मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा चुने जाने औऱ विधान परिषद से इस्तीफा दिए जाने के बाद बिहार में सत्ता परिवर्तन तय हो गया है. नीतीश कुमार राज्यसभा की शपथ लेते ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ सकते हैं. नीतीश के बिहार से दिल्ली के सियासी सफर पर निकलने के साथ ही जेडीयू नेताओं में खलबली मच गई है, जेडीयू के बाहुबली विधायक अनंत सिंह ने राजनीति छोड़ने का ऐलान कर दिया तो दूसरे बाहबुली नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन सिंह बेचैन हैं.
नीतीश कुमार के दिल्ली जाने की बात के सियासी कदम को आनंद मोहन बिहार की जनता के साथ 'विश्वासघात' जैसा बता रहे हैं. मुजफ्फरनगर में आनंद मोहन ने कहा कि नीतीश कुमार को बिहार की जनता ने 2030 तक का जनादेश दिया था. ऐसे में उनका बीच कार्यकाल में बिहार से दिल्ली जाना समझ से परे हैं.
आनंद ने गुरुवार को पहली बार अपनी बेचैनी बयां नहीं की है बल्कि तीसरी बार उन्होंने यह बात कही है. इतना ही नहीं बिहार में बीजेपी का मुख्यमंत्री बनाना भी उन्हें रास नहीं आ रहा है. उन्होंने कहा कि बीजेपी मुख्यमंत्री के लिए पर्ची निकालती है, बिहार में देखिए किसके नाम की पर्ची निकलती है? ऐसे में सवाल उठता है कि आनंद मोहन क्यों बेचैन हैं?
बीजेपी के CM बनाने पर आनंद मोहन उठा रहे सवाल?
बिहार के सियासी इतिहास में पहली बार बीजेपी का मुख्यमंत्री बनने जा रहा है. नीतीश कुमार के इस्तीफा दिए जाने के बाद बीजेपी विधायक दल के नेता का चुनाव करेगी. मुख्यमंत्री के चुनाव में नीतीश कुमार की पसंद का भी ख्याल रखा जाएगा, यह बात बीजेपी और जेडीयू दोनों ही पार्टी की तरफ से कहा जा रहा है. हालांकि, जेडीयू के कुछ नेताओं को नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़ना और बीजेपी का सीएम बनाए जाना रास नहीं आ रहा है.
जेडीयू के दिग्गज नेता और पूर्व सांसद आनंद मोहन ने कहा कि नीतीश कुमार को 2030 तक के लिए जनादेश मिला था, लेकिन बीच कार्यकाल में उन्हें छोड़कर नहीं जाना चाहिए. बीजेपी में पर्ची से मुख्यमंत्री का फैसला होता है, हमारे और आपके सोचने से कुछ नहीं होने वाला, लेकिन बिहार की जनता ने नीतीश कुमार के नाम पर विश्वास जताया था. उन्होंने कहा, 'जिन मंत्रणाकारों ने अगर ये दबाव में फैसला किया तो वो जेडीयू के लिए नुकसानदेह है.
आनंद मोहन ने कहा कि भविष्य में सबसे बड़ा नुकसान बीजेपी को करेगा, क्योंकि जो पिछड़ा, अतिपिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक है, वो स्वभाविक वोट बीजेपी का नहीं है, माध्यम नीतीश कुमार के मिलता रहा है. ऐसे में नुकसान हो सकता है और इस पर गंभीरता से विचार करनी चाहिए. साथ ही लव-कुश वोटों के गणित के भी बिगड़ने की चिंता आनंद मोहन जाहिर कर रहे हैं. नीतीश के हटने से जो राजनीतिक शून्य पैदा होगा, उसका सीधा फायदा विपक्ष को बैठे-बिठाए मिल सकता है.
नीतीश के दिल्ली जाने से आनंद मोहन क्यों बेचैन हैं?
बाहुबली आनंद मोहन के नीतीश कुमार के साथ सियासी केमिस्ट्री किसी से भी छिपी नहीं है. आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद जेडीयू से सांसद हैं और बेटे चेतन आनंद जेडीयू से विधायक हैं. नीतीश कुमार के बिहार के सीएम पद छोड़कर दिल्ली की राजनीति करने का सीधा मतलब है कि बिहार में सत्ता का समीकरण बदल जाएगा, जिससे आनंद मोहन जैसे क्षत्रपों का राजनीतिक प्रभाव और उनके परिवार का भविष्य अनिश्चित पैदा हो सकती है.
बिहार में बीजेपी का सियासी प्रभुत्व बढ़ने से क्षेत्रीय नेताओं की सियासी अहमियत कम हो जाएगी. आनंद मोहन को डर सता रहा है कि नीतीश कुमार के दिल्ली जाने से उनकी राजनीति कमजोर पड़ सकती है, क्योंकि उनके रिश्ते नीतीश कुमार के साथ ही रहे हैं. आनंद मोहन के जेल में रहते हुए जरूर उनका परिवार आरजेडी के साथ चला गया था, लेकिन जैसे ही वो बाहर निकले फिर से जेडीयू का दामन थाम लिया.
जेडीयू ने भी आनंद मोहन को राजनीतिक रूप से काफी अहमियत देने का काम किया है, लेकिन बीजेपी वैसी तवज्जे नहीं कभी नहीं दी. बीजेपी भले ही सवर्ण जाति की राजनीति करती रही हो, लेकिन आनंद मोहन को गले नहीं लगाया. ऐसे में आनंद मोहन को नीतीश के बिहार से दिल्ली जाने और बीजेपी के सीएम बनाने की बात से बेचैनी बढ़ गई है. इसीलिए आनंद मोहन ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार को सीधे मुख्यमंत्री बना देने की बात कह दी थी, क्योंकि निशांत के रहते हुए भी अपनी राजनीति को बचाए रख सकते हैं.