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तुर्कमान गेट हिंसा: दिल्ली पुलिस को बड़ा झटका, इस वजह से 6 आरोपियों को मिली जमानत

तुर्कमान गेट हिंसा मामले में दिल्ली की एक अदालत ने छह आरोपियों को जमानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि सिर्फ भीड़ में मौजूदगी के आधार पर किसी को अनिश्चितकाल तक जेल में नहीं रखा जा सकता. वीडियो में पहचान साफ नहीं है और जांच पूरी हो चुकी है.

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6 जनवरी की दरमियानी रात तुर्कमान गेट इलाके में हुई थी तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की घटना. (Photo: PTI)
6 जनवरी की दरमियानी रात तुर्कमान गेट इलाके में हुई थी तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की घटना. (Photo: PTI)

दिल्ली के तुर्कमान गेट इलाके में पिछले महीने हुई हिंसा के मामले में कोर्ट का बड़ा फैसला आया है. कोर्ट ने फैज-ए-इलाही मस्जिद के पास तोड़फोड़ और पत्थरबाजी की घटना में गिरफ्तार छह आरोपियों को जमानत दे दी है. कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद वीडियो फुटेज से आरोपियों की पहचान पुख्ता तरीके से स्थापित नहीं हो पाई है. हालांकि, पहचान की पुष्टि के लिए फोरेंसिक जांच अभी जारी है.

एडिशनल सेशंस जज भूपिंदर सिंह ने मोहम्मद फैज, मोहम्मद अफ्फान, मोहम्मद इमरान, शहज़ाद, मोहम्मद इमरान और मोहम्मद फहीम को 50 हजार रुपए के पर्सनल बॉन्ड और इतनी ही रकम की एक-एक जमानत पर राहत दी. राज्य की ओर से एडिशनल पब्लिक प्रॉसिक्यूटर अतुल श्रीवास्तव पेश हुए, जबकि आरोपियों की तरफ से वकील एम असद बेग, मंजीत सैनी सहित कई अधिवक्ता मौजूद रहे.

25 फरवरी के आदेश में कोर्ट ने साफ कहा कि आरोपों की गंभीरता को संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिले व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के साथ संतुलित करना जरूरी है. कोर्ट ने उम्र, साफ आपराधिक रिकॉर्ड, जेल में बिताए गए समय, पहले जमानत पा चुके सह-आरोपियों के बराबरी के सिद्धांत और जांच के लिए उनकी और जरूरत न होने जैसे पहलुओं को ध्यान में रखा.

कोर्ट ने इस बात पर भी गौर किया कि आरोपियों को मौके से गिरफ्तार नहीं किया गया था, बल्कि जांच के दौरान बाद में पकड़ा गया. कोर्ट ने कहा कि किसी सभा में मात्र मौजूदगी, बिना किसी स्पष्ट सबूत के सक्रिय भागीदारी या खुले तौर पर हिंसक कृत्य दिखाए बिना, प्री-ट्रायल स्टेज पर लगातार हिरासत को उचित नहीं ठहराया जा सकता. उपलब्ध सबूत किसी भी आरोपी की सक्रिय भूमिका को साबित नहीं करते.

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इससे पहले 17 फरवरी को 12 आरोपियों को जमानत दी जा चुकी है. अदालत ने बराबरी के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में कोई ऐसा अलग तथ्य सामने नहीं आया, जो इन छह आरोपियों को अलग श्रेणी में रखे. आरोप गैर-कानूनी जमावड़े और सोशल मीडिया पर सामग्री प्रसारित करने से जुड़े हैं. कोर्ट ने दोहराया कि जमानत का उद्देश्य ट्रायल के दौरान आरोपी की मौजूदगी सुनिश्चित करना है. 

अदालत ने कहा कि सिर्फ इसलिए जमानत से इनकार नहीं किया जा सकता कि आरोपित अपराध की सजा कड़ी है. ट्रायल से पहले हिरासत सजा नहीं हो सकती. इसलिए आरोप की गंभीरता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के बीच संतुलन जरूरी है. कोर्ट ने यह भी माना कि आरोपी स्थानीय निवासी हैं और उन्होंने कानून की प्रक्रिया से बचने की कोशिश नहीं की है. जांच पूरी हो चुकी है.

यहां तक कि चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और सभी गवाह पुलिस अधिकारी हैं, इसलिए सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को प्रभावित करने की संभावना नहीं है. कोर्ट ने कहा कि अब हालात सामान्य हो चुके हैं और सार्वजनिक व्यवस्था बिगड़ने की आशंका भी नहीं दिखती. जमानत की शर्तों में आरोपियों को निर्देश दिया गया है कि वे अपने मोबाइल फोन हर समय लोकेशन सर्विस के साथ ऑन रखें.

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इस घटना से जुड़ा कोई भी कंटेंट प्रसारित न करें, सार्वजनिक व्यवस्था भंग करने वाली किसी गतिविधि में हिस्सा न लें, फरार न हों और सबूतों से छेड़छाड़ न करें. 24 जनवरी को एक अलग सेशन कोर्ट ने उबैदुल्लाह को भी जमानत दी थी. इससे पहले 20 जनवरी का बेल ऑर्डर दिल्ली हाई कोर्ट ने रद्द कर मामला सेशन कोर्ट को वापस भेज दिया था. ये घटना 6 जनवरी की दरमियानी रात की है.

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