मार्च 2026 में जापान ने स्पष्ट कर दिया कि उसकी अर्थव्यवस्था को जिंदा रखने के लिए अब 'AI दिमाग' वाले रोबोट अनिवार्य हैं. जापान सरकार 2040 तक वैश्विक फिजिकल AI बाजार में 30% हिस्सेदारी चाहती है और इसके लिए उसने लगभग 52,500 करोड़ रुपये ($6.3 बिलियन) का फंड जारी किया है. लेकिन भारत की स्थिति इससे बिल्कुल अलग है. यहाँ तकनीक तो है, लेकिन कोई ठोस राष्ट्रीय रणनीति नहीं.
क्या है यह 'फिजिकल AI'?
अभी तक हम AI को सिर्फ स्क्रीन (Chatbots) पर देखते थे. लेकिन फिजिकल AI वह सिस्टम है जो देख सकता है, सीख सकता है और असल दुनिया में काम कर सकता है. ये सिर्फ मशीनें नहीं, बल्कि 'शरीर वाले निर्णय लेने वाले सिस्टम' हैं.
चीन और जापान: मजबूरी में बना रहे रोबोट
चीन: यहां AgiBot जैसे स्टार्टअप्स ने EV फैक्ट्रियों में 500 से ज्यादा ह्यूमनॉइड रोबोट तैनात कर दिए हैं. शंघाई ने 10,000 से ज्यादा रोबोट्स को 'लाइसेंस' जारी किया है. चीन के पास आज दुनिया के 70% 'एम्बॉडेड AI' (एम्बॉडीड AI) मॉडल हैं.
जापान: जापान की कामकाजी आबादी तेजी से घट रही है. वहां सवाल यह नहीं है कि रोबोट नौकरी छीनेंगे, बल्कि सवाल यह है कि "जब इंसान ही नहीं बचेंगे, तो काम कौन करेगा?"
भारत का संकट: रोबोट बनाम रोजगार
भारत में स्थिति इसके उलट है. पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे 2025 के अनुसार, भारत में युवा बेरोजगारी दर (15-29 वर्ष) 9.9% है, जो कुल बेरोजगारी दर (3.1%) से तीन गुना ज्यादा है.
भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या उस देश को मशीनों के पीछे भागना चाहिए, जो पहले से ही अपने युवाओं को नौकरियां देने के लिए संघर्ष कर रहा है?
भारत में अभी क्या हो रहा है?
भारत पूरी तरह पीछे नहीं है, लेकिन यहां प्रयास बिखरे हुए हैं. जैसे खेती कि XMachines जैसे स्टार्टअप्स तेलंगाना और कर्नाटक में ऐसे रोबोट्स का परीक्षण कर रहे हैं जो फसल की निगरानी कर सकते हैं और पैदावार दोगुनी कर सकते हैं.
फंडिंग की कमी में जहां चीन-जापान अरबों डॉलर खर्च कर रहे हैं, वहीं भारत के रोबोटिक्स इकोसिस्टम को अब तक मात्र $100 मिलियन का निवेश मिला है. जापान और चीन के लिए रोबोट 'रिप्लेसमेंट' (इंसान की जगह) हैं, लेकिन भारत के लिए इन्हें 'ऑग्मेंटेशन' (इंसान की ताकत बढ़ाने वाला) होना होगा. भारत को ऐसी तकनीक चाहिए जो उत्पादकता बढ़ाए, लेकिन रोजगार के रास्ते बंद न करे.