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IPC Section 172: समन की तामील या कार्यवाही से बचकर फरार होने पर लगती है ये धारा

आईपीसी की धारा 172 (IPC Section 172) में समनों की तामील (Service of summons) या अन्य कार्यवाही (Proceeding) से बचने के लिए फरार (Escape) हो जाने को परिभाषित (Define) किया गया है. आइए जान लेते हैं कि आईपीसी (IPC) की धारा 172 इस बारे में क्या कहती है?

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समन की तामील से बचकर भागने से जुड़ी है ये धारा समन की तामील से बचकर भागने से जुड़ी है ये धारा
स्टोरी हाइलाइट्स
  • समन की तामील से बचकर भागने से जुड़ी है ये धारा
  • अंग्रेजी शासनकाल में लागू हुई थी आईपीसी
  • जुर्म और सजा का प्रावधान बताती है IPC

Indian Penal Code: भारतीय दंड संहिता में कई प्रकार के अपराध (Offence) परिभाषित किए गए हैं. साथ ही उनसे जुड़े तमाम कानूनी प्रावधान (Legal provision) और उनकी सजा भी परिभाषित की गई है. इसी प्रकार से आईपीसी की धारा 172 (IPC Section 172) में समनों की तामील (Service of summons) या अन्य कार्यवाही (Proceeding) से बचने के लिए फरार (Escape to escape) हो जाने को परिभाषित (Define) किया गया है. आइए जान लेते हैं कि आईपीसी (IPC) की धारा 172 इस बारे में क्या कहती है?

आईपीसी की धारा 172 (Indian Penal Code Section 172) 
भारतीय दंड संहिता 1860 की धारा 172 (Section 172) में उस प्रक्रिया का प्रावधान किया गया है, जिसमें समनों की तामील या अन्य कार्यवाही से बचने के लिए कोई शख्स फरार हो जाता है. IPC की धारा 172 के मुताबिक, जो कोई किसी ऐसे लोक सेवक द्वारा निकाले गए समन, सूचना या आदेश की तामील से बचने के लिए फरार हो जाएगा, जो ऐसे लोक सेवक के नाते ऐसे समन, सूचना या आदेश को निकालने के लिए वैध रूप से सक्षम हो, वह अपराधी माना जाएगा.

सजा का प्रावधान (Punishment provision)
ऐसा करने वाले दोषी को साधारण कारावास से दंडित (Punished with imprisonment) किया जाएगा. जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी. या उस पर जुर्माना (Fine) किया जाएगा. जो पांच सौ रुपये तक का हो सकेगा. या फिर उसे दोनों प्रकार से दंडित किया जाएगा. यह एक जमानती (Bailable) और गैर-संज्ञेय अपराध (Non-cognizable offenses) है और प्रथम श्रेणी के मजिस्ट्रेट (First Class Magistrate) द्वारा विचारणीय है. यह अपराध समझौता योग्य नहीं (Not negotiable) है.

अथवा, यदि समन या सूचना या आदेश, किसी न्यायालय (Court) में स्वयं या अभिकर्ता द्वारा हाजिर होने के लिए या दस्तावेज अथवा इलेक्ट्रानिक अभिलेख  (Document or electronic record) पेश करने के लिए हो तो वह साधारण कारावास से दंडित (Punished with imprisonment) किया जाएगा. जिसकी अवधि 6 मास तक की हो सकेगी. या उस पर जुर्माना किया जाएगा. जो एक हजार रुपये तक का हो सकेगा. या फिर उसे दोनों तरह से दंडित किया जाएगा.

इसे भी पढ़ें--- IPC Section 171i: चुनाव के खर्च का लेखा जोखा रखने से संबंधित है आईपीसी की धारा 171i 

क्या होती है आईपीसी (IPC)
भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) IPC भारत में यहां के किसी भी नागरिक (Citizen) द्वारा किये गये कुछ अपराधों (certain offenses) की परिभाषा (Definition) और दंड (Punishment) का प्रावधान (Provision) करती है. आपको बता दें कि यह भारत की सेना (Indian Army) पर लागू नहीं होती है. पहले आईपीसी (IPC) जम्मू एवं कश्मीर में भी लागू नहीं होती थी. लेकिन धारा 370 हटने के बाद वहां भी आईपीसी लागू हो गई. इससे पहले वहां रणबीर दंड संहिता (RPC) लागू होती थी.

अंग्रेजों ने लागू की थी IPC
ब्रिटिश कालीन भारत (British India) के पहले कानून आयोग (law commission) की सिफारिश (Recommendation) पर आईपीसी (IPC) 1860 में अस्तित्व में आई. और इसके बाद इसे भारतीय दंड संहिता (Indian Penal Code) के तौर पर 1862 में लागू किया गया था. मौजूदा दंड संहिता को हम सभी भारतीय दंड संहिता 1860 के नाम से जानते हैं. इसका खाका लॉर्ड मेकाले (Lord Macaulay) ने तैयार किया था. बाद में समय-समय पर इसमें कई तरह के बदलाव किए जाते रहे हैं.

 

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