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केरल के ज्यादातर जिलों में अब दिल्ली या मुंबई से ज्यादा फैल रहा कोरोना

भारत में पहला कोरोना केस 30 जनवरी को केरल में दर्ज हुआ था, जब चीन के वुहान से लौटे एक मेडिकल छात्र को पॉजिटिव पाया गया था. आज नौ महीने बाद केरल में कुल केसों की संख्या 2.9 लाख है, हालांकि, राज्य में मृत्यु दर काफी कम है.

केरल में भी कोरोना केस तेजी से बढ़ता जा रहा (फाइल-पीटीआई) केरल में भी कोरोना केस तेजी से बढ़ता जा रहा (फाइल-पीटीआई)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • नौ महीने बाद केरल में कुल केसों की संख्या 2.9 लाख
  • ज्यादा टेस्ट की वजह से टीपीआर 14 फीसदी तक बढ़ा
  • राज्य में कोरोना मृत्यु दर 0.35%, राष्ट्रीय औसत से कम

कुछ महीने पहले जब पूरे देश में कोरोना केस बढ़ रहे थे, तब वायरस को नियंत्रित करने के लिए "केरल मॉडल" की तारीफ हो रही थी. लेकिन कोरोना की दूसरी लहर ने सब कुछ बदल दिया. अब केरल कई पैमाने पर सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों की कतार में आ खड़ा हुआ है.

भारत में पहला कोरोना केस 30 जनवरी को केरल में दर्ज हुआ था, जब चीन के वुहान से लौटे एक मेडिकल छात्र को पॉजिटिव पाया गया था. आज नौ महीने बाद केरल में कुल केसों की संख्या 2.9 लाख है, हालांकि, राज्य में मृत्यु दर काफी कम है.

केरल में कोरोना से कुल 1,000 से कुछ ज्यादा मौतें हुई हैं. राज्य में कोरोना मृत्यु दर 0.35 फीसदी है जो कि 1.45 के राष्ट्रीय औसत से चार गुना कम है. लेकिन दैनिक केसों का ग्राफ जो लॉकडाउन के दौरान काफी हद तक नियंत्रित था, अब तेजी से ऊपर की ओर बढ़ रहा है. वास्तव में, केरल के ज्यादातर जिलों में अब प्रति मिलियन (10 लाख) जनसंख्या पर दिल्ली, मुंबई और पुणे की तुलना में ज्यादा केस दर्ज हो रहे हैं.
 
कितनी बड़ी है समस्या?
पिछले हफ्ते के दौरान केरल में दो दिन 10,000 से ज्यादा केस दर्ज किए गए. अगर ये रुझान जारी रहता है तो महाराष्ट्र और कर्नाटक के साथ केरल भी ऐसा राज्य होगा जहां हर दिन कोरोना केसों की संख्या पांच अंकों में होगी. आंध्र प्रदेश पिछले महीने हर दिन 10,000 से ज्यादा केस दर्ज कर रहा था, लेकिन अब वहां हालत में सुधार आया है और दैनिक केस आधे हो गए हैं.

केरल की आबादी महाराष्ट्र की एक तिहाई और कर्नाटक की करीब आधी है. इस लिहाज से राज्य में इतनी संख्या में दैनिक केस चिंता का विषय होने चाहिए. केरल का क्षेत्रफल अपेक्षाकृत छोटा है जो इसके जनसंख्या घनत्व को भी बढ़ाता है. वायरस के फैलने के लिए ये भी एक अहम वजह है. कर्नाटक और महाराष्ट्र का जनसंख्या घनत्व प्रति वर्ग किमी 318 और 365 है, जबकि केरल का जनसंख्या धनत्व प्रति वर्ग किलोमीटर 384 है.
 
केरल के जिला स्तर के आंकड़ों की पड़ताल करें तो पता चलता है कि राज्य की स्थिति और ज्यादा गंभीर है.

वास्तविक संख्या के लिहाज से देखें तो दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे घनी आबादी वाले शहर देश में कोरोना हॉटस्पॉट माने जा रहे हैं और वे अब भी बहुत ज्यादा संख्या में केस दर्ज कर रहे हैं. हालांकि, अगर हम दैनिक आधार पर संक्रमित होने वाली जनसंख्या के अनुपात की पड़ताल करें तो केरल खराब प्रदर्शन कर रहा है.

केरल के जिलों में दैनिक केस की कुल संख्या दिल्ली, मुंबई या पुणे की तुलना में कम है, लेकिन आबादी के अनुपात में ये संख्या इन महानगरों से ज्यादा है. जनसंख्या के लिहाज से, केरल के 14 में से 12 जिलों में दिल्ली, मुंबई या पुणे की तुलना में ज्यादा केस दर्ज हो रहे हैं.

