नवरात्रि के आठवें दिन की देवी महागौरी और नौवें दिन की देवी सिद्धिदात्री हैं. ये दोनों ही स्वरूप देवी पार्वती के पूर्ण अवतार जैसे लगते हैं. क्योंकि देवी पार्वती का एक नाम गौरी भी है. शिवजी कर्पूर गौरं हैं और उनसे विवाह कर लेने के बाद पार्वती भी गौरी कहलाईं. पार्वती सभी सिद्धियों को देने वाली हैं और वही सूक्ष्म रूप से नौ दुर्गा भी हैं.
लेकिन आम जन मानस में देवी की इतनी कठिन व्याख्या नहीं चलती है. वह कौन सी सिद्धी देती हैं और कौन सा वरदान? लोग इसकी डीटेलिंग में नहीं जाते हैं. देवी से क्या मांगना है, इसे लेकर सबके अपने-अपने मंसूबे हैं और अपना ही मांगने की तरीका भी है.
खासतौर पर आप महिलाओं को देखें तो वह मंदिरों में पूजा के बाद देवी के आगे आंचल फैला कर पति मांगती हैं या फिर संतान.या दोनों के लिए स्वस्थ लंबी उम्र. लेकिन... क्या कभी सोचा है कि असल में ये सुहाग हमें देता कौन है.
कौन हैं वो माता महागौरी जो सुहाग देती हैं?
माता महागौरी का स्वरूप अधिक परिपक्व (मैच्योर) दिखाया जाता है. उनका शृंगार भी बहुत भड़कीला नहीं है और वह खुद अपने पति शिव के नाम से जानी जाती हैं. वह अमर सुहाग का वरदान देती हैं और उनकी पूजा दांपत्य व गृहस्थ जीवन में सुख की कामना के लिए की जाती हैं. देवी की पूजा से शुक्र ग्रह मजबूत होता है, जिससे पति-पत्नी के बीच परस्पर प्रेम और सम्मान बना रहता है. देवी संतान सुख के देवी भी हैं और परिवार को जोड़े रखने की भी.
सुहाग की कामना: परंपरा और भावनाएं
अब अपने घर-परिवार, आस-पास देखिए कि इन खूबियों के साथ कौन नजर आता है? ध्यान से देखिए तो घर की बड़ी-बूढ़ी, बुजुर्ग महिलाएं भी इसी तरह के आशीर्वाद देती हैं. बुजुर्ग महिलाओं को खुद में देवी महागौरी का ही रूप माना जाता है. यही बुजुर्ग महिला जो रिश्ते में 'सास' होती है, वही असली महागौरी यानी पार्वती होती हैं. इसे उस नजरिए से देखे जाने की जरूरत है.

क्योंकि हर विवाहित स्त्री को उसका सुहाग या उसका पति उसकी सास ही देती हैं. इसी सास का बेटा हर महिला का पति होता है. जाने-अंजाने महिलाएं जिस पति/सुहाग और सुहाग की लंबी उम्र की कामना के लिए देवी पार्वती के आगे हाथ जोड़े खड़ी होती हैं, उनका रूप उनके ही घर में होता है.
पुरुषों को गृहलक्ष्मी देने वाली भी उनकी ही सास
ऐसा नहीं है कि यह सिर्फ महिलाओं के लिए है. बल्कि पुरुषों को भी उनकी गृहलक्ष्मी देनी वाली उनकी सास (पत्नी की मां) ही है. इसलिए उनके भी अपने सास-ससुर शिव-पार्वती का रूप होते हैं. इस मान्यता को और भी बल तब मिलता है, जहां महिलाएं समूह में इकट्ठा होकर गौरी पूजा करती हैं. गौरी माता की मौजूदगी लोक संस्कृति में पौराणिक न होते हुए बहुत सरल है.
देवी गौरी की पूजा में उन्हें लाल चुनरी, शृंगार के सामान और मीठा भोग प्रसाद में अर्पित किया जाता है. सभी महिलाएं एक साथ पूजा करते हुए गौरी मां की कथा सुनती हैं, फिर आपस में भोग प्रसाद लेकर भोजन करती हैं. यही देवी गौरी की पूजा में शामिल एक प्रक्रिया है.
महाराष्ट्र का मंगला गौरी व्रत, राजस्थान की गणगौर पूजा, उत्तर प्रदेश की सुहागिन गौरी व्रत, बिहार-बंगाल का गौर पूजन भले ही सालभर में अलग-अलग तिथि को होते हैं, लेकिन सबकी परंपरा लगभग एक जैसी ही है. गौरा माता का निर्माण सुहागिन स्त्रियां बहुत सहजता से करती हैं.
