Pakistani Spy Network Operated from PHC: ऑपरेशन सिंदूर के बाद देशभर के कई इलाकों से पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में करीब दर्जनभर से ज्यादा लोगों को गिरफ्तार किया गया है. खास बात ये है कि गिरफ्तार किए गए इन सभी आरोपियों के तार नई दिल्ली में मौजूद पाकिस्तानी हाई कमीशन से जाकर जुड़ रहे हैं. जहां इन सभी का कनेक्शन वीजा सेक्शन के साथ पाया गया है. अब सवाल ये है कि पाकिस्तानी उच्चायोग या हाई कमीशन के अंदर से जासूसी का ये पूरा खेल कैसे चल रहा था? तो चलिए जानते हैं इस जासूसी कांड की पूरी कहानी.
गजाला, यामीन और तारीफ. ये तीनों भारत के वो नागरिक हैं, जिन्हें पाकिस्तानी कनेक्शन के चलते गिरफ्तार किया जा चुका है. इन तीनों से पूछताछ में एक जैसी कहानी सामने आई है. और इन तीनों की कहानी जिस एक चीज से जाकर जुड़ती है, वो ये है नई दिल्ली में मौजूद पाकिस्तानी हाई कमिशन (Pakistani High Commission) यानि पाक उच्चायोग. पाकिस्तान के लिए हिंदुस्तानी जासूसी की कहानी उसी इमारत से शुरु होती है. इमारत यानि पाक उच्चायोग, जो 1950 में बना था. उससे पहले कुछ वक्त के लिए पाकिस्तानी उच्चायोग पुराना किला के करीब हुआ करता था. जहां इस वक्त दिल्ली हाईकोर्ट है.
कहते हैं कि बंटवारे के वक्त पाकिस्तान ने लाल किले में पाकिस्तान हाई कमिशन बनाने की मांग रखी थी. लेकिन भारत सरकार ने मना कर दिया था. एक वक्त था जब इस पाकिस्तानी उच्चायोग में 105 से ज्यादा लोगों का स्टाफ हुआ करता था. लेकिन इस वक्त यानि आज की तारीख में इस पाकिस्तानी उच्चायोग के अंदर सिर्फ 25 लोगों का स्टाफ हैं. 14 मई तक यहां 26 स्टाफ हुआ करता था. लेकिन जासूसी के इल्जाम में अहसान उर रहीम उर्फ दानिश को 14 मई को भारत छोड़ना पड़ा. लिहाजा, अब यहां सिर्फ 25 स्टाफ हैं.
जिस दानिश या अहसान उर रहीम का नाम बार-बार जासूसी के इस नए खुलासे के बाद सामने आ रहा है, वो इस पाकिस्तानी उच्चायोग में वीजा सेक्शन में तैनात था. अमूमन ज्यादातर देशों में जितने भी स्टाफ वीजा सेक्शन में तैनात किए जाते हैं, वो उस देश की खुफिया एजेंसी यानि इंटेलिजेंस के लोग होते हैं. सिर्फ पाकिस्तान नहीं ऐसा हर देश करता है. इसकी वजह वो वीजा सेक्शन ही है, जहां वीजा के लिए आवेदकों के इंटरव्यू के नाम पर उस देश के लोगों से सीधे मुलाकात और बात होती है. वीजा एप्लिकेशन फॉर्म में अमूमन आवेदकों के बारे में सारी जानकारी मौजूद होती है. वो कौन है, क्या करता है, पेशा क्या है, कहां का रहने वाला है. वगैरह-वगैरह. और बस इसी शुरुआती जानकारी के बाद वीजा सेक्शन में स्टाफ की भेष में बैठे इंटेलिजेंस के एजेंट अपना जाल बिछाना शुरु कर देते हैं.