 
औसतन दिल्ली में हर दिन 2,800, मुंबई में 2,300 और पुणे में 1,900 केस दर्ज हो रहे हैं. इसी तरह केरल के जिले मलप्पुरम में हर दिन 1,240 और कोझिकोड में 1,100 केस दर्ज हो रहे हैं. यह अंतर काफी बड़ा है क्योंकि इन तीन मेगा शहरों की आबादी पूरे केरल की आबादी के लगभग बराबर है.  

केरल के सिर्फ दो जिले बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं, एक वायनाड और दूसरा इडुक्की, जो कि मालाबार तट के पहाड़ी क्षेत्र हैं.

सोमवार, 12 अक्टूबर को प्रति मिलियन आबादी पर दैनिक नए केसों का सात-दिवसीय रोलिंग एवरेज पुणे में 202, मुंबई में 187 और दिल्ली में 167 रहा. उत्तरी केरल के जिले कोझिकोड में ये औसत 364 रहा. इसका मतलब है कि मुंबई की तुलना में कोझिकोड में वायरस का प्रसार करीब दोगुना ज्यादा रहा.  

प्रति मिलियन जनसंख्या पर दैनिक केस मलप्पुरम (303), कोल्लम (299), एर्नाकुलम (292) और राजधानी तिरुवनंतपुरम (291) में भी इन तीनों मेगा सिटीज के मुकाबले काफी ज्यादा रहे. वायनाड और ​इडुक्की में प्रति दस लाख की आबादी पर नए केसों की संख्या क्रमश: 177 और 107 रही.
 
कहां है गड़बड़ी?
लॉकडाउन के दौरान केरल ने वायरस को नियंत्रित कर लिया था. मई के पहले हफ्ते में पांच दिन यहां नए केसों की संख्या जीरो रही. लेकिन जैसे ही राज्य में लॉकडाउन खोला गया, संक्रमण बढ़ने लगा. सितंबर के पहले हफ्ते में ओणम त्योहार के बाद हालात बदलने लगे.

अगस्त के आखिरी हफ्ते तक केरल में हर दिन औसतन 2,200 नए केस दर्ज हो रहे थे, जो सितंबर के मध्य तक बढ़कर 3,000 हो गए. फिलहाल राज्य में हर दिन औसतन 9,000 से ज्यादा केस दर्ज हो रहे हैं.

हालांकि, ओणम के समारोह के दौरान मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने लोगों को कोरोना प्रोटोकॉल की अनदेखी करने के अंजाम के बारे में आगाह किया था. राज्य की स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा ने इंडिया टुडे टीवी पर स्वीकार किया कि त्योहार के दौरान लोगों ने कोरोना नियमों की अनदेखी की और एक-दूसरे के संपर्क में आए.

उन्होंने कहा, “हमने ‘चेन ब्रेक’ करने का एक पूरा अभियान चलाया, जिसमें लोगों को मास्क पहनने, दूरी बनाए रखने जैसे जरूरी सुरक्षा उपायों के बारे में जागरूक किया. ओणम उत्सव  के दौरान कुछ लोगों ने नियमों का पालन नहीं किया. कई जगह भीड़ इकट्ठा हुई.”
 
इसके अलावा, केरल में खाड़ी देशों से लौटने वाले प्रवासियों की संख्या भी काफी ज्यादा रही. तेजी से केस बढ़ने की ये भी एक वजह मानी जा रही है.

पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया में महामारी विज्ञान के प्रोफेसर गिरिधर आर बाबू का कहना है, “जब संक्रमित लोगों की आवाजाही एक जगह से दूसरी जगह होती है तो कोई भी देश या राज्य संक्रमण से बचा नहीं रह सकता.”

केके शैलजा ने ये भी कहा कि प्रतिबंधों में ढील के बाद कुल 9 लाख प्रवासी विदेश और देश के अन्य राज्यों से अपने घर लौटे. करीब 3 लाख केस के साथ केरल में मृत्यु दर काफी कम है. ये समय पर टेस्ट, इलाज और आइसोलेशन के प्रभाव के बारे में बताता है.
 
आंकड़ों से पता चलता है कि केरल में अगस्त के अंत तक टेस्ट पॉजिटिविटी रेट (टीपीआर) 6 फीसदी था जो कि ओणम के बाद तेजी से बढ़ा. ज्यादा टेस्ट की वजह से टीपीआर 14 फीसदी तक बढ़ गया है. विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, अगर टीपीआर काफी समय तक 5 फीसदी से नीचे रहे तो समझना चाहिए कि महामारी नियंत्रण में है.

 

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