आर्थिक थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) ने भारत को हरित क्रांति 2.O लाने का सुझाव दिया है. GTRI का कहना है कि भारत को दलहन और तिलहन जैसी कम पानी वाली फसलों की खेती को बढ़ावा देने की जरुरत है. इससे पानी की मांग में काफी कमी आ सकती है और सरकार इन फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की गारंटी दे सकती है. इसमें कहा गया है कि पानी के इस्तेमाल की क्षमता में सुधार के लिए ड्रिप सिंचाई, लेजर भूमि समतलन, कम पानी के इस्तेमाल वाली तकनीकों की ट्रेनिंग देकर किसानों को खेती में कम पानी के उपयोग से जुड़े तरीकों को अपनाने के बारे में जागरूक करना चाहिए.
कृषि के लिए मुफ्त बिजली खत्म करने की सलाह
कृषि के लिए मुफ्त बिजली को खत्म करने और वाटर प्राइस मैकेनिज्म सिस्टम शुरू करने का भी सुझाव दिया गया है. इससे पानी के जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल पर रोक लग सकेगी. वहीं ये पानी बचाने के लिए भी किसानों को प्रोत्साहित करेगा. इसके अलावा किसानों को उन तरीकों से भी दूर करने के लिए शिक्षित किया जा सकेगा जो लॉन्ग टर्म में खेती के लिए नुकसानदायक साबित हो सकते हैं.
दरअसल, किसानों के विरोध प्रदर्शनों के बीच GTRI की ये सिफारिशें काफी महत्वपूर्ण हैं. किसानों की डिमांड है कि उन्हें फसलों के लिए न्यूनतम MSP की कानूनी गारंटी मिले और कृषि कर्ज को माफ किया जाए. GTRI का कहना है कि चावल और गेहूं पर MSP और मुफ्त बिजली ने ज्यादा पानी के इस्तेमाल से की जाने वाली धान की खेती को सस्ता बना दिया है. लेकिन इससे बारिश या नहर के पानी पर निर्भर और पर्यावरण के अनुकूल माने जाने वाले प्राकृतिक तौर पर उगाए जाने वाले धान को नुकसान पहुंचा है.
GTRI के संस्थापक अजय श्रीवास्तव के मुताबिक हमें हरित क्रांति 2.0 लाने की जरूरत है, जो अनिवार्य रूप से हरित क्रांति 1.0 से पहले मौजूद फसल मिश्रण को बहाल करेगी. हमारे पास इसके अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है.
धान और गेहूं के नाम अधिकतम MSP
धान और गेहूं की कुल MSP खरीद में 90-95 फीसदी हिस्सेदारी है. धान की अधिकतम खरीद पंजाब और हरियाणा जैसे राज्यों में की जाती है. धान की फसल पर भारी मात्रा में जल का इस्तेमाल होता है जो मक्का या दालों जैसी वैकल्पिक फसलों के मुकाबले 2-3 गुना ज्यादा पानी की खपत करती है. पंजाब में धान के प्रति किलो में लगभग 800-1,200 लीटर पानी की खपत होती है.
धान की खेती में भूजल निकासी का 70 फीसदी से ज्यादा हिस्सा होता है. पंजाब का 90 प्रतिशत से ज्यादा कृषि जल ट्यूबवेलों से आता है और हाल के दशकों में यहां पर सक्रिय कुओं की संख्या में तेज बढ़ोतरी हुई है. GTRI का कहना है कि आम तौर पर पंजाब को ज्यादा पानी का इस्तेमाल करने वाली धान को नहीं उगाना चाहिए, क्योंकि इसके असर से पंजाब में हर साल जल स्तर 0.4 मीटर के खतरनाक रेट से गिर रहा है. वहीं कुछ क्षेत्रों में तो ये सालाना 1 मीटर तक नीचे जा रहा है.