कुछ लोग एक अर्थी को लेकर दिल्ली के एक श्मशान में पहुंचते हैं. वहां बाकायदा पंडित से मिलते हैं और अंतिम संस्कार से पहले की शुरुआती सारी रस्मों को पूरी करते हैं. अब बस अर्थी को चिता पर लिटाने की बारी थी, पर ऐसा हो नहीं पाया. क्योंकि उससे पहले ही अर्थी के साथ आए तमाम लोग बेहद ही रहस्यमयी तरीके से अर्थी को श्मशान में ही छोड़कर गायब हो जाते हैं.
घटना देश की राजधानी दिल्ली की है. कुछ लोग यहां के निगमबोध श्मशान घाट में मोक्ष द्वार से एक अर्थी को अंदर ले आए. रस्मो-रिवाज के हिसाब से अंतिम संस्कार से पहले अर्थी को चबूतरे पर रखा गया. अब मुर्दे की आत्मा को शांति मिलने में ज्यादा वक्त नहीं था, मोक्ष का वक्त आ चुका था. बस अब अर्थी को चिता पर लिटाने की देर थी. मगर दो घंटे बीत गए, अर्थी चबूतरे पर ही थी. सबसे हैरानी वाली बात ये कि इन दो घंटों में अर्थी के आसपास उसका कोई अपना नहीं था. जो लोग अर्थी को चबूतरे तक लेकर आए थे, वो सभी हैरतअंगेज तौर पर गायब हो चुके थे.
वक्त बीतता गया, पर चबूतरे पर पड़ी अर्थी के पास कोई नहीं आया. इस बीच बहुत से लोगों की नजर उस अर्थी पर पड़ी और उन्हें भी ये मंजर अजीब लगा. भला कोई किसी अपने की अर्थी को श्मशान तक लाने के बावजूद मोक्ष दिलाने से पहले यूं कैसे भाग सकता है? श्मशान घाट के पंडित प्रमोद शर्मा भी चबूतरे पर लवारिस पड़ी अर्थी को काफी देर देखते रहे. आसपास उन्हें भी मरने वाले का कोई रिश्तेदार नजर नहीं आया. निगमबोध घाट पर रोजाना 50 से 60 अर्थियां आती हैं, लिहाजा पंडित जी भी फिर अपने काम में बिजी हो गए. मगर फिर फुर्सत मिलते ही जब उन्होंने देखा कि अर्थी अब भी वैसे ही पड़ी है तो उन्हें कुछ शक हुआ. जब उन्होंने अर्थी को पास से जाकर देखा तो लाल रंग का कफन देखते ही वो समझ गए कि लाश किसी महिला की है. इसके बाद तुरंत कश्मीरी गेट थाने को लावारिस अर्थी की खबर दी गई.
खबर मिलते ही थाने के एसएचओ बिजेंदर सिंह लेडी पुलिस स्टाफ को लेकर तुरंत निगमबोध घाट पर पहुंच गए. लाश अब भी चबूतरे पर उसी तरह पड़ी थी. कफन हटा कर देखा तो पता चला कि लाश सोलह श्रंगार में थी. पुलिस ने श्मशान के पडितों से बात की तो पता चला कि जिस चबूतरे पर अर्थी रखी है, शिवमूर्ति घड़ाबंद के इसी चबूतरे पर पिंडदान के बाद मटके की रस्म निभाई जाती है. फिर लाश को संगम सरोवर में स्नान कराने के बाद चिता पर ले जाते हैं.
पुलिस ने अब जांच शुरू की तो पता चला कि अर्थी के पास से मटका भी गायब है. लेकिन अर्थी के पास थैले में हवन सामग्री जरूर वहीं पड़ी थी. इसके बाद जब पुलिस ने लाश का मुआयना किया तो मरने वाली के दाएं हाथ पर उसे एक टैटू गुदा नजर आया. हाथ पर अंग्रेजी में SK लिखा हुआ था. जबकि बाएं हाथ की एक उंगली में मरने वाली ने जो अंगूठी पहन रखी थी उस पर खुशबू लिखा था.
तो क्या मरने वाली का नाम खुशबू था? और एसके का क्या मतलब हुआ? इन्हीं सवालों में उलझी पुलिस को तफ्तीश के दौरान मरने वाली के शरीर पर चोट के भी कुछ निशान दिखाई दिए. पुलिस के कान फौरन खड़े हो गए, लिहाजा अब पुलिस ने और बारीकी से तफ्तीश शुरू कर दी. लेकिन तमाम कोशिश के बावजूद उसे ऐसा कोई सुरगा नहीं मिला, जिससे मरने वाली का नाम, पता उसे श्मशान तक लाने वालों का सच पता चल सके.
पुलिस ने लाश को अपने कब्जे में लेकर उसे मुर्दा घर भेजने का फैसला किया. ताकि जांच पूरी होने तक अंतिम संस्कार ना हो पाए. मगर अर्थी से लाश उठाते ही अचानक पुलिस की नजर उस अर्थी पर पड़ी. पता नहीं क्यों पर पुलिस को अर्थी अजीब सी लगी. उसकी बनावट तो अजीब थी ही साथ ही जिस बांस से अर्थी बनाई गई थी वो बांस भी अजीब था, हरा-हरा.
