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शादी का झूठा वादा कब बनता है रेप? रिश्तेदारों की गिरफ्तारी पर कर्नाटक हाई कोर्ट की सख्त टिप्पणी, क्या कहता है कानून

कर्नाटक हाई कोर्ट ने शादी का झूठा वादा कर रेप के आरोपी के भाई की गिरफ्तारी पर सवाल उठाए हैं. आखिर कब शादी का वादा रेप माना जाता है? जानिए इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और BNS की धारा 69 के बारे में पूरी कहानी.

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इस मामले को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है (फोटो-ITG)
इस मामले को लेकर कर्नाटक हाई कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है (फोटो-ITG)

कर्नाटक हाई कोर्ट की हालिया टिप्पणी ने एक बार फिर शादी का झूठा वादा कर बनाए गए शारीरिक संबंधों से जुड़े कानून पर बहस तेज कर दी है. अदालत ने इस बात पर नाराजगी जताई कि मुख्य आरोपी अभी तक गिरफ्तार नहीं हुआ, जबकि उसके भाई को पुलिस ने पहले ही गिरफ्तार कर लिया. कोर्ट ने जांच अधिकारियों से पूछा कि आखिर आरोपी की जगह उसके भाई को गिरफ्तार करने का आधार क्या था? इस मामले ने यह सवाल भी खड़ा कर दिया कि क्या ऐसे मामलों में आरोपी के परिवार के लोगों को भी स्वतः आरोपी बनाया जा सकता है.

दरअसल, भारत में लंबे समय से यह कानूनी बहस चलती रही है कि शादी का वादा करके बनाए गए शारीरिक संबंध कब रेप की श्रेणी में आते हैं और कब नहीं? अदालतें लगातार यह स्पष्ट करती रही हैं कि हर असफल प्रेम संबंध या टूटी हुई शादी का वादा रेप नहीं माना जा सकता. ऐसे मामलों में आरोपी की मंशा, संबंध की प्रकृति और परिस्थितियों की गहराई से जांच की जाती है. यही वजह है कि हर केस का फैसला उसके अलग-अलग तथ्यों के आधार पर किया जाता है.

कर्नाटक हाई कोर्ट की टिप्पणी के बाद एक और महत्वपूर्ण मुद्दा सामने आया है कि क्या आरोपी के रिश्तेदारों को भी साजिशकर्ता या सहयोगी मानकर गिरफ्तार किया जा सकता है. अदालत ने संकेत दिया कि केवल रिश्तेदारी के आधार पर किसी को आरोपी नहीं बनाया जा सकता. यदि परिवार के किसी सदस्य की भूमिका साबित करनी है तो उसके खिलाफ ठोस और प्रत्यक्ष सबूत होना जरूरी है. सिर्फ आरोपी का भाई या रिश्तेदार होना अपराध में शामिल होने का प्रमाण नहीं माना जा सकता.

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भारतीय अदालतों ने वर्षों में इस विषय पर एक संतुलित कानूनी सिद्धांत विकसित किया है. न्यायालयों ने साफ किया है कि यदि शादी का वादा शुरू से ही धोखे के इरादे से किया गया था और उसी आधार पर महिला की सहमति हासिल की गई, तो ऐसी सहमति कानूनी रूप से वैध नहीं मानी जाएगी. लेकिन यदि शुरुआत में शादी की मंशा वास्तविक थी और बाद में परिस्थितियां बदल गईं, तो केवल शादी न होने से रेप का मामला नहीं बनता.

इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला प्रदीप कुमार बनाम बिहार राज्य (2007) माना जाता है. अदालत ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 90 के तहत तथ्य के भ्रम (Misconception of Fact) की अवधारणा का विस्तार किया. कोर्ट ने कहा कि यदि किसी महिला की सहमति धोखे या गलत जानकारी देकर हासिल की गई है तो वह कानूनी रूप से वैध सहमति नहीं होगी. यदि शादी का वादा केवल शारीरिक संबंध बनाने के लिए किया गया था, तो यह रेप की श्रेणी में आ सकता है.

इससे पहले दिलीप सिंह बनाम बिहार राज्य (2004) में भी सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि झूठे शादी के वादे के आधार पर मिली सहमति को वैध सहमति नहीं माना जा सकता. बाद में उत्तर प्रदेश राज्य बनाम नौशाद (2013) मामले में भी अदालत ने इसी सिद्धांत को दोहराया. कोर्ट ने कहा कि यदि आरोपी का शुरू से शादी करने का कोई इरादा ही नहीं था, तो महिला की सहमति तथ्य के भ्रम पर आधारित मानी जाएगी और यह रेप का मामला बन सकता है.

