पहलगाम आतंकी हमले को लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की चार्जशीट सिर्फ एक हमले की जांच नहीं, बल्कि भारत के खिलाफ दशकों से चल रहे प्रॉक्सी वॉर की पूरी कहानी बयान करती है. पहलगाम आतंकी हमले में 26 लोगों की मौत हो गई थी. इस हमले ने एक बार फिर उस नेटवर्क को उजागर किया था, जो सरहद पार से संचालित होता है. इस ऑप-एड में हम इसी पैटर्न, उसके तौर-तरीकों और भारत की रणनीति को विस्तार से समझते हैं.
NIA ने 15 दिसंबर 2025 को इस मामले में चार्जशीट दाखिल की. 1,597 पेज की चार्जशीट बताती है कि पहलगाम हमला कोई अकेली घटना नहीं थी, बल्कि लंबे समय से चल रही आतंकी रणनीति का हिस्सा था. इस हमले में 25 पर्यटक और एक स्थानीय नागरिक की हत्या की गई. जांच में सात आरोपियों को नामजद किया गया है, जिनमें पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा और उसके फ्रंट TRF के सदस्य शामिल हैं. यह हमला धार्मिक आधार पर टारगेटेड किलिंग का उदाहरण था, जिसका मकसद डर और विभाजन फैलाना था.
NIA की जांच (RC-02/2025/NIA/JMU) में साफ तौर पर पाकिस्तान से इस साजिश के लिंक सामने आए हैं. चार्जशीट में पाकिस्तानी हैंडलर साजिद जट्ट का नाम प्रमुखता से लिया गया है. भारतीय कानूनों जैसे भारतीय न्याय संहिता 2023, UAPA और आर्म्स एक्ट के तहत भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने जैसी गंभीर धाराएं लगाई गई हैं. एजेंसी का कहना है कि पाकिस्तान लगातार भारत के खिलाफ आतंकवाद को बढ़ावा देता रहा है.
जुलाई 2025 में दाचीगाम में हुए ऑपरेशन महादेव में तीन पाकिस्तानी आतंकियों को मार गिराया गया. इनमें फैसल जट्ट उर्फ सुलेमान शाह, हबीब ताहिर उर्फ जिब्रान और हमजा अफगानी शामिल थे. ये सभी पहलगाम हमले में शामिल थे. इसके अलावा दो स्थानीय मददगार प्रवेज अहमद और बशीर अहमद जोठाड़ को गिरफ्तार किया गया. यह दिखाता है कि आतंकवाद अब स्थानीय सहयोग के बिना संभव नहीं रहा है.
पहलगाम हमला कोई नई बात नहीं है. 2001 में संसद हमला, 2002 का कालूचक नरसंहार, 2006 मुंबई ट्रेन ब्लास्ट, 2008 का 26/11 हमला, 2016 का पठानकोट और उरी हमला, और 2019 का पुलवामा हमला. ये सभी घटनाएं एक ही पैटर्न दिखाती हैं. हर हमले में पाकिस्तान आधारित आतंकी संगठनों की भूमिका सामने आई है. यह सिलसिला पिछले 25 साल से लगातार जारी है.
इन सभी हमलों की जांच में एक समान बात सामने आई. आतंकियों को ट्रेनिंग, फंडिंग और ऑपरेशनल निर्देश पाकिस्तान से मिलते हैं. लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन खुलेआम काम करते हैं. इन संगठनों को न सिर्फ संरक्षण मिलता है, बल्कि इन्हें रणनीतिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है. यही कारण है कि भारत इसे प्रॉक्सी वॉर कहता है.
पहलगाम चार्जशीट एक नए खतरे की ओर इशारा करती है- हाइब्रिड आतंकवाद. इसमें पाकिस्तानी हैंडलर, विदेशी आतंकी और स्थानीय सहयोगी मिलकर हमला करते हैं. TRF जैसे संगठन इस मॉडल का इस्तेमाल कर रहे हैं. धार्मिक पहचान के आधार पर हत्या करना और स्थानीय लोगों को शामिल करना इसका हिस्सा है, जिससे समाज में दरार पैदा की जा सके.
आतंकी हमलों का मकसद सिर्फ जान लेना नहीं होता, बल्कि पूरे सिस्टम को पंगु बनाना होता है. संसद, मुंबई जैसे आर्थिक केंद्र, एयरबेस और पर्यटन स्थलों पर हमले इसी रणनीति का हिस्सा हैं. इनका मकसद निवेश रोकना, डर फैलाना और सरकार को दबाव में लाना होता है.
2026 में ऑपरेशन सिंदूर की पहली बरसी और जयपुर में होने वाली जॉइंट कमांडर्स कॉन्फ्रेंस के बीच भारत अपनी रणनीति को और मजबूत कर रहा है. NIA की चार्जशीट अब अंतरराष्ट्रीय मंचों जैसे FATF और संयुक्त राष्ट्र पर पाकिस्तान के खिलाफ सबूत के रूप में इस्तेमाल हो रही है. इससे पाकिस्तान पर आर्थिक और कूटनीतिक दबाव बढ़ाने की कोशिश की जा रही है.
भारत ने इस चुनौती से निपटने के लिए तीन स्तर पर काम किया है. पहला- सैन्य कार्रवाई, जैसे ऑपरेशन महादेव और ब्रह्मोस मिसाइल की तैनाती. दूसरा- कानूनी और कूटनीतिक प्रयास, जिसमें NIA की जांच और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर डोजियर शामिल हैं. तीसरा- सामाजिक पहल, जैसे सीमावर्ती इलाकों में विकास योजनाएं, ताकि आतंकियों को स्थानीय समर्थन न मिले.
कालूचक से लेकर पहलगाम तक की तस्वीरें सिर्फ घटनाएं नहीं, बल्कि एक लंबी लड़ाई के सबूत हैं. पाकिस्तान की रणनीति समय के साथ बदली है, लेकिन उसका मकसद वही रहा है. दिसंबर 2025 की चार्जशीट इस लड़ाई का नया अध्याय है. आने वाले समय में इसका जवाब सैन्य, कूटनीतिक और सामाजिक स्तर पर लगातार देना होगा, तभी इस प्रॉक्सी वॉर को रोका जा सकता है.