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IPC Section 173: समन की तामील या अन्य कार्यवाही को रोकने पर लागू होती है ये धारा

आईपीसी की धारा 173 (IPC Section 173) में समनों की तामील (Service of summons) या अन्य कार्यवाही (Proceeding) को रोकना या प्रकाशन को रोकना (Preventing publication) परिभाषित (Define) किया गया है. आइए जान लेते हैं कि आईपीसी (IPC) की धारा 173 इस विषय में क्या जानकारी देती है?

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 समन की तामील या कार्यवाही को रोकने से जुड़ी है ये धारा समन की तामील या कार्यवाही को रोकने से जुड़ी है ये धारा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • समन की तामील या कार्यवाही को रोकने से जुड़ी है ये धारा
  • अंग्रेजी शासनकाल में लागू हुई थी आईपीसी
  • जुर्म और सजा का प्रावधान बताती है IPC

Indian Penal Code: भारतीय दंड संहिता में कई प्रकार के अपराध (Offence) परिभाषित किए गए हैं. साथ ही उनसे जुड़े तमाम कानूनी प्रावधान (Legal provision) और उनकी सजा भी परिभाषित की गई है. इसी प्रकार से आईपीसी की धारा 173 (IPC Section 173) में समनों की तामील (Service of summons) या अन्य कार्यवाही (Proceeding) को रोकना या प्रकाशन को रोकना (Preventing publication) परिभाषित (Define) किया गया है. आइए जान लेते हैं कि आईपीसी (IPC) की धारा 173 इस विषय में क्या जानकारी देती है?

आईपीसी की धारा 173 (Indian Penal Code Section 173) 
भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 173 (Section 173) में समन की तामील का या अन्य कार्यवाही का या उसके प्रकाशन का निवारण करना परिभाषित किया गया है. IPC की धारा 173 के मुताबिक, जो कोई किसी लोक सेवक द्वारा जो लोक सेवक उस नाते कोई समन, सूचना या आदेश (Summons, notice or order) निकालने के लिए वैध रूप से सक्षम (Legally capable) हो निकाले गए समन, सूचना या आदेश की तामील अपने पर या किसी अन्य व्यक्ति पर होना किसी प्रकार साशय निवारित (intentionally prevented) करेगा, 

अथवा किसी ऐसे समन, सूचना या आदेश का किसी ऐसे स्थान में विधिपूर्वक (Lawfully) लगाया जाना साशय निवारित करेगा, 

अथवा किसी ऐसे समन, सूचना या आदेश को किसी ऐसे स्थान से, जहां कि विधिपूर्वक लगाया हुआ है, साशय हटाएगा, 

अथवा किसी ऐसे लोक सेवक के प्राधिकाराधीन (Under the authority of a public servant) की जाने वाली किसी उद्घोषणा का विधिपूर्वक (Proclamation lawfully) किया जाना साशय निवारित करेगा, जो ऐसे लोक सेवक के नाते ऐसी उद्घोषणा का किया जाना निर्दिष्ट करने के लिए वैध रूप से सक्षम हो, वह अपराधी माना जाएगा.

सजा का प्रावधान (Punishment provision)
ऐसा करने वाले दोषी को साधारण कारावास से दंडित (Punished with imprisonment) किया जाएगा. जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी. या उस पर जुर्माना (Fine) किया जाएगा, जो पांच सौ रुपये तक का हो सकेगा. या फिर उसे दोनों प्रकार से दंडित किया जाएगा. यह एक जमानती (Bailable) और गैर-संज्ञेय अपराध (Non-cognizable offenses) है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट (First Class Magistrate) द्वारा विचारणीय है. यह अपराध समझौता योग्य नहीं (Not negotiable) है.

अथवा, यदि समन, सूचना, आदेश या उद्घोषणा (Summons, Notice, Order or Proclamation) किसी न्यायालय (Court) में स्वयं या अभिकर्ता द्वारा हाजिर होने के लिए या दस्तावेज अथवा इलैक्ट्रानिक अभिलेख (Document or electronic record) पेश करने के लिए हो, तो वह अपराधी के तौर पर साधारण कारावास से दंडित किया जाएगा. जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी. या उस पर एक हजार रुपये तक जुर्माना किया जाएगा. या फिर उसे दोनों ही प्रकार से दंडित किया जाएगा. 

इसे भी पढ़ें--- IPC Section 172: समन की तामील या कार्यवाही से बचकर फरार होने पर लगती है ये धारा 

क्या होती है आईपीसी (IPC)
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक (Citizen) द्वारा किये गये कुछ अपराधों (certain offenses) की परिभाषा (Definition) और दंड (Punishment) का प्रावधान (Provision) करती है. आपको बता दें कि यह भारत की सेना (Indian Army) पर लागू नहीं होती है. पहले आईपीसी (IPC) जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू नहीं होती थी. लेकिन धारा 370 हटने के बाद वहां भी आईपीसी लागू हो गई. इससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती थी.

अंग्रेजों ने लागू की थी IPC
ब्रिटिश कालीन भारत (British India) के पहले कानून आयोग (law commission) की सिफारिश (Recommendation) पर आईपीसी (IPC) 1860 में अस्तित्व में आई. और इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तौर पर 1862 में लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम सभी भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जानते हैं. इसका खाका लॉर्ड मेकाले (Lord Macaulay) ने तैयार किया था. बाद में समय-समय पर इसमें कई तरह के बदलाव किए जाते रहे हैं.

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