इन दिनों वेब सीरीज 'Made in India: A Titan Story' की खूब चर्चा हो रही है, इस सीरीज में जेआरडी टाटा के किरदार में नसीरुद्दीन शाह और जेरक्सेस देसाई के रोल में जिम सर्भ (Jim Sarbh) ने गजब छाप छोड़ी है. अस्सी दशक की इस जोड़ी को खूब याद किया जा रहा है. एक सपना, एक सोच को जेरक्सेस देसाई ने JRD टाटा की मदद से साकार करके दिखाया था.
दरअसल, देश में टाइटन घड़ी की कैसे शुरुआत हुई और कैसे कामयाबी की सीढ़ी चढ़ी, आज हर कोई जानना चाहता है. टाइटन घड़ी की शुरुआत भारतीय कॉर्पोरेट इतिहास की सबसे रोमांचक कहानियों में से एक है. यह कहानी सिर्फ एक प्रोडक्ट की नहीं, बल्कि एक सरकारी एकाधिकार को चुनौती देकर अपना कब्जा जमाना था.
(Photo: ITG)
शुरुआत किसने की?
टाइटन की शुरुआत के पीछे मुख्य रूप से दो लोगों का दिमाग और विजन था, पहला- जेआरडी टाटा, जो टाटा ग्रुप के तत्कालीन चेयरमैन थे, जिन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाने में सहयोग दिया. दूसरा- जेरक्सेस देसाई, जो टाटा प्रेस के पूर्व प्रमुख और टाइटन के संस्थापक प्रबंध निदेशक थे. इन्हें ही असल मायने में टाइटन का जनक माना जाता है. वेब सीरीज में इनके किरदार और संघर्ष को बहुत ही गहराई से दिखाया गया है.
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लाइसेंस राज और HMT का दौर
1970 और 80 के दशक में भारत में घड़ियों के बाजार पर सरकारी कंपनी HMT का एकछत्र राज था. उस समय चाबी वाली घड़ियां चलती थीं. अगर किसी को शादी के लिए या किसी खास मौके के लिए HMT की घड़ी चाहिए होती थी, तो महीनों पहले बुकिंग करानी पड़ती थी.
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जब घड़ी बनाने का आया आइडिया
जेरक्सेस देसाई ने महसूस किया कि दुनिया मैकेनिकल घड़ियों से आगे बढ़कर क्वाटर्ज यानी बैटरी से चलने वाली इलेक्ट्रॉनिक घड़ियों की तरफ जा रही है, लेकिन भारत में इसका फिलहाल कोई विकल्प नहीं हैं. उन्होंने जेआरडी टाटा के सामने टाटा ग्रुप की खुद की घड़ी कंपनी शुरू करने का प्रस्ताव रखा.
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सरकारी रुकावटें और अनोखा रास्ता
उस दौर में निजी कंपनियों को घड़ी बनाने का आसानी से लाइसेंस नहीं मिलता था. लगातार तीन बार टाटा के प्रस्ताव को खारिज कर दिया गया. तब देसाई ने एक मास्टरस्ट्रोक खेला, उन्होंने तमिलनाडु सरकार की संस्था TIDCO (तमिलनाडु इंडस्ट्रियल डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन) के साथ हाथ मिलाया. इस तरह 1984 में एक जॉइंट वेंचर के रूप में 'टाटा एलायंस' बना, जिसे बाद में Titan नाम दिया गया. इसकी पहली फैक्ट्री तमिलनाडु के होसुर में लगाई गई.
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टाइटन कंपनी की शुरुआत 26 करोड़ रुपये के कुल निवेश के साथ हुई थी. 1980 के दशक के लिहाज से 26 करोड़ एक बहुत बड़ा निवेश माना जाता था, और इसी शुरुआती पूंजी के दम पर टाइटन ने सरकारी कंपनी HMT को टक्कर देकर भारतीय बाजार में अपनी मजबूत नींव रखी थी. सीरीज में दिखाया गया है कि कैसे शुरुआती दिनों में होसुर की फैक्ट्री लगाने के लिए देसाई को नौकरशाही और विदेशी टेक्नोलॉजी पार्टनर्स के साथ लड़ना पड़ा था.
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पहली घड़ी से ही बाजार में धूम
साल 1987 में मेहनत रंग लाई, टाइटन की पहली घड़ी लॉन्च हुई. स्लिम डिजाइन, बेहतरीन डायल और शानदार पैकेजिंग ने भारतीयों का दिल जीत लिया. उस जमाने में घड़ियां तंग और अंधेरी दुकानों में मिलती थीं. टाइटन ने पहली बार भारत में चमचमाते हुए 'एक्सक्लूसिव शोरूम' की शुरुआत की, जहां लोग घड़ियों को छूकर, महसूस करके खरीद सकते थे.
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घड़ी को गहना बनाया
टाइटन ने घड़ियों को सिर्फ समय देखने का जरिया नहीं, बल्कि एक स्टाइल स्टेटमेंट और भारतीय संस्कृति का हिस्सा बना दिया. टाइटन ने विज्ञापन की दुनिया को भी बदला. उनकी आइकॉनिक धुन आज भी हर भारतीय के जहन में बसी है. जेरक्सेस देसाई ने 'Titan Raga' जैसे सब-ब्रांड्स लॉन्च कर घड़ियों को महिलाओं के लिए एक आभूषण की तरह पेश किया. (Photo: Getty)
फिर आया तनिष्ष्क का आइडिया
सीरीज का एक बड़ा हिस्सा टाइटन के ज्वेलरी बिजनेस (Tanishq) में कदम रखने पर भी है. शुरुआत में तनिष्ष्क बुरी तरह फ्लॉप हुआ था और कंपनी बंद होने की कगार पर थी. सीरीज दिखाती है कि कैसे देसाई और उनकी टीम ने हार नहीं मानी और 22 कैरेट के शुद्ध सोने का पैमाना लाकर भारतीय ज्वेलरी मार्केट को हमेशा के लिए बदल दिया.
सपना साकार हुआ
टाइटन की शुरुआत सिर्फ एक घड़ी बेचने के लिए नहीं हुई थी, बल्कि भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को दुनिया के सामने साबित करने के लिए हुई थी. आज टाइटन कंपनी एक साधारण घड़ी बनाने वाली कंपनी से बदलकर एक विशाल बिजनेस साम्राज्य बन गई है, और यह टाटा ग्रुप की दूसरी सबसे मूल्यवान कंपनी बनकर खड़ी है. टाइटन का मार्केट कैप 3.61 लाख करोड़ रुपये है.
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