा ऐप्स से पूरी तरह नहीं जुड़ पाया है.

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इंस्टा पर इन द‍िनों मेरे फीड पर एक ऐड बहुत आता है. इसमें मह‍िला एक ऐप से चंद मिनटों में अपने घर में 'यून‍िफॉर्म वाली मेड' को बुला लेती है. फिर वो बताती है कि कैसे अब हाउस हेल्प बुलाना आसान हो गया है. कैसे वो मह‍िला लिमिटेड टाइम में घर के काम जैसे झाड़ू-पोछा, बर्तन, डस्ट‍िंग सब कर देगी. इस पर छानबीन करने पर सामने आया कि ये ऐप इकलौती नहीं है, मार्केट में ऐसी कई ऐप आ चुकी हैं. 

देखा जाए तो ये स‍िर्फ एक हाउस हेल्प प्रोवाइड करने वाली ऐप नहीं हैं, बल्क‍ि ये स्क‍िल्ड जॉब वाली घरेलू कामगार महिलाओं के कर‍ियर को नई पहचान भी दे रही हैं. इनमें 'प्रोंटो' और 'अर्बन कंपनी' जैसे ऐप 15 मिनट में हाउस-हेल्प मुहैया कराने का दावा करते हैं. बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक 'प्रोंटो' ने महज 10 महीनों में रोजाना 15,000 बुकिंग का आंकड़ा छू लिया है. यह दिखाता है कि शहरों में 'तुरंत सर्विस' की मांग कितनी ज्यादा है. 

वहीं दूसरी तरफ ऐप के जरिये काम करने के अपने साइड इफेक्ट भी सामने हैं. मसलन इसमें कम समय में अपना काम करने का अलग-सा मेंटल प्रेशर है. उसके बाद इसमें रेट‍िंग के जरिए किसी कर्मचारी की इमेज गढ़ने का भी दबाव भी कर्मचारी पर ही है. इंदिरापुरम में तीन घरों में कुक‍िंग करने वाली गायत्री बताती हैं कि उन्हें भी ऐप के जरिये घर जाकर कुकिंग करने का ऑफ‍र मिला था. लेकिन उन्हें मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल करना और क‍िसी का एड्रेस खोजना आसान नहीं लगता. वो कहती है, 'मैं तीनों घरों में अपने टाइम से जाकर कुक‍िंग और एक घर में सफाई करके 26 हजार रुपये मंथली कमा लेती हूं, मुझे ये एक बंधी इनकम लगती है.' गायत्री कहती हैं कि ऐप से काम मिले न मिले क्या भरोसा. 

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ऐप के जरिये घर में हाउस हेल्प बुलाने की अपनी चुनौतियां भी लोगों को समझ आ रही हैं. गाजियाबाद में रहने वाली खुशी सिंह कहती हैं कि मेरे पति ऑफ‍िस चले जाते हैं, ऐसे में मैं ऐप के जरिए किसी को भी बुलाने में सुरक्षित महसूस नहीं करती. बाहर से आने वाली कोई भी हाउस हेल्प आपके पूरे घर में जाने का एक्सेस पा लेती है. हम अचानक किसी पर ट्रस्ट नहीं कर सकते. 

अब कोई भरोसा करे या न करे, या हाउस हेल्प में पैसे कम हों, लेकिन कई लोगों को ऐप के जरिए काम करना आसान लग रहा है. एनसीआर में हाउस हेल्प के तौर पर काम करने वाली श‍िवरानी बताती हैं कि उनके मुहल्ले की कई नई उम्र की लड़‍कियों ने ऐप के जरिये काम शुरू क‍िया है. वो कहती हैं कि ऐप के जरिये काम करने में आसानी भी बहुत है. हमारे पेशे में छुट्टी लेना बहुत मुश्क‍िल होता है, आप दो चार दिन की छुट्टी ले लो तो कई बार काम भी छूट जाता है, वहीं ऐप के जरिये काम करने में ये फायदा होता है कि आप फ्री होते हैं. अगर आपको काम नहीं करना तो कैंस‍िल कर दो. 

गिग इकोनॉमी का 'ब्लैक बॉक्स': आजादी या अदृश्य बेड़ियां?
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, 'प्रोंटो' जैसी कंपनियों की सफलता के पीछे एक बड़ा हाथ उनके एल्गोरिदम का है, जो डिमांड और सप्लाई को सेकंडों में मैच करता है. बता दें क‍ि गिग इकोनॉमी एक ऐसी मुक्त बाजार व्यवस्था है, जहां कंपनियों और कर्मचारियों के बीच लंबी अवधि का कॉन्ट्रैक्ट नहीं होता, बल्कि 'फ्रीलांस' या 'ऑन-डिमांड' आधार पर छोटे-छोटे काम (Gigs) किए जाते हैं.

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शिवरानी जैसी महिलाओं के लिए यह 'आजादी' जैसा लग सकता है क्योंकि यहां जब चाहा काम किया, जब चाहा छुट्टी ली, का विकल्प है. लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह 'गिग इकोनॉमी' का एक ऐसा ब्लैक बॉक्स है जहां कोई 'फिक्स्ड सैलरी' या 'मेडिकल बेनिफिट' नहीं है. जिस दिन ऐप पर बुकिंग कम हुई या रेटिंग गिरी, उस दिन चूल्हा जलना मुश्किल हो सकता है. यह 'फ्लेक्सिबिलिटी' (लचीलापन) भविष्य में एक बड़ी चुनौती बन सकती है.

क्या भरोसे का विकल्प बन पाएगा टेक्नोलॉजी?
बीबीसी की पड़ताल बताती है कि 15,000 रोजाना बुकिंग के पीछे तकनीक तो है, लेकिन 'भरोसा' अभी भी एक बड़ा सवाल है. खुशी सिंह जैसे ग्राहकों की चिंता वाजिब है, क्योंकि भारतीय समाज में हाउस-हेल्प सिर्फ एक कर्मचारी नहीं, बल्कि घर के एक भरोसेमंद सदस्य की तरह होती है. ऐप भले ही 'यूनिफॉर्म' और 'बैकग्राउंड वेरिफिकेशन' का दावा करें, लेकिन वह 'इमोशनल सिक्योरिटी' प्रदान नहीं कर पाते जो सालों से आने वाली गायत्री जैसी घरेलू कामगार देती हैं. ऐसे में आने वाले दौर में मुकाबला '15 मिनट की सर्विस' और 'वर्षों के पुराने भरोसे' के बीच होगा.

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