गौरी पूजा: लोक परंपरा की सहजता
गौरा माता, जो गणेशजी की माता हैं, उनकी मान्यताएं लोक में इसलिए अधिक हैं क्योंकि उनकी पहचान पतिव्रता स्त्री के तौर पर है. वह पहली महिला हैं जो उसी पारंपरिक तौर तरीके से ब्याही गई हैं, जिस तरीके का विवाह का मौका हर स्त्री और पुरुष (सनातन) के जीवन में आता है. लिहाजा स्त्रियों से उसी पवित्रता और उसी समर्पण की मांग की जाती है, साथ ही गौरा माता ही उनके सुहाग और घर-परिवार की रक्षा करती हैं. इसलिए गौरा पूजन की मान्यता लोक परंपरा में अधिक है.
गौरा पूजन का महत्व ऐसे भी समझ सकते हैं कि देवी का जुड़ाव सामान्य घर-गृहस्थी वाली महिलाओं के साथ बिल्कुल सहज है. इस पूजा के लिए महिलाओं को न किसी पंडित-आचार्य या पुरोहित की जरूरत होती है और न ही किसी तरह के बड़े यज्ञ-हवन की. इसमें सास या कोई बुजुर्ग महिला पूजा के लिए प्रतिनिधि के तौर पर मौजूद होती हैं और जैसा वह बताती हैं, दूसरी सभी महिलाएं उनकी ही बात मानकर उनके अनुसार ही पूजा करती हैं.
गौरेयां और सुहागिलें, लोक जीवन की परंपराएं
देश भर में गौरा या गौरी मां के विभिन्न रूपों की पूजा, अपने-अपने तरीके से करता है. पूर्वी उत्तर प्रदेश में संकठा माता की पूजा होती है. ये लोकदेवी संकट हरने वाली हैं और कृष्ण की बहन कहलाती हैं. इसी तरह पूर्वी उत्तर प्रदेश में गौरेयां खिलाई जाती हैं. गौरेया नई सुहागिन स्त्रियों को कहते हैं, जब किसी के यहां नई बहू आती है तब उसकी सास, या बुआ सास कोई भी मनौती के तौर पर गौरेयां खिलाई जाने की मनौती ले लेती हैं.
बहू के गृहप्रवेश के बाद 7, 11 या 21 सुहागिन महिलाएं निमंत्रित की जाती हैं और नई बहू के साथ गौरी पूजा करके गौरेयां खिलाई जाती हैं. इस दौरान भी देवी गौरी की हाथों से ही प्रतिमा बनाई जाती हैं और नई बहू अपनी सास से उसे आशीर्वाद के तौर पर लेती हैं.

सप्ताह में जिस दिन नई बहू बाल धोती है, उस दिन वह अपनी सास की दी हुई गौरा मां की पूजा करके उनके चरणों का सिंदूर मांग में लेती हैं और फिर आंचल के साथ गौरा मां और सास के पैर छूती हैं. वेस्ट यूपी में यही गौरेया परंपरा सुहागिलों में बदल जाती है. तरीका वही है, बस नाम अलग है. देवी गौरी की पूजा के लिए सुहागिन स्त्रियों को निमंत्रित किया जाता है.
जैसे ही सुहागिलों के लिए निमंत्रित कर दिया जाता है, उसके बाद से सभी का व्रत आरंभ हो जाता है. फिर सुहागिलें खाने तक वह व्रत बना रहता है. इसलिए सुहागिलों का निमंत्रण एक दिन पहले और अक्सर रात में दिया जाता है, ताकि भोजन आदि हो जाए.
घर के आंगन में ही हैं महागौरी
संकठा, गौरेयां, सुहागिलें, सुहागिनी, गौरी व्रत, मंगला गौरी पूजा, गणगौर इन सभी के नाम भले ही अलग-अलग हैं लेकिन ये सभी भारतीय संस्कृति की आत्मा हैं. ये परंपरा बताती है कि देवी कहीं दूर मंदिरों में नहीं, घर के आंगन में ही परिवारों के बीच मौजूद हैं और भारतीय संस्कृति की असली शक्ति इसी सहजता में है. इस तरह एक बार फिर शिव और पार्वती सहजता से लोकजीवन के देवी-देवता बन जाते हैं.