बिहार में 18 जून को होने वाले विधान परिषद (एमएलसी) चुनाव से पहले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के भीतर राजनीतिक चर्चाएं तेज हो गई हैं. खासकर मंत्री दीपक प्रकाश के भविष्य और वरिष्ठ नेता उपेंद्र कुशवाहा की स्थिति को लेकर सियासी अटकलों का दौर शुरू हो गया है.
विधान परिषद की कुल 10 सीटों पर चुनाव होना है. बिहार विधानसभा में मौजूदा संख्या बल को देखते हुए एनडीए के 10 में से 9 सीटें जीतने की स्थिति में होने का अनुमान है. ऐसे में टिकटों के बंटवारे को लेकर राजनीतिक महत्व काफी बढ़ गया है.
भारतीय जनता पार्टी ने चार उम्मीदवारों के नाम घोषित किए हैं, जबकि जनता दल (यूनाइटेड) ने भी चार प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है. वहीं लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को एक सीट मिली है. उम्मीदवारों की सूची जारी होने के बाद सबसे ज्यादा चर्चा उस नाम को लेकर हो रही है, जो सूची में शामिल नहीं है दीपक प्रकाश.
दीपक प्रकाश वर्तमान में बिहार सरकार में मंत्री हैं. संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार यदि कोई मंत्री विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य नहीं है, तो उसे छह महीने के भीतर किसी एक सदन का सदस्य बनना अनिवार्य होता है. यदि दीपक प्रकाश को विधान परिषद नहीं भेजा जाता है, तो उन्हें मंत्री पद छोड़ना पड़ सकता है. इसी वजह से एनडीए के भीतर उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं.
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि जब भाजपा ने पहले उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजा था, तब यह माना गया था कि भविष्य में उनकी पार्टी का भाजपा में विलय हो सकता है. बताया जा रहा है कि इसी राजनीतिक समझ के तहत दीपक प्रकाश को विधान परिषद भेजे जाने की संभावना जताई जा रही थी.
हालांकि अब ऐसी चर्चाएं हैं कि उपेंद्र कुशवाहा कथित तौर पर विलय की योजना से पीछे हट गए हैं. राजनीतिक सूत्रों का दावा है कि यही वजह हो सकती है कि दीपक प्रकाश को एमएलसी चुनाव के लिए उम्मीदवार नहीं बनाया गया. हालांकि भाजपा और कुशवाहा की पार्टी की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह घटनाक्रम एनडीए के भीतर बदलते शक्ति संतुलन की ओर इशारा करता है. चिराग पासवान की बढ़ती राजनीतिक ताकत और भाजपा की नई सामाजिक-राजनीतिक रणनीति को भी इस पूरे घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है.
गौरतलब है कि जब भाजपा ने पहले पवन सिंह की बजाय उपेंद्र कुशवाहा को राज्यसभा भेजने का फैसला किया था, तब इसे एनडीए में कुशवाहा के प्रभाव का बड़ा संकेत माना गया था. लेकिन बिहार की राजनीति में समीकरण तेजी से बदलते हैं.
अब स्थिति यह है कि पवन सिंह के विधान परिषद पहुंचने की संभावना मजबूत मानी जा रही है, जबकि दीपक प्रकाश का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित नजर आ रहा है. यदि उन्हें विधान परिषद में जगह नहीं मिलती और मंत्री पद छोड़ना पड़ता है, तो इसे उपेंद्र कुशवाहा और उनके खेमे के लिए बड़ा राजनीतिक झटका माना जाएगा.
फिलहाल 18 जून का विधान परिषद चुनाव केवल सीटों की लड़ाई नहीं, बल्कि एनडीए के भीतर प्रभाव, हिस्सेदारी और राजनीतिक ताकत की नई तस्वीर तय करने वाला अहम मुकाबला बनता जा रहा है.