भारतीय करेंसी रुपया के टूटने का सिलसिला लगातार जारी है और अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ये शुक्रवार को पहली बार फिसलते हुए 96 के पार निकल गया. करेंसी मार्केट में कारोबार के दौरान रुपया कमजोर होकर 96.14 पर आ गया, जो इसका नया लाइफ टाइम लो-लेवल है. इससे पहले बीते कारोबारी दिन ये 95.95 के लेवल पर पहुंचा था. Indian Currency के टूटने के पीछे कई बड़े कारण हैं, जिनमें सबसे बड़ा मिडिल ईस्ट टेंशन के चलते कच्चे तेल की कीमतों में आया उछाल है. करेंसी में गिरावट इकोनॉमी पर कई तरीके से प्रभाव डालती है और सीधा असर आम आदमी पर देखने को मिलता है.
तेल की कीमतों में लगी है आग
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का सिलसिला जारी है. Brent Crude Oil Price पर नजर डालें, तो ये खबर लिखे जाने तक 3.11 फीसदी की तेजी के साथ 109 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रही थी. इसके अलााव WTI Crude Price भी करीब 4 फीसदी उछलकर 105 डॉलर पर पहुंच गया था. मिडिल ईस्ट में तनाव और होर्मुज स्ट्रेट को लेकर अमेरिका-ईरान में तनातनी जारी रहने के चलते क्रूड प्राइस भी थमने का नाम नहीं ले रहा है. इससे भारतीय करेंसी पर दबाव भी लगातार बना हुआ है.
रुपया टूटने से ये बड़ी टेंशन
कच्चे तेल की कीमतों में इजाफा और होर्मुज स्ट्रेट में तनाव से सप्लाई नेटवर्क पर असर के कारण भारत के आयात बिल को लेकर चिंताएं बढ़ गई हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि देश की कुल तेल जरूरतों का 85% से ज्यादा आयात किया जाता है. आयात पर ये निर्भरता भारतीय करेंसी पर दबाव बढ़ाती है. रुपये के कमजोर होने से आयात भी महंगा हो जाता है, क्योंकि कच्चे तेल की खरीद ग्लोबल स्तर पर अमेरिकी डॉलर में ही होती है. मतलब रुपया कमजोर होने की स्थिति में ज्यादा डॉलर खर्च होते हैं.
बड़ा संकट... ये सामान हो सकते हैं महंगे
तेल आयात महंगा होने पर महंगाई का जोखिम बढ़ जाता है और इसका असर सीधे देश की इकोनॉमी पर दबाव के रूप में देखने को मिलता है. बीते कुछ समय में रुपया टूटने के पीछे के बड़े कारणों पर गौर करें, तो कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, विदेशी निवेशकों की तगड़ा बिकवाली के साथ ही अमेरिका-ईरान युद्ध से जुड़ी अनिश्चितता सबसे बड़े कारण रहे.
स्वास्तिका इन्वेस्टमार्ट लिमिटेड के सीनियर एनालिस्ट प्रवेश गौर का कहना है कि डॉलर के मुकाबले रुपया के 96 पार पहुंचना बढ़ती वैश्विक अनिश्चितता और डॉलर की डिमांड को दिखाता है. उनका कहा है कि रुपये की कमजोरी से भारत में महंगाई का दबाव बढ़ता है, क्योंकि ईंधन, इलेक्ट्रॉनिक्स और इंडस्ट्रियल कच्चे माल जैसे आयात महंगे हो जाते हैं.