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Exclusive: नीतीश सरकार में 'सड़क क्रांति' के दावों की हकीकत... करोड़ों खर्च पर सालों से अधूरे पड़े प्रोजेक्ट

बिहार में ऐसी कई महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाएं हैं जो सालों से अधूरी पड़ी हैं. डेडलाइन बार-बार बदली गई, लागत कई गुना बढ़ गई, लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं हुई. आजतक ने ऐसी ही तमाम परियोजनाओं पर दस्तक दी है, जो सरकारी सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही के कारण 'सफेद हाथी' बन चुकी हैं.

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इन अधूरे प्रोजेक्ट्स के लिए पथ निर्माण मंत्रालय संभाल चुके कई नामों पर सवाल उठ रहे हैं. (Photo- ITG)
इन अधूरे प्रोजेक्ट्स के लिए पथ निर्माण मंत्रालय संभाल चुके कई नामों पर सवाल उठ रहे हैं. (Photo- ITG)

बिहार की नीतीश सरकार अक्सर राज्य में 'सड़क क्रांति' का ढिंढोरा पीटती है. नए हाईवे, फोरलेन-छह लेन सड़कों और एलिवेटेड कॉरिडोर की तस्वीरें सरकारी प्रचार में लगातार दिखाई जाती हैं. लेकिन दावों के इस शोर के पीछे एक कड़वी सच्चाई भी छिपी है. बिहार में ऐसी कई महत्वाकांक्षी सड़क परियोजनाएं हैं जो सालों से अधूरी पड़ी हैं. डेडलाइन बार-बार बदली गई, लागत कई गुना बढ़ गई, लेकिन जिम्मेदारी तय नहीं हुई. 

आजतक ने ऐसी ही तमाम परियोजनाओं पर दस्तक दी है, जो सरकारी सिस्टम की सुस्ती और लापरवाही के कारण 'सफेद हाथी' बन चुकी हैं. इन परियोजनाओं को पूरा करने के लिए जो लागत तय हुई थी, देरी के चलते वह दो गुना और उससे भी अधिक हो गई है. नतीजा यह है कि टैक्सपेयर्स का पैसा खर्च होता रहा और आम जनता अधूरी सड़कों, जाम और धूल-कीचड़ में फंसी रही.

बख्तियारपुर-ताजपुर फोरलेन रोड इसका सबसे बड़ा उदाहरण है. पटना जिले के बख्तियारपुर को समस्तीपुर के ताजपुर से जोड़ने वाला यह प्रोजेक्ट नवंबर 2011 में शुरू हुआ था. कुल लंबाई 51.26 किलोमीटर है और इसे 2016 तक पूरा किया जाना था. शुरुआती लागत करीब 1603 करोड़ रुपये तय हुई थी. लेकिन जमीन अधिग्रहण और गंगा नदी पर पुल निर्माण जैसे मुद्दों पर काम समय पर आगे नहीं बढ़ा. 

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नतीजा यह हुआ कि 15 साल बीतने के बाद भी महज 65 प्रतिशत काम पूरा हो पाया है. अब इसकी लागत बढ़कर करीब 3923 करोड़ रुपये तक पहुंच चुकी है और नई डेडलाइन 2027 बताई जा रही है. सवाल यह है कि जब जमीन अधिग्रहण जैसी बुनियादी प्रक्रियाएं पहले पूरी नहीं थीं, तो प्रोजेक्ट शुरू ही क्यों किया गया?

पटना साहिब-पटना घाट रोड में भी देरी

इसी तरह पटना साहिब-पटना घाट रोड प्रोजेक्ट भी सरकारी दावों और जमीनी हकीकत के फर्क को उजागर करता है. महज 1.5 किलोमीटर लंबा यह एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट पिछले साल शुरू हुआ था. इसकी लागत 52.54 करोड़ रुपये तय की गई और लक्ष्य था कि एक साल में काम पूरा कर लिया जाएगा. लेकिन अब डेडलाइन खत्म होने में कुछ ही हफ्ते बचे हैं और सिर्फ 35 फीसदी काम पूरा हुआ है. नई समय-सीमा 2027 बताई जा रही है. हैरानी की बात यह है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद इस प्रोजेक्ट की मॉनिटरिंग कर चुके हैं, इसके बावजूद रफ्तार नहीं बढ़ सकी.

छपरा डबल डेकर फ्लाईओवर के पूरा होने का इंतजार

छपरा डबल डेकर फ्लाईओवर की कहानी भी कुछ अलग नहीं है. 11 जुलाई 2018 को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इसकी आधारशिला रखते हुए दावा किया था कि इससे शहर को जाम से बड़ी राहत मिलेगी और यह देश का सबसे लंबा डबल डेकर फ्लाईओवर होगा. 6.62 किलोमीटर लंबी इस एलिवेटेड रोड की लागत 411 करोड़ रुपये तय हुई थी और डेडलाइन जून 2022 रखी गई थी. लेकिन 2025 आते-आते भी प्रोजेक्ट का सिर्फ 60 प्रतिशत काम ही पूरा हो पाया है. अब इसे 2027 तक पूरा करने की बात कही जा रही है. इस देरी का सीधा असर स्थानीय लोगों पर पड़ रहा है, जिन्हें रोजाना जाम और अधूरे निर्माण से जूझना पड़ता है.

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सिर्फ राज्य के भीतर ही नहीं, बिहार से जुड़े राष्ट्रीय महत्व के प्रोजेक्ट भी देरी की मार झेल रहे हैं. दिल्ली-जयपुर हाईवे को छह लेन करने का ऐलान 2009 में हुआ था. 16 साल बाद भी यह काम पूरा नहीं हो सका. यानी योजनाएं कागजों पर तो बन जाती हैं, टेंडर भी जारी हो जाते हैं, लेकिन जरूरी मंजूरियां और तैयारियां पूरी किए बिना काम शुरू कर दिया जाता है.

परियोजनाओं में देरी से किसका फायदा, किसका नुकसान?

विशेषज्ञों का कहना है कि प्रोजेक्ट में देरी से सबसे बड़ा फायदा ठेका लेने वाली कंपनियों को होता है. समय बढ़ने के साथ लागत बढ़ती है, अतिरिक्त भुगतान होता है और सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता है. नुकसान अंततः जनता को उठाना पड़ता है, जो टैक्स देकर इन परियोजनाओं को फंड करती है.

इन अधूरे सड़क प्रोजेक्ट्स के लिए पथ निर्माण मंत्रालय संभाल चुके कई नामों पर सवाल उठ रहे हैं, जिनमें नंदकिशोर यादव, तेजस्वी यादव और नितिन नवीन जैसे पूर्व मंत्री शामिल हैं. मौजूदा पथ निर्माण मंत्री दिलीप जायसवाल का दावा है कि सरकार अब डेडलाइन पर काम पूरा कराने को प्राथमिकता दे रही है और लापरवाही बरतने वालों पर कार्रवाई की जा रही है. कुछ अधिकारियों को निलंबित करने के उदाहरण भी गिनाए जा रहे हैं.

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लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बिहार में सड़क निर्माण की तस्वीर अभी भी अधूरी है. डेडलाइन पर डेडलाइन बदलती जा रही है, लागत बढ़ती जा रही है और जवाबदेही तय नहीं हो पा रही. सड़क क्रांति के नारों के बीच सवाल यही है कि क्या सरकार समयबद्ध, पारदर्शी और जवाबदेह सिस्टम बना पाएगी, या फिर बिहार की सड़कों की यह कहानी यूं ही अटकी और लटकी रहेगी.

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