पता नहीं क्यों पर पुलिस को अर्थी और उसका बांस देख कर शक हो रहा था कि अर्थी बहुत जल्दबाजी में बनवाई गई है और हो ना हो इसे निगमबोध घाट के आसपास ही बनवाया गया हे. लिहाजा पुलिस ने अर्थी बनाने वालों से अपनी जांच शुरू की. पुलिस की कोशिशें एक के बाद एक नाकाम हो रही थीं. अब ये साफ हो गया था कि अर्थी निगमबोध घाट के आसपास नहीं बनी, तो फिर कहां बनी? इसी सवाल का जवाब जानने के लिए पुलिस ने एक बार फिर अर्थी को खंगालने का फैसला किया.
पुलिस को अब भी कोई सुराग हाथ नहीं लगा था. यहां तक कि पुलिस ने गुमशुदा औरतों के बारे में भी पता किया तो पता चला कि दिल्ली में इस दौरान किसी ने किसी महिला की गुमशुदगी की रिपोर्ट नहीं लिखाई है. लहाज़ा अर्थी की पड़ताल के साथ-साथ पुलिस एक बार फिर श्मशान घाट पहुंची. इस बार पंडित से पूछताछ में पुलिस को एक नई बात पता चली, अर्थी लाने वाले ने पंडित से कहा था कि वो प्रेम नगर से आया है. अब दिल्ली में कौन सा प्रेम नगर? और प्रेम नगर में कहां? पुलिस की परेशानी खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी.
अब पुलिस की कई टीमें प्रेम नगर की खोज में अमन विहार, शाहबाद डेरी और नागलोई की खाक छानने लगीं. पर खुशबू नाम की कोई महिला या अर्थी की कोई कहानी य़हां नहीं मिली. तभी पुलिस को एक चौंकाने वाली बात याद आयी और वो ये कि निगमबोध घाट के चबूतरे पर जब अर्थी मिली थी तो वहां बाकी सब कुछ था सिवाए पिंडदान के घड़े के.
दरअसल अर्थी श्मशान के अंदर जिस चबूतरे पर मिली थी, अंतिम संस्कार के हिसाब से पिंडदान का घड़ा भी वहीं होना चाहिए था. मगर घड़ा गायब था. लिहाज़ा पुलिस ने जब इस बारे में श्मशान के पंडितों का ध्यान दिलाया तो पता चल कि बहुत मुम्किन है कि अर्थी निगमबोध लाने से पहले किसी और श्मशान में ले जाई गई हो? लिहाजा अब पुलिस ने बाकी श्मशान घाटों को खंगालना शुरू कर दिया और जल्दी ही उसे बड़ी कामयाबी भी मिल गई.
पता चला कि अर्थी नगमबोध घाट लाने से पहले किराड़ी घाट ले जाई गई थी. किराड़ी घाट पर ही पूछताछ में एक लड़का भी मिल गया जो पूरे मामले का चश्मदीद था. उसने पुलिस को बताया कि अर्थी प्रेम नगर से आई थी और वो अंतिम यात्रा में कुछ देर के लिए शामिल भी हुआ था. नागलोई के प्रेम नगर में आखिरकार वो अर्थी वाला भी मिल ही गया, जिसने ये अर्थी बनाई थी. वो अर्थी वाला नागलोई का रहने वाला था.
फिर क्या था अर्थी का सुराग मिलते ही उस घर का पता भी मिल गया जहां से ये अर्थी उठी थी. पर जब पुलिस वहां पहुंची तो दरवाजे पर ताला लटका था, फिर पुलिस ने बिजली मीटर के नंबर से मकान मालिक का पता लगाया. मकान मालिक ने पूछताछ में बताया कि ये घर उसने राजू शंकर नाम के एक शख्स को बेच दिया था. तफ्तीश में पता चला कि राजू शंकर का एक जीजा है सत्यानारायण, जो समयपुर बादली में किसी बिस्किट फैक्ट्री में काम करता है. सत्यनरायण की बीवी का नाम खुशबू है. पुलिस को लाश के हाथ पर मिले टैटू एसके का मतलब अब समझ आ गया. एस यानी सत्यनारायण और के मतलब खुशबू.
सत्य नारायण और खुशबू ने प्रेम विवाह किया था, दोनों का एक साल का बेटा भी है. बिहार के आरा की रहने वाली खुशबू के घर पुलिस की टीम रवाना कर दी गई है. सत्यानारायण और राजू शंकर दोनों फरार हैं. अब जाहिर है जब तक खुशबू के घरवाले या दोनों फरार मिल नहीं जाते अर्थी को छोड़कर भाग जाने की पहेली का सच सामने नहीं आएगा. पर जब एक अर्थी से पुलिस अर्थी के घरवालों तक पहुंच गई है तो उम्मीद की जानी चाहिए कि इस अर्थी का पूरा सच भी जल्दी ही बेनकाब हो जाएगा.