अहसान उर रहीम उर्फ दानिश की तैनाती 2023 में पहली बार नई दिल्ली में मौजूद पाकिस्तानी उच्चायोग के वीजा सेक्शन में हुई थी. वीजा देने और वीजा के नाम पर इंटरव्यू लेने की आड़ में उसका असली काम उन सॉफ्ट टारगेट को पहचानना और फांसना था, जो या तो आम लोग थे. या फिर वो इंफ्लूएंसर थे, सोशल मीडिया पर जिनकी ठीक-ठाक मौजूदगी थी और जिनसे वक्त पड़ने पर कुछ खास जानकारी भी हासिल की जा सकती थी. दानिश को वीजा सेक्शन के अलावा पाकिस्तानी उच्चायोग में बतौर काउंसलर और कल्चरल स्टाफ की भी जिम्मेदारी दी गई थी. इस जिम्मेदारी के तहत उसके लिए सोशल मीडिया पर मौजूद इंफ्लूएंसर, जर्नलिस्ट और यूट्यूबर से मिलना मिलाना आसान हो गया था.
वो भारत पाकिस्तान के कल्चरल रिश्तों के नाम पर इंटरव्यू और पाकिस्तान के दौरे कराने का भी काम किया करता था. लेकिन दानिश नई दिल्ली के इस उच्चायोग में 2 साल भी पूरे नहीं कर पाया क्योंकि उससे पहले ही उसके चेहरे से जासूसी का मुखौटा उतार दिया गया और 13 मई को उसे भारत छोड़ने के लिए सिर्फ 24 घंटे की मोहलत दी गई. दानिश के चेहरे से जासूसी का ये मुखौटा कैसे हटा आइए अब इसकी कहानी जान लीजिए. इस कहानी की शुरुआत लगभग वैसे ही हुई जैसे गजाला, यामीन और तारिक ने बताया था.
अगर गजाला की बात की जाए तो उसे 8 मई को पंजाब के मलेर कोटला से गिरफ्तार किया गया था. गजाला के पति इमरान राणा की मौत 2020 में ही हो गई थी. गजाला ने पाकिस्तान जाने के लिए जब पहली बार पाकिस्तानी उच्चायोग में वीजा के लिए आवेदन दिया. तब वहां उसकी मुलाकात वीजा सेक्शन पर मौजूद उसी दानिश से हुई. इसके बाद दानिश ने शादी का झांसा देकर गजाला को पाकिस्तान का वीजा दिलवाया और फिर संदिग्ध क्यूआर कोड के जरिए उसे पैसे भेजने शुरु किए.
दानिश उन लोगों को भी जासूसी के धंधे में धकेलने का काम करता था, जो ग्रुप में धार्मिक यात्रा के लिए पाकिस्तान जाया करते थे. ज्योति मल्होत्रा को दानिश से जिस शख्स ने मिलाया था उसका नाम हरकीरत सिंह है. हरकीरत सिंह हर साल बैसाखी के मौके पर पाकिस्तान के ननकाना साहिब, करतारपुर साहिब, पंजा साहिब और लाहौर में मौजूद गुरुद्वारा डेरा साहिब में भारत से श्रद्धालुओं को भेजने का काम करता है. यही वजह है कि पाकिस्तानी उच्चायोग में उसकी ठीक ठाक जान पहचान भी है.
यानि कुल मिलाकर चाहे धार्मिक यात्रा हो या फिर पाकिस्तान जाने वाले आम भारतीय. उन्हें फांसने की शुरुआत नई दिल्ली में मौजूद इसी पाकिस्तानी हाई कमिशन यानि पाकिस्तानी उच्चायोग से शुरु होती है. अब चूकि इस उच्चायोग के अंदर पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी या पाकिस्तानी खुफिया ऑपरेटिव्स के एजेंट या जासूस डिप्लोमैट्स की हैसियत से मौजूद होते हैं, लिहाजा उन्हें गिरफ्तार भी नहीं किया जा सकता. बस उन्हें वापस पाकिस्तान ही भेजा जा सकता है. जैसे जासूसी का मुखौटा उतर जाने के बाद भी हमें दानिश को वापस पाकिस्तान भेजना पड़ा.