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सुप्रीम कोर्ट ने अनुराग सोनी बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2019) में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में केवल रेप ही नहीं बल्कि IPC की धारा 417 के तहत धोखाधड़ी (Cheating) का अपराध भी बन सकता है. यानी यदि आरोपी ने जानबूझकर झूठा वादा किया और महिला को धोखे में रखा, तो उसके खिलाफ एक से अधिक आपराधिक धाराएं लग सकती हैं. यह फैसला ऐसे मामलों में कानूनी कार्रवाई की सीमा को और स्पष्ट करता है.

हालांकि न्यायपालिका ने हमेशा यह चेतावनी भी दी है कि हर असफल प्रेम संबंध को आपराधिक मामला नहीं बनाया जा सकता. उदय बनाम कर्नाटक राज्य (2003) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि दो बालिग लोगों के बीच सहमति से संबंध बने और उस समय शादी का इरादा वास्तविक था, तो बाद में शादी न होने मात्र से रेप का अपराध नहीं बनता. अदालत ने संबंध की वास्तविक परिस्थितियों को समझने पर जोर दिया.

इसी तरह दीपक गुलाटी बनाम हरियाणा राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतों को झूठे वादे और परिस्थितियों के कारण पूरा न हो सके वादे के बीच अंतर करना चाहिए. यदि किसी कारणवश शादी नहीं हो सकी तो उसे हर हाल में धोखा नहीं माना जा सकता. इसलिए न्यायाधीशों को प्रत्येक मामले में आरोपी की नीयत और परिस्थितियों का सावधानी से मूल्यांकन करना चाहिए.

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अब भारतीय न्याय संहिता (BNS) लागू होने के बाद यह विषय और भी महत्वपूर्ण हो गया है. BNS की धारा 69 में धोखे के माध्यम से बनाए गए यौन संबंध को अलग अपराध के रूप में शामिल किया गया है. यानी अब कानून ने इस तरह के मामलों को अलग से परिभाषित कर दिया है. हालांकि अदालतें अब भी हर मामले में तथ्यों और सबूतों के आधार पर ही फैसला करती हैं.

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह कानून महिलाओं को धोखे से होने वाले यौन शोषण से बचाने के लिए बनाया गया है. लेकिन अदालतें यह भी सुनिश्चित कर रही हैं कि इसका दुरुपयोग न हो. इसलिए परिवार के अन्य सदस्यों को आरोपी बनाने से पहले उनके खिलाफ स्पष्ट और ठोस साक्ष्य होना जरूरी माना जा रहा है. केवल रिश्तेदारी के आधार पर आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती.

एडवोकेट अपूर्वा पांडे बस्सी के अनुसार अदालतों ने लगातार यह माना है कि केवल आरोपी का रिश्तेदार होने से किसी को स्वतः अपराधी नहीं माना जा सकता. उन्होंने कहा कि पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भी हाल में स्पष्ट किया है कि शारीरिक संबंध दो व्यक्तियों के बीच का निजी मामला है, न कि पूरे परिवार का. इसलिए किसी रिश्ते के टूटने का खामियाजा पूरे परिवार को नहीं भुगतना चाहिए.

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बस्सी का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में एक स्पष्ट कसौटी तय की है. अदालत यह देखती है कि क्या शादी का वादा शुरुआत से ही झूठा था या बाद में परिस्थितियां बदल गईं. यदि शुरुआत में वादा ईमानदारी से किया गया था, तो बाद में शादी न होने से रेप का मामला नहीं बनता. वहीं यदि वादा केवल महिला की सहमति पाने के लिए किया गया था, तो मामला अलग होगा.

उन्होंने यह भी बताया कि अदालतें शिकायतकर्ता की उम्र, समझदारी, संबंध की अवधि और दोनों के रिश्ते की प्रकृति पर भी गौर करती हैं. यदि दोनों लंबे समय तक प्रेम संबंध में रहे या साथ रहे और संबंध स्वेच्छा से बने, तो अदालत इसे केवल धोखे का मामला मानने से पहले सभी तथ्यों की गहन जांच करती है. इसलिए हर केस का फैसला अलग परिस्थितियों के आधार पर होता है.

एसआरएम यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. गुरमीत नेहरा का कहना है कि अदालतें अब झूठे वादे और असफल रिश्ते के बीच स्पष्ट अंतर करती हैं. उन्होंने जसपाल सिंह कौरल बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2025) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि अदालतें यह देखती हैं कि दोनों पक्ष शादी करने के कानूनी रूप से सक्षम थे या नहीं, उनका संबंध कितना लंबा था और सहमति किस आधार पर बनी थी. उन्होंने यह भी कहा कि परिवार के सदस्यों पर तभी कार्रवाई हो सकती है जब उनके खिलाफ प्रत्यक्ष और मजबूत सबूत हों. 

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कुल मिलाकर कर्नाटक हाई कोर्ट की हालिया टिप्पणी यह दोहराती है कि धोखे को सजा मिलनी चाहिए, लेकिन बिना ठोस सबूत के परिवार के लोगों को अपराधी मान लेना कानून की मंशा नहीं है.

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