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अमेरिका में नहीं होते IAS... जान‍िए बिना UPSC जैसे कठ‍िन एग्जाम के US में कैसे बनते हैं ब्यूरोक्रेट्स?

भारत में यूपीएससी क्लियर कर आईएएस या आईपीएस बनने पर नौकरी स्थायी होती है, जबकि अमेरिका में राष्ट्रपति बदलते ही लगभग 4,000 टॉप अफसरों की नियुक्ति भी बदल जाती है. अमेरिका में यह व्यवस्था 'स्पॉइल्स सिस्टम' कहलाती है, जिसमें राजनीतिक नियुक्तियां होती हैं, लेकिन स्थिरता फेडरल सिविल सर्विस के स्थायी कर्मचारियों के कारण बनी रहती है.

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USA vs India: अमेरिका में क्यों नहीं होती आईएएस की परीक्षा? (File Photo: ITG)
USA vs India: अमेरिका में क्यों नहीं होती आईएएस की परीक्षा? (File Photo: ITG)

हमारे देश में जब कोई युवा एक बार यूपीएससी (UPSC) क्लियर करके आईएएस (IAS) या आईपीएस (IPS) बन जाता है तो उसकी नौकरी साठ साल तक के लिए पूरी तरह पक्की और सेफ हो जाती है. देश में सरकार चाहे बीजेपी की हो, कांग्रेस की हो या किसी क्षेत्रीय दल की, ब्यूरोक्रेसी का ये ढांचा कभी नहीं बदलता. इसे हम 'परमानेंट ब्यूरोक्रेसी' कहते हैं.

लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया के सबसे ताकतवर देश, यानी अमेरिका (USA) में 'आईएएस' जैसा कोई परमानेंट कैडर होता ही नहीं है? वहां का एडमिनिस्ट्रेशन स्टाइल भारत से बिल्कुल उल्टा है. अमेरिका में जैसे ही राष्ट्रपति (प्रेसिडेंट) बदलता है, वैसे ही वाइट हाउस से लेकर तमाम मंत्रालयों के टॉप अफसरों का बोरिया-बिस्तर बंध जाता है.

इस व्यवस्था को सुनकर मन में पहला सवाल यही आता है कि अगर हर चार साल में पूरी लीडरशिप बदल जाती है तो फिर सुपरपावर अमेरिका में 'स्टेबिलिटी' (स्थिरता) कैसे बनी रहती है? 

क्या वाकई अमेरिका में राष्ट्रपति 4,000 अफसर अपने साथ लाता है?
जी हां, यह बात 100% सच और फैक्ट-चेक्ड है. अमेरिका में इस व्यवस्था को 'स्पॉइल्स सिस्टम' (Spoils System) या 'पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट्स' कहा जाता है.

अमेरिकी सरकार की आधिकारिक गाइड और ऐतिहासिक व्यवस्था के मुताबिक अमेरिका में हर चार साल में राष्ट्रपति चुनाव के बाद संसद (Congress) द्वारा एक किताब प्रकाशित की जाती है, जिसे 'प्लस बुक' कहते हैं. इसमें उन करीब 4,000 सिविलियन पदों की लिस्ट होती है, जिन पर आने वाला नया राष्ट्रपति अपनी मर्जी के लोगों को नियुक्त करता है.

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टॉप रोल्स पर कब्ज़ा: इन 4,000 पदों में कैबिनेट सेक्रेटरी, एंबेसडर (राजदूत), नीति निर्माता और विभिन्न विभागों के डायरेक्टर शामिल होते हैं. इन्हें 'पॉलिटिकल अपॉइंटीज' कहा जाता है.

पैकअप का नियम: जैसे ही उस राष्ट्रपति का कार्यकाल (Term) खत्म होता है या नई पार्टी सत्ता में आती है, इन सभी 4,000 अफसरों का भी पैकअप हो जाता है. नया राष्ट्रपति अपने वफादारों और अपनी विचारधारा के एक्सपर्ट्स की नई टीम लेकर आता है.

फिर वहां 'स्टेबिलिटी' कैसे रहती है? 

अब आते हैं आपके सबसे बड़े सवाल पर कि अगर टॉप के सारे लोग बदल जाते हैं, तो देश कैसे चलता है? दरअसल, अमेरिका में प्रशासन की दो परतें (Two Layers) होती हैं. 

पॉलिटिकल लेयर (Top 4,000): यह सिर्फ नीतियां तय करने और राष्ट्रपति के विजन को लागू करने के लिए होती है.

करियर सिविल सर्विस: इस 4,000 की क्रीम के नीचे करीब 20 लाख (2 मिल‍ियन) स्थायी कर्मचारी और विशेषज्ञ काम करते हैं. ये लोग 'फेडरल सिविल सर्विस' का हिस्सा होते हैं, जो मैरिट के आधार पर चुने जाते हैं. सरकार बदलने से इनकी नौकरी पर कोई आंच नहीं आती. यह स्थायी अमला ही असल में फाइलों को आगे बढ़ाता है और देश को स्थिरता देता है. जब तक नया बॉस (पॉलिटिकल अपॉइंटी) विभाग को समझता है, तब तक ये परमानेंट एक्सपर्ट्स ही बैकएंड संभालते हैं.

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भारत में क्यों है 'परमानेंट ब्यूरोक्रेसी'?
अमेरिका के उलट, भारत ने अंग्रेजों के 'वेस्टमिंस्टर मॉडल' को चुना. भारतीय संविधान के आर्टिकल 311 के तहत सिविल सेवकों को एक विशेष सुरक्षा कवच मिला हुआ है. भारत में परमानेंट ब्यूरोक्रेसी रखने की बड़ी वजह यह थी कि हमारा देश विविधताओं से भरा है और आजादी के समय यहां राजनीतिक स्थिरता को लेकर चिंताएं थीं. भारत का नियम है कि पॉलिटिकल बॉस अस्थाई हैं, लेकिन प्रशासनिक बॉस स्थाई हैं. नेता आते-जाते रहेंगे, लेकिन सरकार की नीतियां और देश की गाड़ी नहीं रुकनी चाहिए.

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