गजााला के बाद यामीन को पकड़ा गया. यामीन के तार भी सीधे दानिश और पाकिस्तानी उच्चायोग से ही जुड़ रहे थे. असल में यामीन की भी दानिश से पहली मुलाकात पाकिस्तानी उच्चायोग में ही हुई थी. यामीन भी पाकिस्तानी वीजा चाहता था. वीजा के लिए इंटरव्यू देने जब वो पाकिस्तानी उच्चायोग पहुंचा, तब वहां वीजा डेस्क पर इंटरव्यू के दौरान पहली बार दानिश से उसकी मुलाकात हुई. यामीन को तो दानिश का मोबाइल नंबर अब तक याद है.
यामीन को भी बड़ी आसानी से पाकिस्तान का वीजा मिल गया था. वो पहली बार 14 दिन के लिए पाकिस्तान भी हो आया. अब यामीन और दानिश की फोन पर बात भी होने लगी. बाद में यामीन ने अपने कुछ दोस्तों के लिए भी पाकिस्तानी वीजा की मांग की. दानिश ने यामीन के दोस्तों को भी वीजा दे दिया. साल 2024 में यामीन ने फिर अपने कुछ दोस्तों के लिए दानिश से पाकिस्तानी वीजा देने की सिफारिश की. पर पहली बार ऐसा हुआ जब यामीन के दोस्तों का वीजा दानिश ने रिजेक्ट कर दिया.
यानी अब दानिश ने पाकिस्तानी उच्चायोग में बैठकर वीजा के नाम पर रिश्वत लेना भी शुरु कर दिया था. दानिश के चेहरे से नकाब तब हटा जब 6-7 मई की रात पहलगाम हमले के बदले में ऑपरेशन सिंदूर शुरु हुआ. ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के पलटवार की आशंका थी, लिहाजा देश की सभी खुफिया एजेंसियां और पुलिस हाई अलर्ट पर थीं. दानिश और दानिश के संपर्क में आने वाले कुछ लोग जिनमें यूट्यूबर ज्योति मल्होत्रा और गजाला भी शामिल थी, उन पर कड़ी नजर रखी जाने लगी. पहली गिरफ्तारी गजाला की हुई. गजाला के बाद यामीन की.
इन दोनों के मोबाइल और दानिश के फोन से ही अब बाकी के नाम फोन के बाहर आने लगे. अब एक एक कर सभी की गिरफ्तारियां शुरु हो गई. गजाला, यामीन और ज्योति के अलावा शहजाद, फलक शेर मसीह, सूरज मसीह, सुखप्रीत सिंह, करणबीर सिंह, नोमान इलाही, देवेंद्र सिंह, अरमान और फिर मोहम्मद तारीफ.
तारीफ हरियाणा के नुंह का रहने वाला है. पाकिस्तानी उच्चायोग से शुरु होने वाले जासूसी के इस मकड़जाल में तारीफ इकलौता ऐसा शख्स है, जो दानिश के नहीं बल्कि वीजा सेक्शन में मौजूद एक दूसरे एजेंट या जासूस आसिफ बलोच के संपर्क में आया था. तारीफ को कुल तीन बार पाकिस्तान का वीजा मिला था और वो तीनों बार पाकिस्तान गया. लेकिन तारीफ को वीजा की कीमत आसिफ बलोच को दो सिम कार्ड देकर चुकानी पड़ी थी. बाद में आसिफ बलोच का भी पाकिस्तानी उच्चायोग से तबादला हो गया. उसकी जगह अब एक नया अफसर आया, जिसका नाम जाफर था. सिम के बाद अब तारीफ से पाकिस्तानी उच्चायोग में बैठे जासूसों ने पहली बार कुछ बड़ी मांग की. वो चाहते थे कि तारीफ सिरसा एयरबेस की तस्वीरें और कुछ जानकारी उन तक पहुंचाए.
(आज तक ब्यूरो)