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सपनों का घर या जिंदगी भर का कर्ज, खरीदने से पहले जान लें बिल्डर्स का ये खेल!

एक्सपर्ट की सलाह है कि घर तब न खरीदें जब समाज कहे, बल्कि तब खरीदें जब आपकी आर्थिक क्षमता हो. एक निश्चित उम्र और पर्याप्त बचत के बाद घर लेना एक बेहतर निर्णय हो सकता है.

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घर खरीदने से पहने जान लीजिए हकीकत
घर खरीदने से पहने जान लीजिए हकीकत

क्या अपना घर वाकई कामयाबी की निशानी है या सिर्फ एक सामाजिक बोझ? भारत में 'किराये का मकान' आज भी एक हीन भावना से जुड़ा शब्द है, जहां अपनी छत को शादी और भविष्य की सुरक्षा की पहली शर्त माना जाता है. आजतक रेडियो के कार्यक्रम प्रॉपर्टी से फायदा में एक्सपर्ट ने इसी 'इमोशनल बाइंग' की कड़वी सच्चाई को उजागर किया है और बताया है कि कैसे बिल्डर्स और मार्केटिंग एजेंसियां आपकी भावनाओं का फायदा उठाकर आपको कर्ज के जाल में धकेलती हैं.

घर खरीदने का फैसला अक्सर आर्थिक गणना (Financial Calculation) के बजाय सामाजिक दबाव में लिया जाता है. बिल्डर्स जानते हैं कि भारतीय मध्यम वर्ग के लिए 'घर' एक भावनात्मक उपलब्धि है. वे अपनी मार्केटिंग रणनीतियों में "सपनों का घर", "पीढ़ियों की विरासत" और "सुरक्षित भविष्य" जैसे शब्दों का इस्तेमाल करते हैं. रियल एस्टेट एक्सपर्ट रवि सिन्हा ने चेतावनी दी कि इमोशन अच्छी चीज है, लेकिन उधार लेकर इमोशन पूरे करना खतरनाक है.' 

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घर खरीदने से पहले जान लें जरूरी बातें

रवि सिन्हा आगे कहते हैं- ' बिल्डर्स अक्सर ऐसे प्रोजेक्ट्स बेचते हैं जो 'अनरियल' होते हैं. वे जिम, क्लब हाउस और शानदार लाइफस्टाइल का वादा करते हैं, लेकिन असल में कई बार पजेशन में दशकों की देरी हो जाती है. खरीदार अपनी पूरी जमा-पूंजी और सेविंग्स एक ऐसे घर के लिए दांव पर लगा देता है, जिसकी कानूनी स्थिति या भविष्य स्पष्ट नहीं होता. कई बार लोग सिर्फ इसलिए घर खरीदते हैं ताकि वे समाज में कह सकें कि वे "फोर बीएचके" या "मेंशन" के मालिक हैं.

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एसेट या लायबिलिटी? वित्तीय साक्षरता की कमी

एक्सपर्ट्स का मानना है कि फाइनेंशियल एजुकेशन की कमी के कारण लोग यह नहीं समझ पाते कि जो चीज आपकी जेब से हर महीने पैसे निकाल रही है. वह एसेट नहीं बल्कि लायबिलिटी है. अगर आपने सवा करोड़ का घर खरीदा है और संकट के समय आप उसे 80 लाख में भी नहीं बेच पा रहे, तो वह निवेश पूरी तरह विफल है.

किराया बनाम ईएमआई (Rent vs EMI)

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि "किराया भरने से अच्छा है ईएमआई भरो", लेकिन यह अधूरा सच है, जब आप घर खरीदते हैं, तो आप अपनी नेटवर्थ नहीं बल्कि डेटवर्थ (Debt Worth) बढ़ा रहे होते हैं. यदि इस दौरान नौकरी चली जाए या आय का स्रोत बंद हो जाए, तो वह 'सपनों का घर' एक मानसिक और आर्थिक बोझ बन जाता है. 

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