पुरी में जगन्नाथ रथयात्रा अब अंतिम दौर में है. देव प्रतिमाओं के रथों को सजाने का अब अंतिम दौर चल रहा है. अगले एक-दो दिन में भगवान जगन्नाथ का 'नैनासर' उत्सव मनाया जाएगा. इसके बाद रथयात्रा निकाली जाएगी. पुरी की यह रथयात्रा जितनी विश्वप्रसिद्ध है, उससे भी अधिक रोचक है यहां रथ निर्माण की प्रक्रिया. पहले ये जान लीजिए कि भगवान जगन्नाथ, देवी सुभद्रा और भगवान बलभद्र तीनों के लिए अलग-अलग रथ होते हैं. हर रथ की ऊंचाई, लंबाई चौड़ाई और रंग अलग होता है. इसके अलावा तीनों रथों के नाम भी अलग-अलग होते हैं. इन रथों के निर्माण में काष्ठ की संख्या, पहियों की संख्या भी अलग-अलग होती है.
832 टुकड़ों से बनता है भगवान जगन्नाथ का रथ
भगवान जगन्नाथ जी के रथ का नाम नंदीघोष है. इसे बनाने में कारीगर लकड़ी के 832 टुकड़ों का प्रयोग करते हैं. 16 चक्कों पर खड़े इस रथ की ऊंचाई 45 फीट होती है तो वहीं इसकी लंबाई 34 फीट होती है. रथ के सारथी का नाम दारुक, रक्षक गरुण, रथ की रस्सी शंखचूर्ण नागुनी और रथ पर त्रैलोक्य मोहिनी पताका फहराती है.
इस रथ को जो चार घोड़े खींचते हैं, उनके नाम शंख, बहालक, सुवेत और हरिदश्व हैं. जगन्नाथ जी के रथ पर नौ देवता भी सवार होते हैं. इनमें वराह, गोवर्धन, कृष्णा, गोपीकृष्णा, नृसिंह, राम, नारायण, त्रिविक्रम, हनुमान और रुद्र शामिल होते हैं. जगन्नाथ जी के रथ को गरुणध्वज और कपिध्वज भी कहा जाता है.
देवी सुभद्रा के रथ में 593 लकड़ियां
भगवान की बहन देवी सुभद्रा के रथ का नाम देवदलन रथ है. इसे दर्पदलन भी कहते हैं. इसमें कुल काष्ठ खंडों की संख्या 593 होती है और 12 चक्कों पर खड़ा यह रथ महज 31 फीट लंबा 43 फीट ऊंचा होता है. खुद अर्जुन ही इस रथ के सारथी हैं और रथ की रक्षिका जयदुर्गा देवी हैं. रथ में लगे रस्से का नाम स्वर्णचूड़ नागुनी है और इस रथ की पताका नदंबिका कहलाती है. देवी सुभद्रा के रथ को जो चार घोड़े खींचते हैं उनके नाम रुचिका, मोचिका, जीत और अपराजिता हैं.
बलभद्र जी के रथ में होते हैं 14 चक्के
बलभद्र जी का रथ तालध्वज कहलाता है जो कि सबसे अधिक काष्ठ खंडों 763 टुकड़ों से बनता है. इसमें कुल चक्के 14 होते हैं और इसकी ऊंचाई, 44 फीट होती है. रथ की लंबाई 33 फ़ीट है. इसके सारथि का नाम मातली, रक्षक का नाम वासुदेव, रस्से का नाम वासुकि नाग, पताका उन्नानी कहलाती है. रथ में चार घोड़े हैं जिनके नाम तीव्र, घोर, दीर्घाश्रम, स्वर्ण नाभ हैं.